पावरफुल
मंत्री के बागी स्टाफ की मदद को लेकर सचिवालय का एक संगठन अजीब उधेड़बुन
में है।
दरअसल, पिछले काफी दिनों से वह अपनी कुछ मांगों को लेकर बड़े
जोर-शोर से आंदोलन चला रहा था। अचानक बागियों का मामला सामने आने से इनकी
उलझन बढ़ गई।
उलझन ये कि साथियों की पैरोकारी करें या मांग को लेकर झंडा
बुलंद करें। इसी बीच साथियों का मामला सुर्खी बन गया और महीने भर से अखबार
में जगह बना रहा मुद्दा ओझल हो गया।
दूसरी चिंता कि ये कि जो तवज्जो इन्हें
मिलनी चाहिए वह दूसरे संगठन के नेताओं को मिलने लगी।
कई दिनों की मशक्कत
के बाद जब शासन ने कर्मियों को बिना निलंबन के सेंट्रल पूल से संबद्ध किया
तो इन लोगों की जान में जान आई। इन्होंने तुरंत यह कहना शुरू कर दिया कि
ऐसा उनकी वजह से हुआ, वरना निलंबन तय था।
अब मामला भी रफा-दफा हो जाएगा।
इन्होंने सफाई भी दी कि वे लोग तो मामला सुलझाने में लगे थे जबकि दूसरे लोग
प्रचार के लिए इसे तूल दे रहे हैं।
मगर जब से बागियों को बुलाकर आरोप पत्र
थमाया गया है ये बैकफुट पर नजर आने लगे हैं। अब बस ये यही मना रहे हैं कि
बागी कर्मचारी आरोप पत्र का कोई ऐसा जवाब न दे दें जिससे इनके आंदोलन को
पलीता लग जाए?