कच्चे माल की कीमतें बढ़ने से अनुबंधित कंपनियों द्वारा तय दर पर आपूर्ति रोकने के कारण यूपी के करीब 4,500 जन औषधि केंद्रों पर शुगर, बीपी और एंटीबायोटिक जैसी आवश्यक दवाओं का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। केंद्रों पर दवाओं का स्टॉक खत्म होने से मरीज महंगे मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदने को मजबूर हैं, जबकि विभाग नए टेंडर के जरिए आपूर्ति बहाल करने की बात कह रहा है।
यूपी में सरकारी अस्पतालों में खुले जन औषधि केंद्रों पर शुगर, बीपी व श्वास रोग की दवाएं तक नहीं हैं। केंद्रों से आधी-अधूरी दवाएं मिल रही हैं। ऐसे में मरीजों को वापस लौटना पड़ रहा है। मजबूरी में मरीजों को बाहर से दवा महंगी दर पर लेनी पड़ रही है।
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लखनऊ में जन औषधि केंद्र प्रभारियों का कहना है दवाओं का स्टॉक नहीं मिल पा रहा है। इसकी वजह यह है कि कच्चे माल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी के बाद केंद्रों पर दवाओं का संकट गहरा गया है। अनुबंध के तहत दवा आपूर्ति कर रही निजी कंपनी ने निर्धारित दर पर दवा देने से हाथ खड़े कर दिए हैं। इससे केंद्रों पर नई खेप नहीं पहुंच रही है।
400 तरह की दवाएं वेयर हाउस में मौजूद
जन औषधि की सूची में करीब 2160 तरह की दवाएं हैं। इसमें 1400 तरह की दवाएं वेयर हाउस में मौजूद हैं। सूत्रों के अनुसार, कंपनी का अनुबंध पिछले वर्ष कम दरों पर हुआ था। उस समय कच्चे माल की कीमत कम थी लेकिन पिछले कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल के दाम लगभग बढ़ गए हैं।
कंपनी का कहना है कि पुरानी दर पर दवा आपूर्ति करने से उसे भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। कंपनी तय दर पर दवा आपूर्ति पर हाथ खड़े कर दिए हैं। इस स्थिति का सीधा असर जन औषधि केंद्रों पर पड़ रहा है। केंद्र संचालकों के अनुसार, पिछले एक पखवाड़े से बुखार, मधुमेह, रक्तचाप और एंटीबायोटिक जैसी रोजमर्रा की जरूरी दवाओं की आपूर्ति ठप है।
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गोदाम में रखा पुराना स्टॉक भी धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। मरीज सस्ती दर पर दवा लेने के लिए केंद्रों पर पहुंच रहे हैं लेकिन उन्हें निराश लौटना पड़ रहा है। वहीं, विभाग ने इस संकट से निपटने के लिए निविदा प्रक्रिया शुरू कर दी है। ताकि जल्द से जल्द दवाओं की आपूर्ति बहाल हो सके। विभाग का दावा है कि नए टेंडर की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी और केंद्रों पर दवाओं की उपलब्धता सामान्य हो जाएगी।
प्रदेश में करीब 4500 जन औषधि केंद्र, सूची में 2160 तरह की दवाएं
प्रदेश में करीब 4500 जन औषधि केंद्र खुले हैं। जन औषधि की सूची में करीब 2160 तरह की दवाएं हैं। इन केंद्रों पर प्रतिमाह करीब 25 करोड़ रुपये की दवाएं बिकती हैं। पिछले कुछ दिनों से केंद्रों पर मधुमेह, रक्तचाप और एंटीबायोटिक जैसी रोजमर्रा की जरूरी दवाओं की कमी हो गई है।
खास तौर से सुगर में प्रयोग होने वाली लिनाग्लिप्टिन, विल्डाग्लिप्टिन एक्सटेंडेड, बीपी के मरीजों को दी जाने वाली टेलमीसार्टिन 40 एमजी, एमलोडिपिन, दर्द में दी जाने वाली जीरोडाल एमआर, एसिब्रोफाइलीन कैप्सूल,गैस की पेंटाप्राजोल आईटी आदि दवाओं की कमी है। इसके पीछे मूल वजह दवा आपूर्ति करने वाली कंपनियों का हाथ खींचना बताया जा रहा है।
जेनेरिक दवा कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि कच्चे माल की कीमत बढ़ने की वजह से दवा कंपनियां आपूर्ति कम दे रही हैं। हालांकि जन औषधि केंद्रों के प्रबंधन से जुड़े अधिकारी इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। उत्तर प्रदेश के प्रबंधक गौतम कपूर से दवाओँ की कमी के संबंध में पक्ष जानने के लिए कई बार कॉल किया गया और मैसेज भी किया गया, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।