अपने स्तर पर हमें जो सूचनाएं मिली हैं, उनका प्रभाव आप भाजपा और सपा गठबंधन के नेताओं के बयानात से देख लीजिए। सपा और गठबंधन नेताओं में सरकार बनने के प्रति पूर्ण आश्वस्त होने का भाव है। भाजपा नेता हताश दिख रहे हैं। अभी तक के चारों चरणों में सपा और उसके सहयोगियों को निर्णायक बढ़त मिल चुकी है।
पूर्वांचल में सपा के प्रमुख मुद्दे?
मुद्दे वही हैं, जो चुनाव के प्रारंभ में थे। किसान और नौजवान हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता में हैं। अच्छी फसल और बेहतर बाजार व्यवस्था से कृषि क्षेत्र को मजबूती मिलती है। युवाओं को रोजगार चाहिए। इसी के साथ हम कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ करेंगे। संपूर्ण अर्थव्यवस्था को दुनिया और आधुनिक तकनीक से जोड़ेंगे। इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास, एक्सप्रेसवे, मेट्रो पहले से हमारी परिकल्पना हैं। निराश्रित, गरीब और वृद्ध महिलाओं को समाजवादी पेंशन देंगे।
कानून-व्यवस्था को लेकर पीएम, सीएम से लेकर तमाम भाजपा नेता सपा पर हमलावर हैं, कैसे जवाब देंगे?
जनता ने पांच साल भाजपा सरकार की कार्यप्रणाली देखी है। सभी को पता है कि उसका प्रदर्शन कैसा रहा। कानून-व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल में पुलिस के आधुनिकीकरण पर खास ध्यान दिया। डायल-100 जैसी विश्वस्तरीय सुविधा दी। भाजपा ने पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए कुछ नहीं किया। इनका पूरा एजेंडा सांप्रदायिकता फैलाने का है। काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। बरगलाने वालों की दाल अब नहीं गलने वाली।
अखिलेश पिछड़ी जातियों की गणना की घोषणा कर रहे हैं, इसका असर?
ओबीसी की जातिवार गणना कराना वस्तुत: सामाजिक न्याय के आंदोलन की अवधारणा का हिस्सा है। इसकी लंबे समय से मांग हो रही है। दरअसल, ओबीसी जातियों के वास्तविक आंकड़े नहीं होने से आरक्षण और नौकरी के सवाल पर इन जातियों में अंतर्विरोध पैदा करने, संघर्ष कराने और भ्रम पैदा करने की कोशिशें की जाती रही हैं। अखिलेश यादव ही नहीं, ओबीसी से जुड़े देश के सभी प्रमुख नेताओं ने संसद में जातीय गणना कराने की मांग की थी। भाजपा दलितों, पिछड़ों के आरक्षण की विरोधी है, इसलिए जातिगत गणना का विरोध करती है।
भाजपा आरक्षण विरोधी कैसे है?
सार्वजनिक तौर पर कहें या न कहें, लेकिन सैद्धांतिक तौर पर भाजपा ओबीसी आरक्षण पर मंडल कमीशन की सिफारिशों को उलटना चाहती है। संघ और भाजपा अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़े वर्ग के आरक्षण की अवधारणा के खिलाफ हैं। डॉ. लोहिया ने इन वर्गों के लिए विशेष अवसर का सिद्धांत दिया था। चूंकि भाजपा आरक्षण के पक्ष में नहीं है, इसलिए 69 हजार शिक्षक भर्ती में पिछड़ों, दलितों के अधिकारों को छीना गया। विश्वविद्यालयों और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों की भर्तियां भी इसके उदाहरण हैं। एक-एक विभाग को यूनिट मानकर भर्ती कर ली गई, ताकि आरक्षित अभ्यर्थियों को नौकरी से वंचित किया जा सके।
मेरा रिश्ता भावनात्मक, अखिलेश तय करेंगे भूमिका
चुनाव नहीं लड़ने और चुनाव बाद भूमिका पर अंबिका चौधरी ने कहा कि सपा से मेरा भावनात्मक रिश्ता है। स्थापना के समय से ही पार्टी से जुड़ा रहा हूं। राजनीतिक दुर्घटनावश मुझे एक बार सपा से जाना पड़ा, लेकिन फिर लौट आया हूं। मेरी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है, न ही कोई योजना या नेतृत्व से कोई मांग। मैं 25 साल विधायक रहा हूं। मेरी जो भी भूमिका होगी, अखिलेश यादव तय करेंगे।