युवाओं को सबसे बड़ी आशंका सरकारी नौकरियों को चरणबद्ध तरीके से सीमित किए जाने की सता रही है। आउटसोर्सिंग से जिस तरह भर्तियां तेजी से बढ़ रही हैं, युवाओं की चिंता भी बढ़ रही है। संयुक्त स्वास्थ्य आउटसोर्सिंग संविदा कर्मचारी संघ के प्रदेश महामंत्री सच्चितानंद मिश्र कहते हैं कि आउटसोर्सिंग में भर्ती से लेकर, नवीनीकरण तक कर्मियों का शोषण होता है। समय से मानदेय नहीं मिलता है और कई-कई महीने बाद आधा-अधूरा भुगतान किया जाता है। हजारों कर्मी नवीनीकरण के समय निकाले जा चुके हैं। जब भी कोई समस्या लेकर सरकार के पास जाता है, वह एक नया शासनादेश जारी कर देती है। अब तक चार-चार शासनादेश हो गए, लेकिन शोषण से कोई राहत नहीं मिली।
मिश्र कहते हैं, वास्तव में आउटसोर्सिंग एक धंधा है, जिसे सपा सरकार ने शुरू किया। मौजूदा सरकार में खूब फला-फूला और इसका कारोबार 800 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसमें आउटसोर्सिंग एजेंसी से लेकर सरकारी सिस्टम तक पूरी तरह मिले हुए हैं। समान पद के लिए अलग-अलग मानदेय है। सेवा प्रदाता की व्यवस्था समाप्त कर विभाग द्वारा रखने की व्यवस्था होनी चाहिए। सेवा प्रदाता कर्मचारियों के वेतन से 18 प्रतिशत जीएसटी व 5 प्रतिशत सर्विस चार्ज काटता है। विभाग से भर्ती पर यह पैसा कर्मचारी पा सकेंगे।
सरकार विरोधी मानसिकता से काम कर रहे कई अफसर
आउटसोर्सिंग के जरिए सरकार को सेवा दे रहे विजय शंकर द्विवेदी कहते हैं कि कुछ अफसर सरकार विरोधी मानसिकता से काम कर रहे हैं। इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि नियमित नौकरी को भी पांच वर्ष तक संविदा पर रखने की कोशिश की गई। इससे भी मन नहीं भरा तो चयन के बाद की यह संविदा अवधि सेवा में न जोड़ने का प्रस्ताव शामिल कर लिया। यही नहीं, चयनित लोगों की एक सीमा तक छंटनी का प्रावधान भी शामिल कर लिया। शुक्र यह रहा कि इस प्रस्ताव का समय से खुलासा हो गया और युवाओं के जबरदस्त विरोध से अफसरों को पैर पीछे खींचने पर मजबूर होना पड़ा। यह कोशिश फिर कब शुरू हो जाए, क्या पता? इस सिस्टम से युवाओं का भरोसा उठ चुका है।
पेपर लीक और परीक्षाओं में गलत सवालों से हुई किरकिरी
रिकॉर्ड सरकारी नौकरियों के दावों के इतर एक परेशान करने वाली तस्वीर यह भी है कि भर्ती बोर्डों व चयन आयोगों की मनमानी पर पूरी तरह अंकुश यह सरकार भी नहीं लगा पाई।
प्रतियोगी अभ्यर्थी ब्रजभूषण पांडेय कहते हैं कि परीक्षाओं में बड़ी संख्या में गलत सवाल, एक ही सवाल के हिंदी व अंग्रेजी में भिन्न-भिन्न अर्थ वाले विकल्पों ने अभ्यर्थियों को कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने को मजबूर कर दिया। बार-बार पेपर लीक होते रहे। 20 लाख से ज्यादा अभ्यर्थियों वाली टीईटी से उम्मीदें परवान चढ़ी थीं, लेकिन पेपर लीक ने उस पर भी पानी फेर दिया।
- एक अन्य प्रतियोगी छात्र अभिषेक सिंह कहते हैं कि लोकसेवा आयोग में परीक्षा नियंत्रक की गिरफ्तारी से लेकर टीईटी में परीक्षा नियामक प्राधिकारी तक सरकार केवल दिखाने की ही कार्रवाई करती नजर आई और अभ्यर्थी ठगा महसूस करते रहे।
- सीबीआई की जांच भी ढाक के तीन पात
- यूपी लोकसेवा आयोग की बेतुकी कार्यप्रणाली से युवा परेशान रहे। सरकार ने वादे के बावजूद सपा राज की भर्तियों में हुए फर्जीवाड़े के दोषियों पर कार्रवाई में रुचि नहीं दिखाई।
- सीबीआई जांच भी ढाक के तीन पात ही नजर आ रही है। वहीं, माध्यमिक व उच्चतर शिक्षा सेवा चयन बोर्ड/आयोग केवल पिछली सरकार की शुरू की भर्तियां निपटाने तक सीमित रहीं।
- अधीनस्थ सेवा चयन आयोग तो पिछले दो वर्ष में एक प्रारंभिक अर्हता परीक्षा (पीईटी) को छोड़ कोई नई भर्ती परीक्षा नहीं करा पाया है। सारे दावे बेमतलब साबित हुए हैं।
सरकार बनाने में युवाओं की भूमिका अहम
26.56 फीसदी वोटर 18 से 29 आयु वर्ग के थे 2019 के लोकसभा चुनाव में। पंचायत चुनाव के समय 46.19% वोटर 18 से 35 आयु वर्ग के थे राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार।
इनमें 78.37 लाख तो 18 से 21 वर्ष वाले थे। ये आंकड़ा गांवों का है। और बढ़ेगी संख्या। 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए पुनरीक्षित वोटर लिस्ट तैयार हो रही है। इसमें बड़ी संख्या में नए युवा वोटर जुड़ रहे हैं।
गरीबों के लिए तो मनरेगा ही सहारा
- वित्त वर्ष 2019-20 में मनरेगा ने प्रदेश के 64.54 लाख लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया था। इनमें से 1.33 लाख परिवारों ने 100 दिन का रोजगार प्राप्त किया था।
- वित्त वर्ष 2020-21 में जब कोविड महामारी आई तो रिकॉर्ड एक करोड़ 16 लाख 55 हजार लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया। इनमें 7,78,792 परिवारों को 100 दिन का रोजगार प्राप्त हुआ।
- 2021-22 में 13 दिसंबर तक 82.85 लाख लोगों को रोजगार प्राप्त हो चुका है। इनमें 1,60,421 परिवार 100 दिन का रोजगार प्राप्त कर चुके हैं। खास बात ये है कि लगभग 97 फीसदी लोगों को 15 दिन के भीतर मजदूरी का भुगतान हो रहा है।