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यूपी में राहुल ने कांग्रेस को दी 'जिंदगी' पर खड़ी हो गईं पहाड़ जैसी चुनौतियां

Fri, 07 Oct 2016 02:30 AM IST
अनिल श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ
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किसान यात्रा के दौरान राहुल गांधी
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विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने के लिए राहुल गांधी की पिछले महीने देवरिया से शुरू हुई किसान यात्रा बृहस्पतिवार को मेरठ से चलकर दिल्ली में समाप्त हो गई। राहुल की किसान यात्रा को हर जगह रिस्पांस तो अच्छा मिला और भीड़ भी ठीक-ठाक रही, लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या यह भीड़ वोट में भी तब्दील होगी?
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कांग्रेस को इस यात्रा का कितना फायदा होगा, यह तो चुनाव में पता चलेगा पर इसने कांग्रेसियों में थोड़ा-बहुत उत्साह जरूर पैदा कर दिया है। सुस्त बैठे कांग्रेसी सक्रिय हो गए हैं। उनमें उम्मीद की थोड़ी-बहुत किरण भी जगी है।

राहुल की किसान यात्रा से सूबे के सियासी खांचे में कांग्रेस को जगह मिलती दिखाई दे रही है। देखने वाली बात यह होगी कि राहुल ने जो शुरुआत की है, वह चुनाव तक कितनी बरकरार रह पाती है। किसान यात्रा के बाद कांग्रेस का फोकस अब जातियों की गोलबंदी पर होगा।
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किसान यात्रा में राहुल का खास फोकस किसानों पर ही रहा, लेकिन जहां मौका मिला वे जातीय गोलबंदी करने से भी नहीं चूके। देवरिया से दिल्ली तक तमाम जगहों पर खाट सभाओं के नाम पर उन्होंने जनता से जो सीधा संवाद किया उसमें पार्टी के रणनीतिकारों ने स्थानीय स्तर पर जातियों के प्रभाव का खास ध्यान रखा।

'कास्ट कार्ड' भी खेलने को तैयार कांग्रेस

राहुल की यात्रा का संदेश साफ था कि इस बार जंग जीतने के लिए कांग्रेस भी ‘कास्ट कार्ड’ खेलने को तैयार है। शायद यही वजह है कि इसे धार देने के लिए किसानों का सहारा लिया गया। प्रदेश में लगभग 67 लाख किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं। करीब 25 लाख किसान ऐसे हैं जिनके ऊपर बिजली का बकाया है।

कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि अगर किसान पार्टी के पाले में आ जाए तो जंग जीतना आसान हो सकता है। यही वजह है कि राहुल ने मोदी सरकार पर हमलावर रहते हुए सरकार बनने पर किसानों की कर्ज माफी और बिजली बिलों में छूट देने का वादा करके उनका समर्थन हासिल करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।

किसान यात्रा के समापन के साथ ही कांग्रेस के सामने कई चुनौतियां भी नजर आ रही हैं। मसलन विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के रणनीतिकार प्रशांत किशोर के कांग्रेस का साथ छोड़ने की चर्चाएं हैं, तो सीएम का चेहरा प्रोजेक्ट की गईं शीला दीक्षित ने चुनाव लड़ने से कदम पीछे खींचकर ऊहापोह की स्थिति पैदा कर दी है।

राहुल की यात्रा के दौरान शीर्ष नेता भले ही एकजुटता का संदेश देने की कोशिश करते नजर आए, पर संगठन में निचले स्तर पर खींचतान अभी भी जारी है। इसका असर चुनाव पर पड़ने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है।

केंद्र पर ज्यादा हमलावर रहे राहुल

अपनी 25 दिन की किसान यात्रा में राहुल प्रदेश की समाजवादी सरकार के प्रति सत्ता विरोधी रुझान (एंटी एंकेबेंसी) का फायदा उठाने की कोशिश करने के बजाय केंद्र की मोदी सरकार के प्रति ज्यादा हमलावर रहे।

कुछ मौकों पर उन्होंने अखिलेश सरकार पर भी निशाना साधा, लेकिन कुल मिलाकर सपा के प्रति रुख नरम ही रहा। इसे भविष्य के गठजोड़ का संकेत भी माना जा रहा है। राहुल और अखिलेश एक-दूसरे की तारीफ भी कर चुके हैं। साफ है कि कांग्रेस का मकसद भाजपा को सत्ता में आने से रोकना है।

खाट सभाओं से ज्यादा खाट लूटने की चर्चा
किसान यात्रा के दौरान राहुल ने देवरिया से लेकर मेरठ तक जगह-जगह खाट सभाएं करके  किसानों से संवाद किया। यात्रा की शुरुआत में ही जिस तरह से देवरिया में सभा के बाद खाटें लूटी गईं, उसकी चर्चा ज्यादा हुई। खाट सभा में कही-सुनी गई बातें पीछे हो गईं। कई अन्य जगहों पर भी खाट लूटने की घटनाएं हुईं।

कांग्रेस का साथ छोड़ सकते हैं पीके

प्रशांत किशोर व राहुल गांधी - फोटो : amar ujala
राहुल की किसान यात्रा के खत्म होने के साथ ही चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के पार्टी का साथ छोड़ने की चर्चाएं भी चल पड़ी हैं। जानकारों के मुताबिक कांग्रेस का इलेक्शन मैनेजमेंट संभाल रहे प्रशांत किशोर की टीम के कई सदस्य उनका साथ छोड़कर जा चुके हैं।

ऐसे में माना रहा है कि जल्द ही वह भी विदा ले लेंगे। हालांकि कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि पीके का पार्टी से चुनाव तक का एग्रीमेंट हैं और वे छोड़कर नहीं जाएंगे।

शीला का चुनाव लड़ने से इन्कार
प्रदेश में कांग्रेस की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार शीला दीक्षित ने विधानसभा चुनाव लड़ने से अनिच्छा जता दी है। उन्होंने अपनी मंशा से पार्टी आलाकमान को भी अवगत करा दिया है। हालांकि शीला का कहना है कि यह उनका अपना फैसला है। पार्टी आलाकमान का निर्णय ही अंतिम होगा। शीला के पुत्र संदीप दीक्षित पहले से ही इसके पक्ष में नहीं थे।

चुनाव न लड़ने के पीछे शीला दीक्षित का तर्क है कि वह किसी एक विधानसभा क्षेत्र में नहीं बंधना चाहती। पूरे प्रदेश में घूमकर कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए प्रचार करेंगी। खुद चुनाव लड़ने से उन्हें एक विधानसभा पर ज्यादा फोकस करना होगा।
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अ‌ब जातियों की गोलबंदी में जुटेगी कांग्रेस

किसान यात्रा के बाद कांग्रेस अब जातियों की गोलबंदी में जुटने जा रही है। योजना बनाई जा रही है कि जिस क्षेत्र में जाति विशेष की चुनाव में निर्णायक भूमिका हो, वहां सम्मेलन करके लोगों को जोड़ने की कोशिश की जाए।

ब्राह्मणों, अति पिछ़ड़ी जातियों तथा मुस्लिम बहुल इलाकों पर पार्टी का खास जोर रहेगा। इसके बाद नवंबर से प्रियंका वाड्रा को मैदान में उतारने की तैयारी है।

सभी बड़े नेताओं को लड़ाएंगे चुनाव
इस बार कांग्रेस सभी बड़े नेताओं को चुनाव लड़ाने की भी तैयारी कर रही है। इसमें पूर्व सांसद से लेकर पूर्व विधायक तक शामिल हैं। इसके जरिये कांग्रेस यह थाह भी लेना चाहती है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की अपने क्षेत्र में वोटरों पर पकड़ कितनी है।

बड़े नेताओं को चुनाव मैदान में उतारने के पीछे रणनीति यह भी बताई जा रही है कि इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ने के साथ-साथ विरोधी दलों पर भी मनोवैज्ञानिक दबाव बनेगा।
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