सबसे पहले बात गोंडा की। यहां की कर्नलगंज विधानसभा सीट से अजय प्रताप सिंह उर्फ लल्ला भइया भाजपा के मौजूदा विधायक हैं। लल्ला भइया काफी समय से अस्वस्थ चल रहे हैं। लिहाजा भाजपा ने उनका टिकट काट दिया। लल्ला अपने बेटे शारदेन मोहन सिंह के लिए टिकट मांग रहे थे। लेकिन टिकट दिया गया परसपुर के ब्लॉक प्रमुख अजय सिंह को। बताते हैं कि अजय कैसरगंज के भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के ग्रुप के हैं। लल्ला भइया के समर्थकों का आरोप है कि सांसद की पैरवी से ही शारदेन का पत्ता कटा।
शारदेन ने भी इसे बड़ी साजिश मानते हुए अपने परिवार के दशकों से राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे पूर्व मंत्री योगेश प्रताप सिंह के पक्ष में उतरने का फैसला कर चौंकाऊ कदम उठा लिया। लल्ला भइया और योगेश के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का आलम यह रहा है कि दोनों के दल चाहे जो रहे, लेकिन चुनाव में दोनों आमने-सामने ही रहे। इस बार शारदेन भी योगेश से दो-दो हाथ करने की तैयारी में टिकट मांग रहे थे। लेकिन बदली परिस्थितियों में शारदेन ने भाजपा प्रत्याशी अजय के खिलाफ योगेश के पक्ष में उतरने का फैसला कर लिया।
वहीं, सपा प्रत्याशी योगेश के लिए ऐन चुनाव के बीच यह घटनाक्रम किसी सपने के सच होने से कम नहीं है। गोंडा के सियासी इतिहास में इसे बड़े उलटफेर के तौर पर देखा जा रहा है। योगेश ने भी इस नई सियासी दोस्ती का लाभ उठाने के लिए न सिर्फ शारदेन के साथ सांसद पर तीखे हमलों की बौछार की, बल्कि शारदेन के प्रति सहानुभूति का मजबूती से हाथ भी बढ़ाया। उन्होंने यह साबित करने के लिए सपा मुखिया अखिलेश यादव से कर्नलगंज की जनसभा में शारदेन को लोकसभा चुनाव की तैयारी की हरी झंडी भी दिलवा दी।
मतलब साफ है, यदि सपा ने 2024 में शारदेन को प्रत्याशी बनाया, तो वे कैसरगंज सांसद बृजभूषण को चुनौती देंगे। पूर्व मंत्री विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह के निधन के बाद सपा को वैसे भी कैसरगंज लोकसभा सीट से किसी स्थानीय मजबूत चेहरे की तलाश थी। अब यह लल्ला भइया के परिवार से पूरी होती दिख रही है। बृजभूषण भी 2024 की तैयारी में अपने संसदीय क्षेत्र के हर विधानसभा क्षेत्र में अपने समर्थकों को स्थापित करने में जुटे हैं। माना जा रहा है कि इस उठापटक का असर कैसरगंज के साथ गोंडा की सीट पर भी पड़ सकता है।
अंबेडकरनगर के सांसद रितेश न पिता के साथ न बसपा के पक्ष में
अंबेडकरनगर से बसपा सांसद हैं रितेश पांडेय। रितेश पूर्व सांसद राकेश पांडेय के पुत्र हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में वे जलालपुर सीट से विधायक बने थे। 2019 में वे बसपा से सांसद बन गए। राकेश भी जलालपुर से विधायक रह चुके हैं। लेकिन, इस बार विधानसभा चुनाव से पहले राकेश पांडेय बसपा छोड़ सपा में चले गए। सपा ने राकेश को जलालपुर से प्रत्याशी बना दिया है। अब पिता-पुत्र अलग-अलग दलों में हैं। लेकिन रितेश चुनाव में न तो पिता के साथ दिखते हैं और न ही बसपा प्रत्याशियों के पक्ष में। वे, बसपा सुप्रीमो मायावती की मंडलीय रैली में भी मंच पर नजर नहीं आए। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि ज्यादा दिनों तक पिता-पुत्र सियासी तौर पर अलग-अलग नहीं रह सकते। 2024 के लोकसभा चुनाव तक नया समीकरण दिखेगा।
रीता भाजपा सांसद, बेटा सपा दरबार में...नए चेहरे को लेकर अटकलें
इलाहाबाद से भाजपा की सांसद हैं रीता बहुगुणा जोशी। रीता विधानसभा चुनाव में अपने बेटे मयंक जोशी के लिए टिकट मांग रही थीं। उन्होंने बेटे के टिकट के लिए अपनी सांसदी तक छोड़ने का प्रस्ताव दिया था। पर, बात नहीं बनी। चौथे चरण के प्रत्याशियों के टिकट वितरण से रीता के अगले कदम को लेकर शुरू हुई अटकलबाजी, मतदान की पूर्व संध्या पर साफ हो गई। रीता फिलहाल चुप हो गईं। पर, मयंक सपा मुखिया अखिलेश यादव के दरबार में पहुंच गए। बताया जा रहा है कि चौथे चरण के चुनाव की पूर्व संध्या पर मयंक का सपा खेमे में फोटो खिंचाना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा है। अब लखनऊ से प्रयागराज तक 2024 के लिए इलाहाबाद सीट से भाजपा के नए चेहरे को लेकर अटकलबाजी शुरू हो गई है।
बदायूं में भी नए समीकरण की चर्चा
पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा छोड़कर सपा से चुनाव लड़ रहे हैं। उनकी बेटी संघमित्रा बदायूं से भाजपा सांसद हैं। बदायूं से सपा नेता धर्मेंद्र यादव को हराकर वे चुनाव जीती थीं। पिता के भाजपा छोड़ने पर संघमित्रा ने भाजपा में ही रहने की बात करते हुए उनसे सियासी दूरी बनाने का संकेत दिया। पर, सियासी गलियारों में चर्चा रुक नहीं रही है कि लोकसभा चुनाव से पहले बड़े उलटफेर से बदायूं भी बच पाएगा। यहां भी नया समीकरण दिखने की चर्चा है।