पैदा होते ही उसे खेत में जिंदा दफन कर दिया गया। पर, छटपटाहट से थोड़ी मिट्टी हट गई। वह सांस ले सका। पर, चील-कौवे आ धमके और नोंचने लगे।
जिंदगी शायद हार जाती अगर संबारा नहीं पहुंचती। संबारा ने चील-कौवों को मंडराते देखा तो उधर लपक पड़ी। जमीन में गड़े नवजात को निकाला। मुंह के अंदर की मिट्टी साफ की।
चील-कौवों ने उसके पेट में नोच-नोचकर छेद कर दिया था। उसे लेकर अस्पताल भागी। जहां से उसे राजधानी के डफरिन अस्पताल रेफर कर दिया गया। अब वह चम्मच से दूध पी रहा है।
डॉक्टरों का कहना है कि नन्ही-सी जान ने जिंदगी की जंग जीत ली। वह तेजी से रिकवर कर रहा है। घटना बाराबंकी के सैदनपुर गांव की है। बच्चे के साथ डफरिन अस्पताल में ही जमीं संबारा बताती हैं- 21 नवंबर की सुबह खेत में कौए और चील मंडरा रहे थे।