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जानिए, राम मंदिर और अयोध्या से कैसा रहा अशोक सिंहल का नाता

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विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के संरक्षक अशोक सिंहल का मंगलवार दोपहर निधन हो गया। उन्होंने 2बजकर 24 मिनट पर गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में आखिरी सांस ली। वह बीते एक महीने से सांस की बीमारी से पीड़ित थे। 89 साल के सिंघल पिछले कई दशकों से राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े थे और राम अयोध्या में राम मंदिर उनका सपना था।
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अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से संघ विस्तारक फिर विश्व हिंदू परिषद के दो दशक तक अंतरराष्ट्रीय मुखिया के सफर में अशोक सिंहल ने अयोध्या में राममंदिर के सपने को जीया। इसे पूरा करने के लिए अयोध्या को विहिप का बेस कैंप बनाया। इसके लिए करीब 22 एकड़ भूमि खरीदी, जिस पर कारसेवकपुरम्, रामसेवकपुरम् और कार्यशाला जैसे बड़े प्रकल्प चल रहे हैं।

सिंहल का आखिरी दौर उनके स्वभाव से काफी जुदा था। वे जहां राममंदिर और हिंदू अस्मिता के लिए सरकारों से लड़ते रहे, कभी कानून की परवाह करते नहीं दिखते थे, वहीं आखिरी दौर में इस संवाददाता के सवालों पर संविधान की मर्यादा बचाने की दुहाई देते दिखे।  
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16 जून 2015 को यहां राममंदिर न्यास की मणिराम छावनी में हुई अहम बैठक में आए विहिप के संरक्षक अशोक सिंहल ने कहा था कि राममंदिर का मामला सुप्रीम कोर्ट में है, हम कोर्ट का  सम्मान करते हैं। कोई ऐसा काम नहीं करेंगे, जिससे संविधान की मर्यादा पर  असर पड़े।

राम मंदिर के लिए नकद नहीं पत्‍थर दान में मांगा

उनके इन्हीं लफ्जों के साथ बहुत ही शार्ट नोटिस पर देशभर की आई मीडिया अवाक थी। जिसने भी सुबह से राममंदिर को लेकर ब्रेकिंग न्यूज चला तमाम संभावनाए गिनाई थी, वे उदास थे। उनकी दिल्ली या लखनऊ की दौड़ बेकार गई।

तब खीझ निकालने के लिए राममंदिर न्यास के वरिष्ठ सदस्य व पूर्व सांसद रामविलास वेदांती की मोदी सरकार के ढुलमुल रवैये पर तल्खी भरी चेतावनी ( जिसमें उनका टिकट काट लल्लू सिंह को देने की कसक अधिक थी) सुर्खी बनी।

इस दौरान सिंहल ने एक नई घोषणा कि.. पत्थर दान लेने की। यह कहते हुए कि राममंदिर के लिए अब नकद चंदा एक पैसा भी न्यास नहीं लेगा। यह घोषणा वे यह कहते हुए कर रहे थे कि विहिप नहीं, बल्कि राममंदिर न्यास के संस्थापक व मंत्री की हैसियत से सर्वानुमति से लिए निर्णय को वे बता रहे हैं।

लेकिन राममंदिर की डेड लाइन से जुड़े सवालों पर वे कभी सुप्रीम कोर्ट तो कभी कानून बनाने में सरकार पर दबाव बनाने की बातें करते रहे...। संविधान की दुहाई हर लाइन में थी, वे वही बात दोहराते दिखे जिसे एक दिन पहले बाबरी मस्जिद के मुद्दई हम उम्र हाशिम अंसारी ने कही थी।

यह था कि सुप्रीम कोर्ट में राममंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद की जल्द सुनवाई के लिए स्पेशल बेंच बने। एक पुरानी मांग यह थी कि सरकार अधिगृहित परिसर की भूमि न्यास को सौंपे, इसके लिए लैंडयूज कानून बनाए।

दो साल में काफी बदले सिंहल

बात तब की है जब अशोक सिंहल वर्ष 16 जून 2013 से शुरू मणिराम छावनी के बाल्मिकीभवन में 84 कोसी परिक्रमा से पहले महंत नृत्य गोपाल दास के महंती की स्वर्णजयंती व पट्टाभिषेक कार्यक्रम के दूसरे दिन मुख्य अतिथि थे। राममंदिर बनाने को लेकर आक्रामक थे। एक सप्ताह रहे, बार-बार दोहराते रहे कि भाजपा सरकार आएगी तो राममंदिर निर्माण शुरू जाएगा।

कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी को भी न्योता गया था, मगर वे आखिर दिन तक इंतजार कराते ही रहे और नहीं आए। जबकि पहले दिन ही आए योगगुरू रामदेव ने नरेंद्र मोदी को आकर रामलला से आशीर्वाद लेने की ताकीद की थी। तीसरे दिन आए विहिप के कार्याध्यक्ष डॉ प्रवीण भाई तोगड़िया शीघ्र मंदिर निर्माण का ऐलान करते रहे।

वे केंद्र में कोई सरकार आए 25 अगस्त से शुरू हो रहे 84 कोसी परिक्रमा के बाद मंदिर निर्माण का बिगुल फूंकते रहे, निशाने पर भाजपा भी थी। लोकसभा परिणाम आने के बाद भाजपा की पूर्णबहुमत से बनी सरकार के बाद कई दफे आए अशोक सिंहल की पहले जैसे तल्खी अयोध्या में देखने को कभी नहीं मिली।

खपराडीह में पहली बार 1950 में आए थे अशोक ​सिंहल

अतरौली में 15 सिंतबर 1926 को जन्मे अशोक सिंहल पहली बार खपराडीह में 1950 में आए थे। तब वे 24 साल के थे और आईआईटी बीएचयू वाराणसी कर चुके थे। सांसद लल्लू ​सिंह कहते हैं कि तब वे वहां राजपरिवार के यहां रुके थे। इसके बाद खजुरहट रियासत भी गए।

विहिप के प्रांतीय प्रवक्ता शरद शर्मा ने बताया कि तब से सिंहल का अयोध्या से ऐसा गहरा नाता जुड़ा​ कि यहां ​बाबरी मस्जिद के नेस्तनाबूद के अगुवा बने। आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक मोरोपंख पिंगले ने उन्हें अयोध्या को विहिप का बेस कैंप बनाने की सलाह दी थी।

सिंहल का सफर 1984 से यहां सुर्खियां बनने लगा। यह वह दौर था जब अयोध्या विवाद को दशकों बीत रहे थे। आज भी विवाद इस बात पर है कि देश के हिंदूओं की मान्यता के अनुसार अयोध्या की विवादित जमीन भगवान राम की जन्मभूमि है जबकि देश के मुसलमानों की पाक बाबरी मस्जिद भी विवादित स्थल पर स्थित है।

मुस्लिम सम्राट बाबर ने फतेहपुर सीकरी के राजा राणा संग्राम सिंह को वर्ष 1527 में हराने के बाद इस स्थान पर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया था। बाबर ने अपने जनरल मीर बांकी को क्षेत्र का वायसराय नियुक्त किया। मीर बांकी ने अयोध्या में वर्ष 1528 में बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया। मत प्रचलित हैं कि जब मस्जिद का निर्माण हुआ तो मंदिर को नष्ट कर दिया गया या बड़े पैमाने पर उसमे बदलाव किये गए।

विवादित ढांचा गिराने के गवाह रहे अशोक सिंहल

कई वर्षों बाद आधुनिक भारत में हिंदुओं ने फिर से राम जन्मभूमि पर दावे करने शुरू किये जबकि देश के मुसलमानों ने विवादित स्थल पर स्थित बाबरी मस्जिद का बचाव करना शुरू किया। प्रमाणिक किताबों के अनुसार पुन: इस विवाद की शुरुआत सालों बाद वर्ष 1987 में हुई। वर्ष 1940 से पहले मुसलमान इस मस्जिद को मस्जिद-ए-जन्मस्थान कहते थे, इस बात के भी प्रमाण मिले हैं।

वर्ष 1947- भारत सरकार ने मुसलमानों के विवादित स्थल से दूर रहने के आदेश दिए और मस्जिद के मुख्य द्वार पर ताला डाल दिया गया जबकि हिंदू श्रद्धालुओं को एक अलग जगह से प्रवेश दिया जाता रहा। वर्ष 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने हिंदुओं का एक अभियान शुरू किया, तब अशोक सिंहल विहिप के संयुक्त महामंत्री थे।

रामजानकी रथयात्रा अयोध्या सरयू तट से निकली। दावा था कि हमें दोबारा इस जगह पर मंदिर बनाने के लिए जमीन वापस चाहिए। अशोक सिंहल ३० अक्तूबर १९९० की कारसेवा और छह दिसंबर १९९२ को जब विवादित ढांचा ध्वंस कर दिया गया तो उसके न सिर्फ गवाह रहे बल्कि आंदोलन के रणनीति व अगुवाकारों में थे।

यहां कारसेवा के दौरान उनके संगठन कौशल से लेकर कई बार भिड़ंत में घायल तक होने की अयोध्या गवाह रही है। वे 20 वर्षों तक विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष रहे लेकिन सेहत खराब होने के कारण दिसंबर 2011 में पद छोड़ दिए, तबसे डॉ. प्रवीण भाई तोगड़िया कार्याध्यक्ष हैं।

अयोध्या में बैस कैंप के लिए 22 एकड़ जमीन ली

विहिप के प्रांतीय प्रवक्ता शरद शर्मा कहते हैं कि विहिप के अगुवा रहे अशोक सिंहल ने यहां आंदोलन के विस्तार के लिए बेस कैंप की बागडोर संभाली। 10 एकड़ जमीन में कारसेवकपुरम् बना। साढ़े 8 एकड़ भूमि में रामसेलकपुरम् और करीब साढे 3 एकड़ भूमि में कार्यशाला की नींव रखी गई।

उनका कहना था कि राममंदिर आंदोलन की भूमिका, प्रशिक्षण और साजोसामान के लिए बगैर भूमि खरीदे बेस कैंप नहीं बन सकता। तब मोरोपंख पिगंले संघ की ओर से विहिप के संरक्षक हुआ करते थे। कारसेवकपुरम् नाम उन्हीं का दिया हुआ है।

उद्देश्य था कि आंदोलन के साथ विहिप के अनुषांगिक संगठनों को समर्थवान बनाने का प्रशिक्षण वर्ग चलाया जाए। संघ धर्माचार्यों की कथाओं का आयोजन और ​हिंदुओं को संगठित, विचारवान-प्रज्ञावान बनाने के लिए काम हो।
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सिंहल- संघर्ष और आंदोलन के शिल्पीः लल्लू सिंह

लल्लू सिंह, सांसद

वर्ष 1974 में पहली बार कानपुर में अशोक सिंहल के सानिध्य का अवसर मिला। मौका था एबीवीपी के सम्मेलन का। उनका भाषण संघर्ष और आंदोलन पर था। आत्मविश्वास से लबालब। मेरे भीतर एक चिंगारी पैदा कर दी।

वे ऋषि थे, साधु थे, मुनि थे। संगीत प्रेमी थे और संगीत के जानकार भी। उनका स्वर ऐसा था कि जब गाते थे तो मानो ऊर्जा सी फूट रही हो। उनके सानिध्य में होते ही शून्यता महसूस होने लगती थी। मन सिर्फ सुनने को कहता था, कुछ भी बोलने को नहीं। उनमें विज्ञान और अध्यात्म का संगम था।

बीएचयू से फिजिक्स के 'स्पेक्ट्रम स्कोपी पर उनका काम था लेकिन उतना ही अधिकार वेद, उपनिषद गीता पर भी था। उनके व्यक्तित्व की कोई सरहद नहीं थी। अयोध्या से उनके आकर्षण पर पूछता तो कहते थे कि छात्रजीवन के बाद मेरी नई यात्रा का पहला पड़ाव खपराडीह बना।

वह १९४९ में विस्तारक के रूप में जिले में आए औरखपराडीह तालाब के पास रहा करते थे। अच्छे तैराक थे। तालाब में प्रतिदिन एक घंटे तैरते थे। खपराडीह के अखंड प्रताप सिंह से उनके गहरे रिश्ते थे। वह अक्सर भावुक हो रज्जू भैया और भाऊजी देवरस को याद किया करते थे।

कहते थे कि जब अगस्त क्रांति की ज्वाला मद्धिम सी पडऩे लगी तो वर्ष १९४४ में मेरे पड़ोसी रज्जू भैया घर पर आए और मुझे पहली बार शाखा लेकर गए। फिर तो जीवन की यात्रा ज्यों-ज्यों आगे बढ़ी, राष्टवादी चेतना का रंग उतना ही चटक होता गया।

मैं सिर्फ उनकी सुनता था लेकिन बच्चों की तरह कभी-कभी बोल जाता था। वे सुन लेते थे, डांटते भी नहीं थे। यह उनका बड़प्पन था। वह सच्चे अर्थो में योद्धा था लेकिन बाद में पुरोधा हो गए। जब किसी योद्धा का व्यक्तित्व में ईश्वरीय चेतना से लबरेज हो जाता है तो वह पुरोधा हो जाता है। अभी कुछ दिन पहले दिल्ली में उनका जन्मदिवस समारोह मनाया गया। वक्ताओं के  विचार की मूल ध्वनि में 'योद्धा और पुरोधा छाया हुआ था।

शैक्षिक परिसरों में कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधारा प्रभावी थी, संघ ने उन्हें एबीवीपी का पालक बनाया तो उन्होंने परिसरों में राष्टवादी विचार को गति देने का काम किया। वनवासी क्षेत्रों में वहीं के स्थानीय लोगों की मदद से उन्होंने एकल विद्यालयों की स्थापना कर आदिवासी क्षेत्रों में ज्ञान का उजियारा बिखेरा।

अंधेरी बस्तियां शिक्षा से रोशन हो उठी। बीएचपी में गए तो राममंदिर आंदोलन को व्यापक पहचान दिलाई। जन्मदिन समारोह में उन्होंने गीत ' यह मातृभूमि मेरी, यह पितृभूमि मेरी...सुनाया तो लगा जैसे किसी युवा की आवाज गूंज रही है। इधर कुछ वर्षो से वेद और गाय उनकी चेतना को गहरे स्तर पर प्रभावित कर रही थी।

वह वैश्विक स्तर पर इसके महत्व को स्थापित करना चाह रहे थे। उनके जाने पर मुझे ऐसी अनुभूति हो रही है जैसे कि मंदिर की घंटियां चुप हो गई, गंगा की धारा उदास हो वेगहीन हो गई हो, चिडिय़ों का चहचहाना थम गया हो, गायों का रम्भाना रुक गया हो...। जीवन की धारा चलती है और चलती रहेंगी लेकिन अशोक सिंहल जी काल के कपाल पर अटल हस्ताक्षर कर गए, जिसे आने वाली सदिया उसे बांचेगी।


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