लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण के संग्राम के साथ ही सूबे की कुछ सियासी हस्तियों की परीक्षा का भी वक्त आ गया।
खासतौर से अगले दो चरणों में होने वाले चुनावों में उन नेताओं की सीधी पहुंच व पकड़ की वास्तविकता सामने आने वाली है जो अब तक परदे के पीछे से अपनी-अपनी पार्टियों का काम कर रहे थे।
इनमें चुनावी सरगर्मी में अपने बयानों से गर्मी बढ़ाने वाले मो. आजम खां जैसे मुस्लिम चेहरे से लेकर राममंदिर आंदोलन के नायक बनकर उभरे कल्याण सिंह और मंदिर आंदोलन के चलते ही मुसलमानों के मसीहा बनकर उभरे मुलायम सिंह यादव तक शामिल हैं।
17 व 24 अप्रैल को होने वाले हैं मतदान
दूसरे व तीसरे चरण में पश्चिम से लेकर रुहेलखंड और ब्रजभू्मि पर चुनावी संग्राम होना है।
इस संग्राम में लोकसभा की 23 सीटों का फैसला होना है। इनमें 11 पर दूसरे व 12 पर तीसरे चरण में क्रमश: 17 व 24 अप्रैल को मत डाले जाएंगे।
इन सीटों पर समाजवादी पार्टी के आठ, कांग्रेस के छह, भाजपा के चार (निर्दल रूप से जीते कल्याण सिंह की एटा सीट मिलाकर), रालोद के तीन और बसपा के दो सांसद हैं।
सबसे ज्यादा चुनौती सपा और कांग्रेस के सामने ही है। इन्हें न सिर्फ अपनी मौजूदा सीटों को बरकरार रखना होगा बल्कि नई सीटें जोड़ने की जुगत भी सोचनी होगी।
वजह, यहीं के प्रदर्शन से इन पार्टियों और इनके नेताओं की दशा व दिशा तय होनी है। रालोद के सामने भी यही चुनौती है।
सबसे बड़ी चुनौती सपा के सामने
दूसरे व तीसरे चरण के चुनाव में सबसे ज्यादा अगर किसी पार्टी की साख दांव पर लगी है तो वह है समाजवादी पार्टी।
पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव का तो सब कुछ दांव पर लगा है। संभल से बात शुरू करें तो मुलायम सिंह खुद यहां से सांसद रह चुके हैं।
उनके भाई प्रो. रामगोपाल यादव भी एक बार यहीं से सांसद रह चुके हैं। हालांकि पिछले चुनाव में यहां बसपा जीती थी।
बदायूं में मुलायम के भतीजे धर्मेंद्र यादव मौजूदा सांसद हैं। मैनपुरी सीट से खुद सपा मुखिया ही सांसद हैं।
फीरोजाबाद सीट से इस समय हालांकि कांग्रेस के राज बब्बर सांसद हैं। पर, इस सीट से यादव परिवार के नए सदस्य और प्रो. रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव को राजनीति में एंट्री दिलाने की तैयारी है।
यह सीट इसलिए भी यादव परिवार के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बनी हुई है, क्योंकि यहां 2009 के चुनाव में पहले अखिलेश यादव ही जीते थे।
यादव परिवार के सामने है बड़ी चुनौती
इटावा यादव परिवार का घर ही है तो कन्नौज से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव चुनाव मैदान में हैं।
पार्टी के दूसरे कद्दावर नेता आजम की भी पूरी पूंजी भी इसी जमीन के चुनाव में कसौटी पर है। रामपुर तो आजम का घर ही है। इसलिए यहां प्रत्याशी कोई भी हो लेकिन जीत या हार आजम की होगी।
न सिर्फ रामपुर बल्कि उसके आसपास की सीटों पर सपा के पक्ष में पड़ने वाला मुस्लिम वोट आजम की पहुंच व पकड़ का पैमाना बनेगा।
इन नेताओं की भी प्रतिष्ठा दांव पर
रालोद के मुखिया चौधरी अजित सिंह के पुत्र जयंत मथुरा से मैदान में हैं। भाजपा ने यहां हेमामालिनी को मैदान में उतारा है।
स्वाभाविक है कि मथुरा के नतीजे जयंत का कम उनके पिता चौधरी अजित सिंह के कद को अधिक तय करेंगे। लोकसभा के पिछले चुनाव में कल्याण सिंह भाजपा के विरोध में खड़े थे।
इस बार वह चुनाव नहीं लड़ रहे हैं लेकिन उन्होंने अपनी जगह अपने बेटे राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया को अपनी सीट एटा से मैदान में उतारा है।
स्वाभाविक है कि एटा का नतीजा राजवीर से ज्यादा कल्याण के लिए महत्वपूर्ण होगा। साथ ही सूबे के इस सियासी दिग्गज का भविष्य भी तय करने वाला होगा।
हाथरस, फर्रुखाबाद, कन्नौज के नतीजे भी कल्याण की पकड़ व पहुंच बताने वाले होंगे। इसी जमीन पर भाजपा की मेनका गांधी तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद और दूसरे नेता जफरअली नकवी का भी भाग्य तय होना है।
ये रहे कुछ आंकड़ें
लोकसभा के पिछले चुनाव में स्थिति
नगीना-सपा, मुरादाबाद-कांग्रेस, रामपुर-सपा, संभल-बसपा, अमरोहा-रालोद, बदायूं-सपा, आंवला-भाजपा, बरेली-कांग्रेस, पीलीभीत-भाजपा, शाहजहांपुर-सपा, लखीमपुरखीरी-कांग्रेस, हाथरस-रालोद, मथुरा-रालोद, आगरा-भाजपा, फतेहपुरसीकरी-बसपा, फीरोजाबाद-कांग्रेस, मैनपुरी-सपा, एटा-निर्दल (भाजपा), हरदोई-सपा, फर्रुखाबाद-कांग्रेस, इटावा-सपा, कन्नौज-सपा, अकबरपुर-कांग्रेस
किसके कब्जे में कितनी संसदीय सीटें
सपा-8
कांग्रेस-6
भाजपा-4 (कल्याण सिंह को मिलाकर)
रालोद-3
बसपा-2
[रुहेहखंड और ब्रजभूमि के 23 सीटों के 2009 के चुनाव के आंकड़े]