अटल बिहारी वाजपेयी और लखनऊ, दो शरीर एक जान। लखनऊ ने उन्हें तमाम खट्टे-मीठे अनुभव कराए तो सांसद चुन प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाकर गौरव भी दिलाया।
विज्ञापन
जीवन में तमाम उतार-चढ़ाव आए लेकिन अटल कभी लखनऊ को नहीं भूले और न लखनऊ वाले ही उन्हें भूले। अटल अपने भाषणों में लखनऊ से जुड़ाव को व्यक्त करने से नहीं चूकते।
कभी मारवाड़ी गली की घुमक्कड़ी उनकी जुबान पर होती तो कभी लखनवी चाट के चटखारे लोगों को मजेदार जायके का एहसास कराते।
शंभू हलवाई की रबड़ी व मलाई तो सदर और चौक की जलेबियां भी उनके भाषण का हिस्सा बनती रही हैं। लखनऊ उनके प्रचारक से संपादक और संपादक से प्रधानमंत्री तक के सफर का गवाह रहा है।
विज्ञापन
इनके यहां रहा अटल का डेरा
अटल प्रचारक तो थे ही। लखनऊ आए तो लोगों से संपर्क करने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर आ पड़ी। रहने का कोई स्थायी ठिकाना था नहीं। कुछ दिन वर्तमान महापौर डॉ. दिनेश शर्मा के पिता पं. केदारनाथ शर्मा (पाधाजी) के यहां रुके।
पं. दीनदयाल उपाध्याय पहले से ही यहां रहा करते थे। बाद में अटल का निवास मारवाड़ी गली के प्रसिद्ध कलंत्री निवास में भी रहा।
कुछ दिन सदर में रहे तो एपी सेन रोड स्थित एक भवन में भी, जिसे अब किसान संघ के कार्यालय के नाम से जाना जाता है। वे कुछ दिन स्व. बजरंग शरण तिवारी के हीवेट रोड स्थित घर पर भी रहे।
तिवारी उनके अभिन्न मित्रों में थे। साथ ही ‘राष्ट्रधर्म’ के प्रबंधक होने के नाते भी वे वाजपेयी के सहयोगी रहे। लखनऊ की लता खन्ना के घर भी अटल का डेरा जमा।
लखनऊ के हर घर और गली से परिचित रहे हैं अटल
पूर्व नगर विकास मंत्री लालजी टंडन हों या अटल के बचपन के साथी और उनके खिलाफ चुनाव लड़े डॉ. दाऊजी गुप्त या पुराने कर्मचारी नेता चंद्रप्रकाश अग्निहोत्री या फिर ‘राष्ट्रधर्म’ के संपादक के रूप में अटल के सहयोगी रहे स्व. छोटेलाल जायसवाल के पुत्र रामचंद्र जायसवाल। ये सभी अनेक प्रसंग बताते हैं।
इनके अनुसार, अटलजी कब और कहां पहुंच जाएंगे, यह कहना मुश्किल था। कई घरों में उनका बैठका जमता था। कई घरों में अटल के भैया थे तो भौजाई भी। कई घरों के लोगों से उनका चाचा, काका और दद्दा का संबंध रहा। वाजपेयी चाहे जितने बड़े पद पर पहुंचे लेकिन उनके ये रिश्ते बरकरार रहे।
वर्ष 1980 से पहले के लखनऊ में कोई गली व मोहल्ला ऐसा नहीं होगा जिसकी गलियां अटल की चहलकदमी से परिचित न रही हों।
हिंदी भाषा से रहा है अथाह प्रेम
लखनऊ अटल के हिंदी प्रेम का भी गवाह रहा है। नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री थे। उन्होंने हिंदी दिवस (14 सितंबर) से ठीक एक दिन पहले उर्दू को राज्य की द्वितीय राजभाषा घोषित कर दिया।
प्रदेश के वयोवृद्ध साहित्यकार श्रीनारायण चतुर्वेदी (अब स्वर्गीय) ने इसके विरोध में ‘भारत-भारती’ सम्मान लौटा दिया। सम्मान के साथ मिले एक लाख रुपये भी सरकार को लौटा दिए। विरोध में राजभवन तक जुलूस भी निकाला।
वाजपेयी को पता चला तो उन्होंने तुरंत चतुर्वेदी को सम्मानित करने की घोषणा की और राशि संग्रह करके उन्हें सम्मानित किया।
पहली बार लखनऊ से हारे लोकसभा चुनाव
इसे संयोग ही कहा जाएगा कि जो लखनऊ अटल के दूसरे घर जैसा रहा, उसी ने उन्हें ठुकराने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। उनका यहां से सासंद बनने का सपना शुरुआती दिनों में पूरा नहीं हो पाया। वे 1957 में पहली बार यहां से लोकसभा चुनाव लड़े लेकिन कांग्रेस के पुलिन बिहारी बनर्जी से हार गए।
उन्होंने 1962 में भी यहां भाग्य आजमाया लेकिन बात नहीं बनी। नतीजतन उन्होंने लखनऊ से चुनाव न लड़ने में ही भलाई समझी। पर, लखनऊ आना-जाना बना रहा। उन्होंने लखनऊ में कई प्रदर्शनों का नेतृत्व किया। लोगों के पारिवारिक कार्यक्रमों में भी आते-जाते रहे।
आखिरकार उन्होंने 1991 में फिर यहां से लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस चुनाव में वे कहते भी थे, ‘लखनऊ वालों ने अगर सोच लिया था कि मुझसे पीछा छूट जाएगा तो यह नहीं होने वाला। इतनी आसानी से लखनऊ के लोग मुझसे रिश्ता नहीं तोड़ सकते। मेरा नाम भी अटल है। देखता हूं कब तक मुझे यहां के लोग सांसद नहीं बनाएंगे।’ आखिरकार वे चुनाव जीते और लखनऊ से सांसद बनने का उनका सपना पूरा हुआ।