राज्यसभा व विधान परिषद में उम्मीदवारों के लिए वोटों का कोटा निर्धारित है कि कम से कम इतने मत मिलने वाला ही चुनाव जीतेगा। इसके बावजूद सभी उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला प्रथम वरीयता के मतों से हो पाना मुश्किल ही होता है।
इसकी वजह से उम्मीदवारों के दूसरी व तीसरी वरीयता के मत गिनकर अन्य उम्मीदवारों के खाते में जोड़ दिए जाते हैं। इसके चलते जीत का सेहरा ऐसे शख्स के सिर भी बंध सकता है, जिसे अभी कम आंका जा रहा है।
दूसरी ओर उन्हें मायूसी मिल सकती है, जो जीत को लेकर खासे आश्वस्त हैं। प्रिफरेंसियल (वरीयता क्रम के अनुसार) मतदान और मतगणना के फार्मूले के कारण किसी पार्टी के विधायकों की संख्या और प्रत्याशियों की संख्या में गुणा-भाग करके जीत व हार के अनुमान लगाना गलत साबित हो सकता है।
वरीयता क्रम के फार्मूलेे के चलते प्रथम वरीयता के मतों में भले ही कोई उम्मीदवार सबसे पीछे हो, लेकिन उसे द्वितीय या अन्य वरीयता के ज्यादा वोट मिल जाएं, तो वह प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकल सकता है।
राज्यसभा के लिए एक उम्मीदवार को न्यूनतम 34 और विधान परिषद के उम्मीदवार को न्यूनतम 29 वोटों की जरूरत है। राज्यसभा की 11 सीटों के लिए 12 उम्मीदवार मैदान में हैं।
विधान परिषद की 13 सीटों के लिए 14 उम्मीदवार लड़ रहे हैं। इस लिहाज से राज्यसभा के 12 उम्मीदवारों को प्रति उम्मीदवार 34 वोट के हिसाब से 408 वोट चाहिए, जबकि विधान परिषद में 14 प्रत्याशियों को 406 वोट चाहिए।
विधायकों की संख्या 403 ही है। जाहिर है कुछ को कोटे से कम वोट मिलने ही हैं। ऐसे में अगर किसी उम्मीदवार के एक-दो वोट भी निरस्त हो गए, तो उसके लिए और मुश्किल हो जाएगी।