सावधान! आपकी सेहत से हो रहा है खिलवाड़, खाद्य पदार्थों की जांच रिपोर्ट में खेल
केस एक
बरेली में मार्च में नमूना सैंपलिंग कार्रवाई के बाद चावल कचरी का नमूना जांच के लिए लखनऊ स्थित राजकीय जन विश्लेषण प्रयोगशाला भेजा गया था। जांच रिपोर्ट में नमूना दुरुस्त और खाने योग्य बताया गया। नमूना लेने वाले एफएसओ ने रिपोर्ट पर संशय जताते हुए रेफरल जांच को कोलकाता स्थित केंद्रीय रिफरल लैब भेजवाया। वहां हुई जांच में सिंथेटिक कलर मिक्सिंग के कारण नमूना जानलेवा स्तर तक खतरनाक अनसेफ श्रेणी में फेल आया।
केस दो
लखनऊ की एफएसडीए टीम ने यहियागंज की एक दुकान से पिसी हल्दी का नमूना राजकीय जन विश्लेषण प्रयोगशाला को भेजा था। जांच रिपोर्ट में नमूने को खतरनाक स्तर की मिलावट के कारण अनसेफ श्रेणी में फेल बताया गया। कारोबारी ने जांच रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए गाजियाबाद स्थित केंद्रीय रिफरल लैब में अपील की। वहां की जांच रिपोर्ट में नमूना सिर्फ अधोमानक (सब स्टैंडर्ड) स्तर पर सुरक्षित श्रेणी में फेल आया।
लखनऊ। खाद्य सामग्री की नमूना जांच के नाम पर राजकीय जन विश्लेषण प्रयोगशालाओं में खेल किया जा रहा है। गलत जांच रिपोर्ट की वजह से आम आदमी की सेहत दांव पर है। मिलावटखोरी से जुड़े धंधेबाज जांच रिपोर्ट में मनमानी कर जानलेवा स्तर की मिलावट के बाद भी बच निकलते हैं। खाद्य तेल, घी, पनीर, हल्दी, पाउडर, दूध बर्फी, वेजीटेबल सॉस समेत 21 खाद्य पदार्थों के नमूनों की राजकीय लैब व केंद्रीय रेफरल लैब में हुई जांच में अलग-अलग आई रिपोर्ट बड़े सवाल खड़े कर रही है।
लैब स्तर पर जांच रिपोर्ट में सामने आई असमानता को खाद्य व औषधि प्रशासन विभाग की अपर मुख्य सचिव अनीता भटनागर जैन ने भी गंभीरता से लिया है। उन्होंने फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसआई) के अध्यक्ष और मुख्य कार्यपालक अधिकारी के साथ ही स्वास्थ्य मंत्रालय को भी पत्र भेजकर जांच में ऐसे नमूनों की केंद्रीय लैब में पुन: जांच कराने का अनुरोध किया है।
चार नमूनों के साथ होती सैंपलिंग कार्रवाई
खाद्य सामग्री में मिलावटखोरी पकड़ने के लिए सैंपलिंग के दौरान चार नमूने खाद्य सुरक्षा अधिकारी लेता है। इसमें से एक नमूना संबंधित जिले से जुड़ी राजकीय जन विश्लेषण प्रयोगशाला में भेजा जाता है जबकि तीन नमूने एफएसडीए की जिला इकाई अपने पास सुरक्षित रखती है। लैब की जांच रिपोर्ट से कारोबारी या एफएसओ के संतुष्ट न होने पर इन तीन में से एक नमूना गाजियाबाद या कोलकता स्थित केंद्रीय रिफरल लैब में जांच को भेजा जाता है।
कोडिंग दरकिनार, मनमाफिक जांच रिपोर्ट का खेल
नमूनों को जांच के लिए किस लैब में भेजा जा रहा है, इसकी जानकारी सिर्फ डीओ व संबंधित एफएसओ को होती है। लैब में भेजे जाने से पहले इसकी कोडिंग कर सीलबंद किया जाता है। कोड के आधार पर सिर्फ जांचने वाली लैब का जिम्मेदार या संबंधित जिला इकाई का एफएसओ व डीओ ही बता सकते हैं कि नमूना किस लैब को कब जांच के लिए भेजा और लैब में नमूना जांच को कब आया। इसके बाद ही जांच रिपोर्ट मनमाने स्तर पर बनवाने का खेल शुरू हो जाता है। धंधेबाज कोडिंग के माध्यम से नमूने की जांच करने वाली लैब का पता लगाकर जानलेवा स्तर तक खतरनाक मिलावटयुक्त नमूने को सिर्फ पैकेजिंग एक्ट या सब स्टैंटर्ड रिपोर्ट के आधार पर सुरक्षित श्रेणी में जारी कराने को 20 से 50 हजार तक की डील करते हैं। ताकि जानलेवा मिलावट के बाद भी आसानी से बिना जेल जाने के खतरे के सिर्फ जुर्माना देकर बच सकें।
तीन साल का तबादला आदेश भी हाशिए पर
राजधानी समेत अन्य पांच राजकीय जन विश्लेषण प्रयोगशाला में नमूना जांच से जुड़े तकनीकी स्तर के कर्मचारी जोड़-तोड़ के सहारे सालों से एक ही लैब में जमे हैं। अकेले राजधानी स्थित लैब में ही तकनीकी स्टाफ से जुड़े आधा दर्जन से भी अधिक ऐसे कर्मचारी हैं जिनका तबादला गत सात साल से नहीं हुआ है। तबादला नीति के तहत एक जिले में अधिकतम तीन साल की तैनाती का ही प्रावधान है। इसके बावजूद कोर्ट केस, नमूना जांच की विशेषज्ञता तो कभी तकनीकी स्टॉफ की कमी को सहारा बना लैब के कर्मचारी हर साल तबादले से बच निकलते हैं। लंबे समय तक एक ही लैब में रहने वाले ऐसी ही कर्मचारियों के माध्यम से मिलावटखोरी से जुड़े धंधेबाज गोपनीयता में सेंधमारी कर जांच के नाम पर खेल को अंजाम देते हैं।
एक्ट में सजा का अलग-अलग प्रावधान
लैब जांच में खतरनाक रसायन, सिंथेटिक कलर, यूरिया और वॉशिंग पाउडर इत्यादि की मिलावट से जानलेवा स्तर तक खतरनाक असुरक्षित श्रेणी में फेल आने वाले नमूने पर कारोबारी को एक्ट के तहत न्यूनतम दस लाख का जुर्माना, उम्र कैद या दोनों जुर्माना व जेल दोनों का प्रावधान है। जबकि सुरक्षित श्रेणी में सिर्फ सबस्टैंडर्ड में फेल रिपोर्ट पर अधिकतम पांच लाख का जुर्माना और पैकेजिंग एक्ट में मिथ्याछाप में फेल रिपोर्ट पर अधिकतम तीन लाख तक का जुर्माना लगता है।
जांच में बाहरी हस्तक्षेप संभव नहीं
लैब स्तर पर जारी होने वाली जांच रिपोर्ट में किसी भी तरह का बाहरी हस्तक्षेप संभव नहीं है। ऐसा हो सकता है कि तकनीकी स्तर पर चूक से जांच रिपोर्ट में केंद्रीय लैब की रिपोर्ट से भिन्नता आई हो। लैब में हर नमूने की रिपोर्ट जारी होने तक पूरी मॉनिटरिंग होती है। जांच रिपोर्ट में भिन्नता को देख परीक्षण से जुड़े संबंधित खाद्य विश्लेषक से लिखित स्पष्टीकरण लेकर कार्रवाई तय होगी।
- राहुल सिंह, सहायक आयुक्त व प्रभारी जन विश्लेषण प्रयोगशाला