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लखनऊ अपनों को सम्मान देना बखूबी जानता है

Mon, 02 Jun 2014 12:07 PM IST
रोली खन्ना/ अमर उजाला, लखनऊ
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आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के डायरेक्टर जनरल राकेश तिवारी लखनऊ से बेहद प्रभावित हैं। उनकी नजर में लखनऊ कैसा शहर है, आइए जानते हैं।
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एक ही जीवन में मानों में तीन युग जी लिए लखनऊ में और फिर भी मन नहीं भरा। 1978 से लेकर वर्ष 2014 तक मैं कुछ वर्षों के अंतराल पर यहां रहा।

यूं तो यह शहर ही खास है लेकिन सबसे अहम बात जो यहां से जोड़े रखती है, वह है यह शहर और यहां के बाशिंदे अपनों को सम्मान देना जानते हैं। मैं अपनी बातों को लखनऊ के संदर्भ में तीन बिन्दुओं में समेटते हुए आपके सामने रखूंगा।

नागरजी से होती थी रोज मुलाकात

नदी किनारे स्थित खुनखुनजी की कला कोठी है, वहां नावें चला करती थीं। हम लोग वहीं के करीब कुड़ियाघाट पर तैरने आया करते थे। आज गोमती की सफाई एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

पानी पीना तो दूर आचमन लायक नहीं रह गया है। पढ़ाई के दौरान अक्सर हमारा चक्कर मोती नगर, राजा नगर लगा करता था। नागर जी की ‘चौक यूनिवर्सिटी’ की तो बात ही निराली थी।

रोज शाम हमारी क्लास इसमें लगा करती थी। अमृत लाल नागर जी हमारे बीच होते थे। एक बात जो जरूरी है आज के युवाओं से शेयर करना कि उस दौर में इतना बड़ा साहित्यकार हम सब के बीच हम सबकी तरह साधारण सा बन कर बैठ जाया करता था।

हमारे सवालों का जवाब हमें मिलता। यह उस दौर के मनीषियों की खूबी थी उनके लिए छोटा-बड़ा कोई नहीं था। वह नई जेनरेशन के साथ घुलते-मिलते थे।

इसी तरह लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर में भी एक खुलापन था। अब तो किले की दीवारें खड़ी कर दी गई हैं। वहीं जाओ तो खुद को कैद पाते हैं।

सहेजना होगा धरोहरों को

लखनऊ का पुरातत्व अद्वितीय है। इसमें भी कंपोजिट कल्चर का असर दिखता है।

नवाब, पर्शियन, ब्रिटिशर्स आए और अपने-अपने ढंग से इमारतें खड़ी कराईं, पहले से बनी हुई इमारतों का पुनर्निर्माण कराया।

लखनऊ के पुरातत्व को लेकर हमें ध्यान रखना होगा कि ऐतिहासिक इमारतों की मरम्मत, पुनर्निर्माण के समय हम इस बात का ध्यान रखें कि इनका मूल स्वरूप न मरने पाए।

कुछ ऐसी इमारतें बची रहें, जिनका इस्तेमाल भविष्य में नमूने के तौर पर किया जा सके।
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बोली में है मिठास

इसी तरह लखनऊ की संस्कृति के दो हिस्से हैं। एक अवधी बोली और दूसरा अभिजात्य वर्ग की उर्दू मिश्रित भाषा।

डालीगंज, बाबूगंज, नाका और ठाकुरगंज के इलाकों में अवधी बोलने वाले रहते थे।

धीरे-धीरे अवधी और उर्दू मिश्रित भाषा कम होती गई। पहाड़ और बुंदेलखंड के लोगों के यहां आने से से ‘कम्पोजिट कल्चर’ और भी ज्यादा विकसित होती चली गई।
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