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आजम खां ने क्यों की मर जाने की बात?

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भले ही आजम के खिलाफ कितना भी माहौल क्यों न बन जाए, कुछ तो है कि उन्हें किसी का डर नहीं होता। पिछले दिनों हाई कोर्ट के सवाल को भी आजम ने धता बताते हुए इस बात की तस्दीक कर दी कि वे खुद को कानून से भी ऊपर समझते हैं।
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पिछले दिनों आजम खां के खिलाफ हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच पर दायर की गई एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राज्य सरकार से पूछा था कि आजम मंत्री होते हुए जौहर यूनिवर्सिटी के चांसलर कैसे हो सकते हैं।

हाई कोर्ट के इस सवाल का जवाब आजम ने खुद अपने अंदाज में दे दिया है। शनिवार दोपहर उर्दू अकादमी के एक कार्यक्र में शिरकत करने पहुंचे आजम ने कह दिया कि मर जाऊंगा, पर जौहर यूनिवर्सिटी नहीं छोड़ूंगा।
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दिलचस्प बात यह है कि जिस मंच से सूबे के कद्दावर मंत्री आजम ने यह बयान दिया, वहां सीएम अखिलेश यादव भी मौजूद थे। कार्यक्रम उर्दू के मेधावी छात्रों को सम्मानित करने व लैपटॉप देने का था।

इस दौरान, आजम ने एक और बड़ा एलान किया। उन्होंने उर्दू विषय के साथ सीबीएसई बोर्ड का स्कूल खोलने के लिए वक्फ की जमीन रियायती दर पर किराए पर देने का वादा किया।

हाईकोर्ट ने ये उठाया था सवाल

रामपुर के मौलाना अली मोहम्मद जौहर विवि के चांसलर बनाए जाने पर हाईकोर्ट ने बीते 25 सितंबर को कैबिनेट मंत्री आजम खां से जवाब तलब किया। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ कोर्ट ने आजम को नोटिस जारी कर पूछा था कि वे बताएं कि कैबिनेट मंत्री रहते हुए कुलाधिपति कैसे बन गए।

साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी पूछा कि उन्होंने राज्य सरकार या विवि से कोई सुविधा ली या नहीं। कोर्ट ने इस मामले में नोटिस जारी कर छह हफ्ते में जवाब देने को कहा है। वहीं, उनके खिलाफ ‘हेट स्पीच’ मामले में कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह व न्यायमूर्ति अरविंद कुमार त्रिपाठी की खंडपीठ ने गुरुवार को यह आदेश रजा हुसैन व एस आमिर हैदर रिजवी की याचिका पर दिया। इसमें राज्य सरकार समेत आजम खां को पक्षकार बनाया गया है।

याचियों का आरोप है कि प्रदेश के कैबिनेट मंत्री आजम खां को जौहर विश्वविद्यालय का कुलाधिपति (चांसलर) बनाया जाना लाभ के पद संबंधी कानून का उल्लंघन और कानून की मंशा के खिलाफ है। कोर्ट ने याचियों को भी प्रति उत्तर दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का वक्त दिया है। मामले की अगली सुनवाई दो माह बाद होगी।
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'आजम को जारी करना चाहिए नोटिस'

राज्य सरकार की तरफ से अपर महाधिवक्ता बुलबुल गोदियाल के साथ सरकारी वकील अनुपमा सिंह ने दलील दी कि चांसलर का पद लाभ के पद के दायरे में नहीं आता है और आजम खां कुलाधिपति के रूप में दुहरी सुविधाएं नहीं ले रहें हैं।

जिस पर अदालत ने कहा कि अदालत ने कहा कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि कैबिनेट मंत्री को नोटिस जारी किया जाना चाहिए, क्योंकि वही यह पक्ष पेश कर सकते हैं कि उन्होंने राज्य सरकार या फिर विश्वविद्यालय से कोई सहूलियत ली है या नहीं।

इसके अलावा, याचियों का दूसरा आरोप था कि कैबिनेट मंत्री रहते हुए आजम खां ने शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जव्वाद के प्रति प्रेस विज्ञप्तियों के जरिए ‘आपत्तिजनक बयान’ (हेट स्पीच) दिए, जो कानून की मंशा के खिलाफ है। याचियों ने इस मुद्दे पर आजम के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज किए जाने के निर्देश देने की गुजारिश की साथ ही उन्हें मंत्री पद से बर्खास्त किए जाने का आग्रह भी किया।

अदालत ने कहा कि एफआईआर दर्ज कराने के लिए याचियों के पास विकल्प खुला है कि वे इसके लिए एसएसपी या संबंधित कोतवाल को अर्जी दे सकते है, या फिर शिकायती अर्जी निचली अदालत में दे सकते थे। लेकिन ऐसा लगता है कि उन्होंने ऐसा नहीं किया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की एक नजीर का हवाला देकर प्राथमिकी संबंधी निर्देश देने के आग्रह को खारिज कर दिया। साथ ही इसके लिए उन्हें समुचित फोरम में अपील करने की छूट देने के साथ ही याचिका खारिज कर दी।
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