घरेलू हिंसा की शिकार और आर्थिक रूप से कमजोर राजधानी की सात महिलाओं को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मुफ्त ई-रिक्शा देने की घोषणा की है। इन महिलाओं ने एनजीओ की मदद से ई-रिक्शा चलाने का प्रशिक्षण तो लिया लेकिन रोजाना के किराए व लोन चुकाने में आने वाली परेशानियों से मुख्यमंत्री को अवगत कराया था।
मुख्यमंत्री सोमवार को संगीत नाटक अकादमी में एनजीओ द्वारा महिलाओं को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से 300 रुपये रोजाना के किराए या लोन पर ई-रिक्शा उपलब्ध कराने की योजना के शुभारंभ कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। उन्होंने कहा कि इन महिलाओं के हौसले को मैं सम्मान करता हूं। हमारी सरकार समाजवादी ई-रिक्शा उन्हें सम्मान के रूप में देगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि महिलाओं की परेशानी का मतलब आधी आबादी का परेशान होना है। अगर उन्हें न्याय नहीं मिले तो इसका मतलब है कि आधी आबादी को न्याय नहीं मिल पा रहा है। हमने गाजियाबाद की एक महिला ऑटो रिक्शा ड्राइवर की भी मदद की।
अगर साड़ी बांटी होती तो उसके रंग पर होता बखेड़ा
अखिलेश बोले, मुझे पता चला था कि उसका ऑटो रिक्शा जल जाने पर बीमा कंपनी ने भी क्लेम देने से मना कर दिया था। उसको नया ऑटो रिक्शा दिलवाया गया। मैं चाहता हूं कि महिलाएं बराबरी पर आकर खड़ी हों।
इसके लिए ही हमने 1090 बनाई, जिससे अब तक 3.50 लाख से ज्यादा लड़कियों और महिलाओं को मदद मिली है।
समाजवादी पेंशन की राशि भले ही 500 रुपये हो, लेकिन यह उन महिलाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जोकि आर्थिक रूप से कमजोर हैं। अब वह अपनी पसंद की साड़ी भी इससे खरीद सकती हैं। अगर हमने साड़ी बांटी होती तो उसके रंग को लेकर भी बखेड़ा खड़ा हो जाता।
कार्यक्रम में राजनीतिक पेंशन मंत्री राजेंद्र चौधरी, महिला प्रकोष्ठ की डीजी सुतापा सान्याल, प्रमुख सचिव सूचना नवनीत सहगल, सामाजिक कार्यकर्ता अरूंधति धुरू, संदीप पांडेय और फिल्म निर्माता-निर्देशक इम्तियाज अली मौजूद रहे।
असहिष्णुता पर गंभीरता से सोचना होगा: इम्तियाज अली
फिल्म निर्माता-निर्देशक इम्तियाज अली का कहना है कि देश में असहिष्णुता आज एक गंभीर मुद्दा बन गया है। खास समुदाय और उपनाम के कलाकारों को लक्ष्य बनाकर हो रहे हमलों से वह परेशान दिखे।
उनका कहना था कि मैं लंबे समय से इसके लिए सोच रहा हूं। यह अच्छी बात नहीं है। मेरा सिर्फ इतना ही कहना है कि सभी को अब गंभीरता से इस बारे में सोचना होगा। अब इसका वक्त आ गया है।
महिलाओं पर उनका कहना था कि फिल्मों में यह जरूरी नहीं कि हर बार महिलाओं को ही लीड रोल में दिखाया जाए। कम से कम महिलाओं को आवश्यक रूप से चित्रित तो किया जाए। उनके लिए लीड रोल भी लिखे और फिल्माए जाने चाहिए।