लोकसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही उत्तर प्रदेश में सियासी दल करवट बदलने लगे हैं। भाजपा को यह अहसास हो चला है कि यूपी में मोदी की हवा भले ही हो, लेकिन जातीय समीकरण साधने के लिए उन्हें इस युवा नेता की जरूरत है।
ये भाजपा नए ठिकानों और ऐसे साथियों की तलाश में जुट गई हैं जो उनकी चुनावी नैया पार लगाने में मददगार बन सके।
अपना दल की अनुप्रिया पटेल और भाजपा के नेताओं के बीच दोस्ती की बात सबसे ज्यादा चर्चा में है। दोनों तरफ से बातचीत भी हो चुकी है, पर विलय व गठबंधन पर पेंच फंसा हुआ है।
भाजपा चाहती है कि अपना दल का उसमें विलय हो जाए। वहीं, अपना दल विलय के बजाय गठबंधन पर जोर दे रहा है।
मोदी की हवा, पर जमीनी हकीकत भी
राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि मोदी की हवा चलने के बावजूद उत्तर प्रदेश की जातीय गणित की अनदेखी नहीं की जा सकती है।
भाजपा के नेता भी जानते हैं कि चुनाव के दौरान जिस तरह प्रत्याशियों की जाति को लेकर लामबंदी होती है, उससे ऐन वक्त पर चुनावी समीकरण गड़बड़ा जाते हैं।
यूपी में लोकसभा चुनाव के दौरान उनका मुकाबला मुलायम सिंह यादव और मायावती से होना है, जिनके पास अपनी-अपनी जाति का बहुत मजबूत वोट बैंक है।
इसीलिए उनकी कोशिश है कि कुर्मियों में अच्छी पकड़ रखने वाले अपना दल को साथ लेकर जातीय गणित को भी दुरुस्त कर लिया जाए।
दूसरी तरफ अपना दल के नेता भी इस सच्चाई से अनजान नहीं हैं कि वह कुर्मियों का वोट भले ही हासिल कर लें लेकिन अकेले दम पर उनका बहुत विस्तार होने की संभावना नहीं है। इसीलिए वे भी भाजपा के साथ सफलता का सफर तय करने में दिलचस्पी ले रहे हैं।
इस फॉर्मूले पर हो रही बात
जानकारी के मुताबिक, अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल की भाजपा के कुछ प्रमुख नेताओं से मुलाकात व बातचीत भी हो चुकी है।
प्रदेश प्रभारी अमित शाह और प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी के साथ एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष से भी अनुप्रिया की लंबी बातचीत हुई है।
इसमें अनुप्रिया पटेल ने फतेहपुर, फूलपुर और प्रतापगढ़ की सीटें मांगी थी। भाजपा इस पर तैयार भी हो गई थी।
बाद में अनुप्रिया की तरफ से मिर्जापुर सीट की भी डिमांड की गई। भाजपा को इस पर भी कोई आपत्ति नहीं थी, पर बात फंस गई गठबंधन व विलय पर।
अनुप्रिया विलय को तैयार नहीं हैं। वे गठबंधन की पक्षधर हैं। हालांकि भाजपा के एक प्रमुख नेता का कहना है कि यह गुत्थी जल्द ही सुलझा ली जाएगी।
क्या कहते हैं ये दो सूरमा
देश में गठबंधन की राजनीति का दौर चल रहा है। मैं भी इससे अलग नहीं हूं। संवाद चलता रहता है, पर अपना दल का किसी पार्टी में विलय नहीं होगा। अपना दल को जिस दल या नेता में सामाजिक न्याय के सिद्धांत में प्रतिबद्धता दिखेगी, उसके साथ रहने का फैसला किया जाएगा’।
-अनुप्रिया पटेल, महासचिव, अपना दल
मुझे इस बारे में जानकारी नहीं है, पर जो भी भाजपा की नीतियों के साथ चलने को तैयार है, उसे साथ लेने में हर्ज भी नहीं है।
-डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा