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25 साल बाद भी आधी-अधूरी शहरी सरकार: 74वें संविधान संशोधन के प्रावधान अभी पूरे लागू नहीं

Mon, 11 Dec 2017 09:10 PM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
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शहरी निकायों में जीत की खुमारी खत्म होने को है, मंगलवार को नए मेयर-सभापति-अध्यक्ष शपथ ले लेंगे। इसके बाद होगा कड़वी हकीकतों से सामना। जनता की अंतहीन समस्याओं का सिलसिला। अधिकार न होने का दुखड़ा। संविधान के 74वें संशोधन के जरिए शहरी निकायों को सही मायने में शहरी सरकार बनाने की कोशिश हुई थी। लेकिन, 25 साल बाद भी वह सपना आकार नहीं ले पाया है। कहीं, नौकरशाही बाधक बनी, तो कहीं, विधायक-सांसदों-मंत्रियों को अपनी हनक कम होने का संकट सताने लगा। राज्य सरकार ने भी गंभीरता नहीं दिखाई...
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...अब प्रदेश में दो को छोड़कर सभी निगमों में भाजपा के मेयर चुने गए हैं। दिल्ली से लखनऊ तक सरकार भी उसी की है। जिन मेयर की अगुवाई में भाजपा ने बीते दस साल अधिकार पाने का संघर्ष चलाया, वे उप-मुख्यमंत्री हैं। ऐसे में सवाल यह है कि निकायों को उनका सही दर्जा मिलेगा या यह शहरी सरकारें यूं ही चलती रहेंगी?

विधान में 74वां संशोधन करके नगरों को अपनी स्थानीय सरकार देने का सपना कम से कम उत्तर प्रदेश में अभी तक अधूरा ही है। संशोधन लागू हुए तो दो दशक से ऊपर बीत चुके हैं लेकिन प्रत्यक्ष चुनाव प्रक्रिया और सभी निकायों के प्रशासन में हर वर्ग को भागीदारी देने के लिए आरक्षण व्यवस्था लागू करने को छोड़कर और कुछ भी ऐसा ठोस काम नहीं हुआ है जो शहरों में अपनी सरकार का सपना पूरा होने की उम्मीद जगाए। साथ ही शासन के विकेंद्रीकरण की मंशा पूरी करता दिखे। हालांकि भाजपा ने निकाय चुनाव के अपने संकल्प पत्र में इस संशोधन को लागू करने का वादा किया है लेकिन स्थितियों के मद्देनजर इसका अक्षरश: पूरा हो पाना काफी मुश्किल नजर आता है।
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राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सत्ता के विकेंद्रीकरण का सपना सच करने के लिए संविधान में 73वां और 74वां संशोधन का फैसला किया गया था। इसमें 73वें संशोधन के तहत पंचायतों को स्थानीय व्यवस्थाओं के सारे अधिकार मिलने थे और 74वें संशोधन से नगरीय निकायों को एक तरह से संबंधित नगर के विकास की पूरी जिमेदारी सौंपी जानी थी। जिसमें नगरीय योजना से लेकर यातायात और जन सुविधाएं तक शामिल थीं। पर, अभी तक यह आधी-अधूरी तरह से ही लागू हैं।

विकेंद्रीकति व्यवस्‍था की दरकार

- फोटो : amar ujala
स्वतंत्रता के बाद देश में संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। संविधान की 5वीं अनुसूची के सातवें शिड्यूल में नगरीय शासन को राज्यों को विधायी शक्ति दी गई। इसी के तहत वर्ष 1959 में तत्कालीन सरकार ने नगर महापालिका अधिनियम बनाया। आजादी के बाद नगरों में तेजी से आबादी की बढ़ोतरी को देखते हुए वर्ष 1963 में तत्कालीन सरकार ने ग्रामीण और शहरी संबंधों पर एक कमेटी गठित की।

जिसे बढ़ती नगरीय आबादी, गांवों से शहरों में पलायन की समस्या के साथ-साथ केंद्र और राज्यों से स्थानीय नगरीय प्रशासनिक इकाइयों को जोड़ने की विकेंद्रीकृत व्यवस्था के बारे में अध्ययन करना था। साथ ही शिक्षा, नागरिक जागरूकता और विकास में स्थानीय संसाधनों की भूमिका तथा सामाजिक एवं आर्थिक विकास के बारे में अध्ययन करके सिफारिशें देनी थी। समिति ने सिफारिश की कि इन समस्याओं के समाधान के लिए स्थानीय निकाय प्रशासन इकाई अर्थात् नगर पालिका को संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए। तभी कोई हल निकल सकता है, जिसमें स्पष्ट विकेंद्रीकरण के साथ शक्तियों, कर्तव्यों और संसाधनों का वितरण भी शामिल हो।

मामले पर उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा का कहना है कि नगरीय निकायों को बहुत सारे अधिकार मिले हुए हैं। स्थानीय सरकारों अर्थात नगरीय निकायों से अच्छे समन्वय के साथ काम हो रहा है। रही 74वें संशोधन को लागू करने की बात तो इस बारे में मुख्यमंत्री और नगर विकास मंत्री के साथ बातचीत होगी। हम अपने संकल्प पत्र को लागू करने के लिए संकल्पबद्ध हैं।

1 जून 1993 से राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया गया

1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने काम शुरू कराया। पर, बोफोर्स तोप घोटाले के चलते संपूर्ण विपक्ष ने लोकसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। नतीजतन यह संशोधन प्रवर समिति को चला गया। आखिरकार 1992 में 73वां और 74वां संशोधन पारित हुआ। जिसे 1 जून 1993 से राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया गया। चूंकि नगर प्रशासन राज्यों की सूची का विषय है। इसलिए राज्यों को संविधान के अनुच्छेद 243 (जेडएफ) के तहत इसे लागेू करने के लिए एक वर्ष का मौका दिया गया। जिससे वे अपने स्थानीय अधिनियमों में संशोधन के अनुुसार बदलाव कर लें।

संशोधन लागू करने की शुरुआत
यूपी में 31 मई 1994 को ‘नगर महापालिका अधिनियम’ को परिवर्तित करके ‘उ.प्र. म्युनिसिपल कॉरपोरेशन एक्ट 1959’ के रूप में परिभाषित कर लागू किया गया। इसके तहत राज्य में पंचायतों और नगरीय शासन के  चुनाव के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना हुई।

राज्य वित्त आयोग का गठन हुआ। वार्डों का परिसीमन हुआ जिससे प्रतिनिधियों का स्थानीय लोगों से ज्यादा से ज्यादा संवाद रह सके। सभी को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण व्यवस्था लागू की गई। सामान्य, सामान्य महिला, पिछड़ा, पिछड़ा महिला, एससी, एससी महिला, एसटी व एसटी महिला के लिए हर पद पर प्रतिशत निर्धारित करके आरक्षण किया गया। मेयरों अर्थात नगर प्रमुखों का सीधे जनता से चुनाव कराने की व्यवस्था बनी।

मूल काम ही रह गए बाकी
यह संशोधन पूरी तरह मूर्त रूप नहीं ले पाया। संशोधन के तहत संविधान की 12वीं अनुसूची के अनुच्छेद 243 (डब्लू) में जिन शक्तियों का हस्तानान्तरण स्थानीय निकायों को होना था वह अभी तक नहीं हो पाया। जो हुए भी वह आधू-अधूरे। यहां एक विडंबना का उल्लेख और जरूरी है। बकौल पुरी, ‘म्युनिसिपल एक्ट तो 1959 में बनकर 1960 से लागू हो गया। इसके तहत नगर प्रमुखों का चुनाव भी होने लगा। पर, 2002 तक लगभग 40 साल यूपी मेयर काउंसिल की बैठक ही नहीं हो पाई। इस कारण भी नगरीय प्रशासन और राज्य सरकारों के बीच ठीक से समन्वय नहीं रहा। वर्ष  2002 में लखनऊ के तत्कालीन महापौर डॉ. एस.सी. राय  की पहल और प्रयासों पर 2 जनवरी 2002 को यूपी मेयर काउंसिल की बैठक लखनऊ में हुई। इसके बाद 12 नवंबर 2002 को आल इंडिया मेयर काउंसिल की बैठक भी लखनऊ में हुई। दोनों ही बैठकों में तत्कालीन प्रधानमंत्री व लखनऊ से सांसद अटल बिहारी वाजपेयी शामिल हुए।  जिसमें तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार और वेंकैया नायडू ने भी हिस्सा लिया। जिनमें 74वें संविधान संशोधन को पूरी तरह लागू करने की मांग उठी।’

केंद्र की कोशिशों पर प्रदेश सरकारों ने फेरा पानी

मंशा यह थी कि महापौर या अध्यक्षों के अधीन सभी विकास एजेंसियां जनता द्वारा निर्वाचित स्थानीय स्तर पर चुने गए जन प्रतिनिधियों की देखरेख में काम करें और एक ही जगह से जनता के अधिकतर सरोकारों से जुड़े काम हो जाया करें। केंद्र में 2004 में बनी मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने नगरों के विकास के लिए जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम ) लागू करते हुए कहा कि इसके तहत उन्हीं राज्य सरकारों को केंद्र अपने हिस्से का धन देगा जो 74वां संशोधन पूरी तरह लागू कर देंगे। पर, प्रदेश सरकारों ने हीलाहवाली की।

कांग्रेस भी दबाव में आ गई और इस आरोप से बचने के लिए कि उसकी महत्वाकांक्षी योजना लागू होने से पहले ही दम तोड़ गई, इस चेतावनी के साथ धन जारी कर दिया कि भविष्य में धन नहीं दिया जाएगा। प्रदेश में जो गैर भाजपाई सरकारें रहीं उन्होंने जल संस्थान के अध्यक्ष पर महापौर को नियुक्त करने पर अड़ंगे डाले।

लागू होने से ये लाभ होंगे
संविधान संशोधन लागू होने से पूरी तरह छतरी प्रणाली स्थापित हो जाएगी। शहर की सारी समस्याओं के समाधान की जिमेदारी संबंधित नगर निकाय की होगी। लोगों को सुविधा रहेगी और उन्हें अपनी रोजमर्रा की समस्याओं के लिए कई विभागों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। विकास के कामों में खींचतान नहीं होगी। इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। अवैध कालोनियों का निर्माण नहीं हो पाएगा।

एलडीए और टाउन प्लानिंग पूरी तरह निकायों के हाथ में आ जाएगी। इससे निकायों का आर्थिक ढांचा भी मजबूत होगा। यातायात की व्यवस्था आने से अतिक्रमण और जाम की जिमेदारी तय हो सकेगी। अभी पुलिस, कहीं विकास प्राधिकरण तो कहीं आवास -विकास परिषद की जिम्मेदारी होने से समन्यवय नहीं दिखाई देता। स्मार्ट सिटी और अमृत योजना का काम और ज्यादा प्रभावी तरीके से उत्तर प्रदेश में दिखाई देता।

इन अधिकारों का अब भी इंतजार

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नगरीय नियोजन : इसके अंतर्गत पूरी नगरीय विकास योजना मतलब सिटी प्लानिंग और विकास प्राधिकरण निकायों के नियंत्रण में आने थे। नगरों का मास्टर प्लान बनाने का काम भी निकायों को मिलना था। पर, यह नहीं हुआ।

भूमि उपयोग नियमन (रेगुलेशन) और भवनों का निर्माण : मानचित्र स्वीकृत करने का अधिकार निकायों को मिलना था। अभी यह काम विकास प्राधिकरणों और आवास-विकास परिषद के पास है। कई बार बात चली लेकिन न तो अधिकारियों ने ही ऐसा होने दिया और न सरकार ने इच्छाशक्ति दिखाई।

आर्थिक तथा सामाजिक विकास योजना : गरीबों और पिछड़ों की तरक्की के काम निकायों के जरिये ही होने थे। ये काम करने वाले विभाग स्थानीय स्तर पर निकायों के अधीन होने थे। पर, अड़ंगेबाजी के कारण अभी तक नहीं हो पाया।

- अग्नि शमन सेवाएं पूरी तरह निकायों के अधीन होनी थी। पर, अभी तक यह नहीं हो सका है।

- शहरों की यातायात व्यवस्था निकायों को सौंपी जानी थी। इस पर भी अभी तक अमल नहीं किया गया। नगरीय वानिकी पर्यावरण व प्रदूषण के भी सारे काम निकायों के जरिये होने थे। मतलब, इस संबंध में सारे

- प्रमाण पत्र भी निकायों से उद्योग-धंधों को मिलने थे। पर, यह संभव नहीं हो पाया।

- बस स्टॉपेज की जमीनों का हस्तांतरण भी नहीं हुआ।

- नगरीय गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के तहत गरीबों को रोजगार के लिए चलने वाली सरकारी योजनाएं और इन्हें संचालित करने वाले विभाग स्थानीय स्तर पर निकायों के अधीन रहने थे। पर, नहीं हुआ।

- मलिन बस्ती सुधार एवं उन्नयन (स्लम डेवलपमेंट बोर्ड) का काम भी निकायों के माध्यम से होना था। पर, इसमें भी अड़ंगा पड़ गया।

- दिव्यांग एवं मानसिक रूप से मंद व्यक्तियों सहित समाज के कमजोर वर्गों के लिए सरकार की तरफ से चल रही योजनाओं का स्थानीय स्तर पर क्रियान्वयन भी निकायों के जरिये होना था। यह भी नहीं हो पाया।

नौवें स्‍थान पर उत्तर प्रदेश

सीएम योगी आदित्यनाथ
संविधान के 74वें संशोधन को लागू करने के मामले में उत्तर प्रदेश नौवें स्थान पर है। यहां की उपलब्धि 88.70 प्रतिशत बताई गई है। तमिलनाडु 96.20 प्रतिशत के साथ सबसे आगे है। पर, बात घूम-फिरकर वहीं आ जाती है कि इसमें 12वीं अनुसूची के वे अधिकार, जिनसे निकाय वास्तव में स्थानीय सरकार का रूप ले सकते थे, वे नहीं दिए गए।

12वीं अनुसूची के अधिकार हस्तांतरण में शून्य
देश में अभी तक सिर्फ 11 राज्यों में 12वीं अनुसूची के अधिकार हस्तांंतरित किए। इनमें उत्तर प्रदेश कहीं नहीं है। जिन राज्यों ने इन्हें स्थानीय निकायों को हस्तांतरित कर दिया है, उनमें छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, पंजाब और चंडीगढ़।

मेट्रोपोलिटन सिटी का सपना दूर
उत्तर प्रदेश में मेट्रोपोलिटन सिटी का सपना सच होना अभी बहुत दूर है। प्रदेश का कोई शहर मेट्रोपोलिटन नहीं है। रहा रेंट कंट्रोल एक्ट और स्टांप ड्यूटी का मामला तो यह पहले भी लागू था।

‘अटल मिशन’ में भी इसका प्रभाव दिखा है। इसमें भी काफी पीछे है। मध्य प्रदेश अपने तीन शहरों के साथ सबसे आगे है। गुजरात भी आगे है। मतलब जहां यह शिड्यूल लागू है वहां के शहर आगे हैं।

राह में दुश्वारियां... 74वें संविधान संशोधन को लागू करने की

राह में कई दुश्वारियां हैं। एक तो इस संशोधन के लागू होने के बाद एक तरह से नगरों के स्तर पर कई विभाग निकायों के अधीन आ जाएंगे। इस पर नौकरशाहों का राजी होना काफी मुश्किल दिखता है। कारण, एक तरह से उनकी रोब-दाब के लिए खतरा जो खड़ा है। मंत्रियों का भी जलवा कम होगा।

सिफारिशें ठंडे बस्ते में... मनमोहन सरकार के समय विधि मंत्री रहे वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में बने प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी प्रधानमंत्री से निकायों को सशक्त करने की सिफारिश करते हुए 74वां संशोधन लागू करने को कहा। इससे पहले वित्त आयोग भी ऐसी ही अनुशंसा कर चुका था। यह भी कहा कि जो राज्य इसे लागू नहीं करेंगे तो धन आवंटन पर रोक लगा दी जाएगी।

जो मिले, वे भी पूरे नहीं
शहरों की सभी सड़कें और पुल नगर निकायों के अधिकार क्षेत्र में आने थे। पर, यह अधिकार भी आधे-अधूरे ही मिले। नगरों के भीतर की वही सड़कें नगर निकाय के पास हैं जो उसकी अपनी हैं। शेष सड़कें प्राधिकरण, आवास विकास परिषद, राज्य और जिला योजना, स्टेट हाईवे और नेशनल हाईवे के अधिकार क्षेत्र में हैं। जिससे इनका सही रखरखाव नहीं हो पाता।

घरेलू औद्योगिक तथा वाणिज्यक प्रयोजनों पूरी चल प्रणाली निकायो को मिलनी थी। पर, यह नहीं हो पाया। जलसंस्थान आया तो आधा-अधूरा। बजट और बोर्ड अलग है।

नगरीय विकास अभिकरण शामिल तो हो गया लेकिन सिर्फ कहने के लिए। निगरानी का अधिकार जिला प्रशासन को है। नगर आयुक्त को है तो उतना नहीं जितना जिलाधिकारी को। वैसे भी व्यावहारिक रूप से नगर आयुक्त जिलाधिकारी के समान अधीनस्थों पर असर नहीं डाल पाते।
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नहीं मिल पाए अभी तक ये अधिकार

- जलसंस्थान आए लेकिन जल निगम अभी तक नहीं आए।

- नागरिक सुविधाएं जैसे पार्क, बगीचे तथा खेल के मैदान आदि भी पूरी तरह नहीं मिले हैं। कुछ पार्क हैं कुछ नहीं हैं। प्राधिकरण, और आवास-विकास के पार्क नहीं मिले हैं। स्टेडियम भी इनके अधीन नहीं हैं। अन्य कई मैदान भी निकायों को नहीं मिले हैं।

- सांस्कृतिक, शैक्षिक एवं अन्य संस्थाओं के पूरे अधिकार नहीं। संशोधन के अनुसार, नगर के शैक्षिक संस्थान और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र नगर निकायों को मिलने थे। पर, निकायों के पास उन्हीं का अधिकार है जो उनके अपने हैं।

- कांजी हाऊस कुछ हैं तो कुछ नहीं। स्लाटर हाउस भी पूरी तरह नहीं मिले।

- जन स्वास्थ्य, सफाई, स्वच्छता एवं कूड़ा-करकट प्रबंधन का काम भी पूरा नहीं मिला। निकायों के पास वही चिकित्सालय हैं जो उनके अपने हैं। संशोधन के अनुसार, निकायों को अपने शहर के सभी चिकित्सालयों का नियंत्रण मिलना था।

मंथन कर रहे हैं...
नगर विकास मंत्री सुरेश खन्ना का कहना है कि हम 74वें संविधान संशोधन को लागू करने के सिद्धांतत: पक्ष में हैं। पर, इसे लागू करना बड़ी प्रक्रिया है। कई जटिलताएं भी हैं। इन पर मंथन किया जा रहा है।
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