‘चीफ’ साहब के मिजाज को समझ पाना सबके बूते की बात नहीं। करीब डेढ़ साल होने को हैं, संवर्गीय अफसर तक उनके मिजाज को नहीं समझ पा रहे हैं तो दूसरे लोगों की क्या बिसात।
लखनऊ में रहते हैं तो मीडिया के सामने आने से कतराते हैं। कितना भी बड़ा ‘इश्यू’ हो प्रशासनिक प्रमुख की ओर से पक्ष नहीं आ पाता।
अलबत्ता नीचे के अफसर यह कमी पूरी कर देते हैं। मीडिया के लिए ‘चीफ’ से मिलना या बात करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा है। संपर्क करने पर दफ्तर से एक ही जवाब मिलता है कि मीटिंग में हैं।
दिलचस्प बात यह है कि लखनऊ से दिल्ली पहुंचते ही ‘चीफ’ साहब का रुख बदल जाता है। यूपी में मीडिया से मुंह चुराने वाले ‘चीफ’ दिल्ली में मीडिया से चहक-चहककर बात करते दिखाई देते हैं।
संवर्गीय अफसरों का कहना है कि इसमें कुछ गलत भी नहीं है। यूपी के मीडिया के लिए तो नीचे के अफसर उपलब्ध ही हैं। ‘चीफ’ का जैसा कद है उसके हिसाब से उन्हें नेशनल मीडिया ही ‘सूट’ करता है।
कुछ अफसर चुटकी लेते हुए कहते हैं कि दिल्ली का मीडिया यूपी वालों की तरह तल्ख सवाल नहीं करता। यहां तो जुबान बंद रखने में ही भलाई है।
दिल्ली में मीडिया से बात करने के कई फायदे हैं, नेशनल लेवल तक पब्लिसिटी भी मिल जाती है।