फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

डॉक्टरों का कमाल, बिना आर्टरी बदले हटा दी ब्लॉकेज

Wed, 16 Mar 2016 04:31 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
लोहिया अस्पताल - फोटो : ‌अमर उजाला
विज्ञापन
कमर और जांघ के बीच रहने वाली नस फ्यूमोरल आर्टरी के भीतर गांठ और पथरी इकट्ठी होने की वजह से पैर में रक्त का प्रवाह कम हो गया था। प्रवाह कम होने से पैरों में गैंगरीन की समस्या होने लगी थी।
विज्ञापन


ऐसी स्थिति में मरीज की जान बचाने के लिए सर्जरी ही एक रास्ता था। पांच घंटे की सर्जरी के बाद मरीज को नई जिंदगी दी।

सोमवार सुबह सुबह दस बजे शुरू हुई सर्जरी दोपहर तीन बजे तक चली और अब मरीज पूरी तरह स्वस्थ है और आसानी से घूम-फिर रहा है।

सीवीटीएस विभाग के डॉ. एसएस राजपूत ने बताया कि लोहिया संस्थान में इस तरह की सर्जरी पहली बार की गई है। निजी अस्पताल में इस तरह की सर्जरी पर लाखों रुपये की रकम खर्च करनी पड़ती है। संस्थान में 50 से 60 हजार रुपये की खर्च में आसानी से ऑपरेशन हो गया।

इलाज में देरी होती तो निशक्त बन जाता मरीज

हस्‍तरेखा च‌िक‌ित्‍सक
गोंडा के अनूप कुमार (42) के दाहिने पैर का अंगूठा काला पड़ने लगा था। लोहिया संस्थान के कार्डियो वैस्कुलर थोरेसिक सर्जरी (सीवीटीएस) विभाग पहुंचे तो पता चला कि उन्हें गैंगरीन की शिकायत है और इलाज में देरी पर नि:शक्त भी हो सकते हैं।

डॉ. एसएस राजपूत ने बताया कि जांच के बाद पता चला कि दाहिने पैर की जांघ के पास स्थित फ्यूमोरल आर्टरी चर्बी और पथरी से सौ फीसदी ब्लॉक हो गई है।

रक्त का प्रवाह बंद हो गया था और पैर अंगूठे के पास से नीला पड़ने लगा था। ऐसी स्थिति में आर्टिफिशियल नस की मदद से पुरानी प्राकृतिक नस को बदल दिया जाता है। इस मामले में ऐसा नहीं किया गया।
विज्ञापन

आर्टरी बदली नहीं, ब्लॉकेज हटा दिए

लोहिया अस्पताल - फोटो : ‌अमर उजाला
डॉक्टर ने आर्टिफिशियल आर्टरी लगाने के बजाय एंड आर्कटेक्टोमी तकनीक से जांघ के पास स्थित फ्यूमोरल आर्टरी को घुटने के नीचे तक रिंग प्रॉसेस की मदद से खोला और रिंग प्रॉसेस की मदद से आर्टरी को साफ किया गया।

इसके बाद जगह-जगह खुली आर्टरी को बंद करने के लिए स्पेशल स्टिचेस लगाए गए। इसमें बाल से भी पतले टांके लगाए जाते हैं।

नस बदलने में लगते 90 हजार

डॉ. एसएस राजपूत बताते हैं कि नस में ब्लॉकेज, गांठ या पथरी आने पर नस को आर्टिफिशियल नस से बदल दिया जाता है। इस तरह के ग्राफ्ट प्रोसीजर में मरीज को 90 हजार रुपये खर्च होते हैं।

इस केस में नस को आर्टिफिशियल नस से बदलने की बजाय उसको एडआर टेक्नीक से साफ किया गया और रक्त प्रवाह को सुचारू किया गया और यह काम करीब 60 हजार रुपये में ही हो गया।

डॉ. राजपूत की मानें तो आर्टिफिशियल आर्टरी लगाने पर वो आर्टरी दो से दस साल के बीच खराब हो जाती जिसके बाद मरीज के पैर को काटना अंतिम उपचार होता है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें