हनुमानगढ़ी समेत कई प्रमुख मंदिरों व गुरुद्वारा के बीच प्रमोदवन में स्थित एक रुहानी दरगाह हजरत नूह अलैहिस्लाम की है। विश्वभर में भले ही अयोध्या विवाद सुर्खियां बनता हो, पर यहां रोजाना मुसलमानों से अधिक हिंदू आते हैं।
वे अपनी दिनचर्या में सरयू स्नान, हनुमानगढ़ी व कनक भवन में दर्शन-पूजन के बाद मजार पर माथा टेककर ही नौकरी-कारोबार या सफर पर निकलते हैं। विवादित ढांचा ध्वंस के समय मजार की रक्षा के लिए कारसेवकों के सामने यहां के साधु-संत व स्थानीय लोग चट्टान की तरह खड़े थे।
सभी धर्मों में सृष्टि की शुरूआत जलप्रलय के बाद मानी गई है। सनातन धर्म में अयोध्या से ही प्रथम पुरुष मनु व प्रथम स्त्री सतरुपा से सृष्टि की शुरूआत बताई गई है। इसाईयत, यहूदी व इस्लाम में नूह की कश्ती का उल्लेख आता है। हजरत नूह को परमेश्वर का प्रमुख संदेशवाहक व पूर्वज माना गया है। जार्डन में कश्ती नूह व मजार आस्था का बड़ा केंद्र है।
दरगाह हजरत नूह अलैहिस्लाम दरगाह के मुतवल्ली मो. उमर बताते हैं कि यहां उसी कश्ती के टुकड़े के साथ हजरत नूह के आने की बात पुरखों ने कही थी, कोई किताबी साक्ष्य नहीं है। लोग मानते हैं वे आदम के पुत्र नूह इब्राहिम के पुत्र थे।
हजरत नूर की मजार
- फोटो : amar ujala
हनुमानगढ़ी समेत कई प्रमुख मंदिरों व गुरुद्वारा के बीच प्रमोदवन में स्थित एक रुहानी दरगाह हजरत नूह अलैहिस्लाम की है। विश्वभर में भले ही अयोध्या विवाद सुर्खियां बनता हो, पर यहां रोजाना मुसलमानों से अधिक हिंदू आते हैं।
वे अपनी दिनचर्या में सरयू स्नान, हनुमानगढ़ी व कनक भवन में दर्शन-पूजन के बाद मजार पर माथा टेककर ही नौकरी-कारोबार या सफर पर निकलते हैं। विवादित ढांचा ध्वंस के समय मजार की रक्षा के लिए कारसेवकों के सामने यहां के साधु-संत व स्थानीय लोग चट्टान की तरह खड़े थे।
सभी धर्मों में सृष्टि की शुरूआत जलप्रलय के बाद मानी गई है। सनातन धर्म में अयोध्या से ही प्रथम पुरुष मनु व प्रथम स्त्री सतरुपा से सृष्टि की शुरूआत बताई गई है। इसाईयत, यहूदी व इस्लाम में नूह की कश्ती का उल्लेख आता है। हजरत नूह को परमेश्वर का प्रमुख संदेशवाहक व पूर्वज माना गया है। जार्डन में कश्ती नूह व मजार आस्था का बड़ा केंद्र है।
दरगाह हजरत नूह अलैहिस्लाम दरगाह के मुतवल्ली मो. उमर बताते हैं कि यहां उसी कश्ती के टुकड़े के साथ हजरत नूह के आने की बात पुरखों ने कही थी, कोई किताबी साक्ष्य नहीं है। लोग मानते हैं वे आदम के पुत्र नूह इब्राहिम के पुत्र थे।
कश्ती के एक टुकड़े के साथ प्रमोदवन में उन्हें किनारा मिला। यहां बहुत रूहानियत रहती है। मुसलमानों से तीन गुना अधिक हिंदू रोज आते हैं। हनुमानगढ़ी के तमाम दुकानदार बेसन का लड्डू चढ़ाते हैं। शारीरिक, मानसिक समेत हर तरह की परेशानी यहां आकर जियारत करने मात्र से दूर हो जाती है।
मान्यता है कि यहां आकर कलश को कुछ देर देखने मात्र से पराशक्तियों से छुटकारा मिल जाता है। जियारत से कारोबार, नौकरी, पढ़ाई व तरक्की मिलती है। हाजी सईद कहते हैं कि हजरत नूह नौ गज लंबे थे, उनकी विश्व की सबसे अनोखी 15 मीटर लंबी मजार है। जिसे लोग सदियों से नौ गजी पीर भी कहते आ रहे हैं।
प्रमोदवन जंगल का इलाका था। जहां राम अपने भाईयों के साथ घूमने आते थे। जियारत करने आए बलरामपुर गोंडा के मो. नईम कहते हैं कि खुद रोग से परेशान था, बच्चों को रोजगार नहीं था। यहां आने से कुछ ही दिनों में परेशानी खत्म हो गई, बच्चे रोजगार कर रहे हैं।
यहां मजार पर शुक्रवार को हिंदुओं की परिवार समेत संख्या अधिक थी, तो फूल-अगरबत्ती, सेंट बेचने वाले भी हिंदू ही थे। शास्त्रीनगर निवासी बलराम कहते हैं कि रोजाना पहले हनुमानगढ़ी-कनकभवन जाते हैं, फिर मजार पर माथा टेकने के बाद दुकान खोलते हैं। दर्शननगर से आए संतोष कुमार सिंह कहते हैं कि हफ्ते में एकबार हनुमानगढ़ी दर्शन करने आते हैं तो यहां भी प्रार्थना करते हैं।
प्रमोदवन के अंकित गौड़ व रामनरेश कहते हैं कि 1992 के बवाल में यहां कारसेवक आए तो हम लोगों ने विरोध किया। नौ गजी पीर हमारे लिए हनुमान जी कल्याणकारी हैं। कप्तानगंज बस्ती के रहने वाले कृपाशंकर तिवारी व उनकी पत्नी रामलली काफी परेशान हाल में पहुंची। बताया कि अयोध्या के लवकुश नगर में एक मकान खरीदा है, वहां चुड़ैल परेशान करती है। दोनों ने थोड़ी देर गेट के कलश को देखा, फिर बोले अब डर खत्म हो गया है।
रोजाना लगता है शाकाहारी लंगर
अयोध्या में जितनी इबादतगाह है, वहां उर्स पर शाकाहारी भोजन ही बनता है और चढ़ता है। नौ गजी पीर की दरगाह में रोजाना दोपहर व रात को लंगर लगता है, जितने लोग मौजूद रहते हैं सबको प्रसाद मिलता है। मुतवल्ली बताते हैं कि यह दरगाह ठीक कोतवाली के पीछे है, मगर इसके चारों ओर मंदिर है। सामने हनुमानगढ़ी व गुरुद्वारा नजरबाद का गुंबद दिखता है, तो अगल-बगल व पीछे रमारमण भवन, अमौना मंदिर, कौशल किशोर भवन से आरती व घंडियों की आवाज सुनाई देती है।
फैसला आते ही पुराने वैभव को प्राप्त करेगी रामनगरी
हजरत नूह अलैहिस्लाम दरगाह के मुतवल्ली मो. उमर बाबरी मस्जिद के पक्षकार भी है, उनके दादा जहूर अहमद 1949 में बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखने के विरोध में दर्ज कराए गए केस में मुद्दई थे। उनके इंतकाल के बाद वालिद फारूक अहमद पक्षकार बने, अब वालिद नहीं रहे तो वे सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहे थे। कहा कि अयोध्या को सदियों पीछे डकेलने का काम इस विवाद ने किया, वरना राम की नगरी से बड़ा धर्मस्थल कौन हो सकता है।
यहां इतने पीर-फकीर आए कि उनकी दरगाहों पर हजारों का मजमा लगता। इसका फायदा यहां के लोगों को होता। अब फैसला आते ही रामनगरी तेजी से पुराने वैभव को प्राप्त कर सकेगी। वे कहते हैं कि गोकुल भवन के महंत रहे सिद्ध संत परमहंस राममंगल दास यहां आते थे, वे हजरत की बातें किया करते हैं, उन्होंने किताब लिखी है, जिसमें रामभक्त और अरब से आने का जिक्र है। जबकि यहां के तमाम सूफी हनुमानजी को हठीले पीर कहते थे।