प्रदेश सरकार ने मनरेगा को भी जनहित गारंटी अधिनियम के दायरे में शामिल कर लिया है। मनरेगा कानून के तहत काम मांगने वालों को मांग से 15 दिन के भीतर काम मुहैया कराना होगा।
ऐसा न करने पर संबंधित अधिकारी को जुर्माना देना होगा। सरकार ने इस सिलसिले में आदेश जारी करते हुए शिकायतों की सुनवाई करने वाले अधिकारियों के नाम भी तय कर दिए गए हैं।
अधिकारियों को दो चरणों में 14 दिनों में सुनवाई पूरी करके फैसला करना ही होगा।दरअसल, प्रदेश में मनरेगा के तहत काम देने में हीलाहवाली पर रोक नहीं लग पा रही है।
कई बार निर्देश देने के बावजूद मजदूरों को तय समय में काम मुहैया नहीं कराया जाता है। इसे देखते हुए सरकार ने मनरेगा को जनहित अधिनियम के दायरे में शामिल करने का फैसला किया है।
जनहित गारंटी कानून
लोगों को भ्रष्टाचार से निजात दिलाने के लिए जनवरी 2011 में प्रदेश में जनहित गारंटी कानून लागू किया गया था। प्रथम चरण में यह कानून राजस्व, नगर विकास, चिकित्सा व स्वास्थ्य तथा खाद्य-रसद विभाग के कुछ कामों पर लागू किया गया था। धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ाते हुए अन्य कामों को इसमें शामिल किया जा रहा है।
कानून के तहत संबंधित कर्मचारी व अधिकारी को तय समय सीमा में काम पूरा करना होता है। ऐसा न करने पर उसके वेतन से प्रतिदिन की दर से जुर्माना काट लिया जाता है।
यह जुर्माना तब तक देना होता है, जब तक संबंधित अधिकारी या कर्मचारी वह काम नहीं कर देता।
अगर अधिकारी या कर्मचारी किसी तर्क के आधार पर प्रार्थना पत्र को निरस्त करता है या फिर कोई जवाब ही नहीं देता है, तो उच्च अधिकारियों के सामने अपील की जा सकती है। अपील पर सुनवाई पूरी करके फैसला देने की भी समय सीमा निर्धारित रहती है।
मनरेगा की व्यवस्था
व्यक्ति को मांग की तारीख से 15 दिन में काम मुहैया कराने की जिम्मेदारी कार्यक्रम अधिकारी / खंड विकास अधिकारी की होगी। ऐसा न करने पर जुर्माना लगेगा।
कार्यक्रम अधिकारी / खंड विकास अधिकारी अगर कोई तर्क देते हैं तो या चुप्पी साध लेते हैं तो अतिरिक्त जिला कार्यक्रम अधिकारी/ मुख्य विकास अधिकारी के समक्ष अपील की जा सकती है।
इस अपील पर सात दिन में सुनवाई पूरी करके फैसला देना होगा। अतिरिक्त जिला कार्यक्रम समन्वयक अधिकारी/ मुख्य विकास अधिकारी के फैसले के खिलाफ जिला कार्यक्रम समन्वयक अधिकारी/ जिलाधिकारी के यहां अपील की जा सकेगी। इन्हें भी सात दिन में मामले का निपटारा करना होगा।