कांशीराम की 10वीं पुण्यतिथि पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने सूबे की सत्ता के लिए भाजपा की ओर से रचे गए सियासी चक्रव्यूह की काट की रणनीति का संकेत कर दिया है।
विज्ञापन
हालांकि, उनकी पूरी रणनीति सपा की पारिवारिक कलह, कांग्रेस की कमजोरी और दलित व मुस्लिमों की एकजुटता पर टिकी हुई है। इसमें कोई भी उम्मीद से हटकर सामने आया तो चुनौती आसान नहीं होगी। इस फार्मूले की तमाम सीमाएं सामने हैं।
पिछले एक दशक से सूबे की सियासत में फर्श पर पड़ी भाजपा ने केंद्र की सत्ता में आने के बाद यूपी फतह को लेकर चक्रव्यूह रच दिया है। दूसरे दलों के प्रभावशाली नेताओं को अपनी पार्टी में लाना, मतदाताओं में बड़े दलित वर्ग को साधने के लिए धम्म चेतना यात्रा और डॉ. अंबेडकर से जुड़े कार्यक्रमों, गतिविधियों पर फोकस के साथ संगठन की जमीनी सक्रियता बढ़ाना शामिल है।
विज्ञापन
इसका सबसे ज्यादा नुकसान अगर किसी को हुआ है तो वह बसपा है। उसके कई प्रमुख नेता भाजपा में गए हैं। सेना की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ ने गैर भाजपा दलों की चुनौती मनोवैज्ञानिक तौर पर बढ़ा दी है।
राहुल ने विवादित बयान देकर खो दिया नतीजा
राहुल गांधी
दूसरी ओर सपा पारिवारिक कलह में उलझी हुई है और कांग्रेस उपाध्यक्ष ने अपनी किसान यात्रा के नतीजों को एक विवादित बयान से धो दिया है। ऐसे में बसपा के सामने सपा के विकल्प के रूप में सत्ता तक पहुंचने वाले समीकरण को सामने रखने का यह अच्छा मौका था। मायावती ने इसमें बिना देर किए चुनाव अभियान का शुभारंभ करने के साथ ही 22 फीसदी दलित और 18 फीसदी मुस्लिम मतों के फार्मूले को पेश कर दिया।
राजनीतिशास्त्री प्रो. गोपाल प्रसाद कहते हैं कि ये 40 फीसदी मतदाता यदि एकजुट हो जाएं तो बसपा को सत्ता में आने से कोई रोक नहीं सकता। बीते एक दशक में सूबे में 29-31 फीसदी वोट पाने वाले (2007 में बसपा को 30.43 फीसदी और 2012 में सपा को 29.1 फीसदी वोट मिले) पूर्ण बहुमत की सरकार बना लेते हैं। मगर, यह समीकरण सधना इतना भी आसान नहीं है।
प्रसाद कहते हैं कि आज की तारीख में मुसलमानों का बड़ा वर्ग अभी भी सपा के साथ है। बसपा की लखनऊ रैली में 80 फीसदी दलित और बमुश्किल चार-पांच फीसदी मुस्लिम रहे होंगे। बाकी अन्य वर्गों से लोग थे।
दूसरा, मुस्लिम सीट-टू-सीट निर्णय लेते रहे हैं। वे प्रदेशीय व राष्ट्रीय लीडरशिप की जगह अपने स्थानीय हित और परिस्थितियों को महत्व देते हैं।
भाजपा के विरोधी को जाता है मुस्लिम वोट
आमतौर पर यही देखा गया है कि जहां जो प्रत्याशी भाजपा को हराने की स्थिति में होता है, उसके साथ खड़े हो जाते हैं। मायावती को सत्ता में लाने के लिए मुस्लिम इस ट्रेंड को छोड़ देंगे, यह आसान नहीं है।
तीसरा, ज्यादा मुस्लिम बसपा के साथ रहेंगे या सपा के साथ, इस बात पर भी निर्भर करेगा कि मुलायम सिंह यादव के परिवार में संघर्ष किस नतीजे तक पहुंचता है। मायावती ने मुख्यमंत्री अखिलेश और उनके चाचा शिवपाल के बीच सत्ता संघर्ष को हवा देकर मुसलमानों को कुरेदा जरूर है, लेकिन यह कितना असर करेगा, इस पर कहना अभी जल्दबाजी होगी।
चौथा, बसपा अभी दलित और मुस्लिम के साथ सॉलिड एकजुटता के समीकरण से कभी भी अपने बलबूते सत्ता में नहीं पहुंची है। चौथी बार बसपा ने जब स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाई तब ब्राह्मण-ठाकुर जैसे अपरकास्ट भी पूरी दमदारी से उसके साथ खड़े थे।
इस बार मायावती शायद प्रमोशन में आरक्षण पर अपने खुले स्टैंड की वजह से अपरकास्ट के साथ आने को लेकर आशंकित हैं और उन्होंने ब्राह्मण-मुस्लिम और दलित के अपने पुराने सोशल इंजीनियरिंग की जगह खुल्लमखुल्ला ‘दलित-मुस्लिम’ की सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला रख दिया है। आगामी विधानसभा चुनाव में वह 100 से ज्यादा टिकट मुसलमानों को दें तो हैरान होने वाली बात नहीं होगी।
एजेंडे से सबको साधने का किया प्रयास
दूसरी पार्टियों ने चुनावी घोषणापत्र, विजन स्टेटमेंट के मुद्दों पर रुख अभी साफ नहीं है, मायावती ने खुद को सत्ता का विकल्प बताने के लिए ‘डीएम’ फॉर्मूला दिया बल्कि घोषणापत्र शब्द से परहेज करने के बावजूद अपना चुनावी एजेंडा भी साफ कर दिया।
इसमें उन्होंने सपा की लैपटाप, बेरोजगारी भत्ता व लोहिया आवास जैसी उन घोषणाओं का जवाब देने से भी परहेज नहीं किया जिसने अखिलेश को अच्छी पहचान दिलाई। साथ ही ऐसे मुद्दों को तवज्जो दी है जो सर्वसमाज खासकर मुस्लिमों में भरोसा पैदा कर सकें।
सर्वसमाज को सोचने के लिए अपने समय की कानून-व्यवस्था का हवाला दिया है तो एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग न होने का भरोसा दिया है। वहीं, मुस्लिमों को आकृष्ट करने के लिए राम मंदिर और बाबरी मस्जिद प्रकरण में सुप्रीमकोर्ट के आदेश का कड़ाई से पालन, मंदिर व मस्जिद की एक जैसी सख्त सुरक्षा और दंगे करने वाले सांपद्रायिक तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जैसे वादे किए हैं।
महिलाओं को साधने के लिए पुख्ता सुरक्षा का वादा किया है। आने वाले दिनों में इन मुद्दों पर ज्यादा स्पष्टता सामने आ सकती है।
दलित चिंतक प्रो. कालीचरण सनेही कहते हैं कि मायावती सर्वसमाज को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही हैं। इसीलिए उन्होंने ब्राह्मणों के सम्मेलन भी शुरू करवा दिए हैं। भाषण में भी वे सर्वसमाज की चर्चा करती हैं। पर, राजधानी की रैली में रणनीति के तहत उन्होंने मुस्लिमों पर फोकस किया।
वजह, बसपा को वोट करने वाले मुस्लिमों को लगता रहा है कि वे वोट तो बसपा को देते हैं लेकिन उनकी गिनती नहीं होती। उसका श्रेय नहीं मिलता। शायद इसीलिए वे अपनी सुविधा के हिसाब से बंट भी जाते हैं।
2014 की तरह मुस्लिम फिर न बटें जिसका फायदा भाजपा को हुआ था, मायावती ने उन्हें पूरी तरह अपने साथ आने का न्यौता दिया है। दूसरा, अभी तक गाय के बहाने मुस्लिम निशाने पर लिए जाते थे।
ऊना सहित कई घटनाओं से सामने आया है कि अब दलित भी गाय के बहाने उत्पीड़ित किए जा रहे हैं। दलित व मुस्लिमों को पास आने में ये नए घटनाक्रम भी काम कर सकते हैं।