विधानसभा के पिछले चुनाव में उनके और बसपा के बीच गठबंधन की चर्चाएं तो थीं, लेकिन ये जमीन पर नहीं उतरीं। वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में भी उनके कुछ दलों से मिलकर चुनाव मैदान में उतरने की चर्चा चली थीं पर हकीकत में नहीं बदलीं। जहां तक ओवैसी की पार्टी के यूपी में कुछ दलों के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ने की संभावनाएं टटोलने के ताजा प्रयास का सवाल है तो यहां एक बात समझनी जरूरी है।
दरअसल, पिछले दिनों बिहार में पांच उम्मीदवारों की जीत ने ओवैसी के दिल में उत्तर भारत की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाने की इच्छा को फिर जगा दिया है। उन्हें लग रहा है कि बिहार की तरह यदि यूपी में कुछ दलों का गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ लिया जाए तो शायद यहां भी विधानसभा में एआईएमआईएम की राजनीतिक उपस्थिति हो जाए।
लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. राकेश कुमार मिश्र कहते हैं कि हर राजनीतिक दल की इच्छा यूपी में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की इसलिए भी होती है क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति को प्रदेश के समीकरण ज्यादा प्रभावित करते हैं।
बिहार की सफलता ने ओवैसी के दिल और दिमाग में यूपी को लेकर सियासी उम्मीद की रोशनी जला दी है। ओवैसी को लग रहा है कि राजभर, बसपा या अन्य कुछ जातीय प्रभाव रखने वाले दलों से गठबंधन हो जाए तो यहां भी जातीय समीकरणों से मुस्लिम वोटों का गणित ठीक कर बिहार की तरह कुछ सीटें झोली में डाली जा सकती हैं।
- डॉ. मिश्र की बात दुरुस्त लगती है। ओवैसी की यूपी में दिलचस्पी की एक बड़ी वजह अच्छी संख्या में लगभग 18 फीसदी मुस्लिम आबादी होना है। कुछ जिलों की आबादी में मुस्लिमों की भागीदारी 50 प्रतिशत तक है। ऐसे में ओवैसी को लगता है कि कुछ सीटों पर मुस्लिम वोटों के साथ राजभर, बसपा या सपा से अलग हुए शिवपाल सिंह यादव की प्रसपा सहित अन्य कुछ छोटे दलों के साथ मोर्चा बनाकर उनके वोट हासिल कर लिए जाएं तो प्रदेश में राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने में सफलता मिल सकती है।
- हालांकि बुधवार को ओवैसी की शिवपाल से मुलाकात नहीं हुई, लेकिन पिछले दिनों शिवपाल खुद कह चुके हैं कि 2022 के चुनाव को लेकर ओवैसी से बातचीत चल रही है। हालांकि यह सवाल अपनी जगह है कि ओवैसी के साथ मोर्चा बनाने वाले राजभर व शिवपाल को मुस्लिम वोटों का कितना लाभ मिलेगा, लेकिन मोर्चा बन जाता है तो ओवैसी को जरूर कुछ लाभ मिल सकता है। जहां तक भाजपा का सवाल है तो ओवैसी के सक्रिय होने से उसकी सेहत पर बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि ओवैसी मुख्य रूप से मुस्लिम वोट ही काटेंगे, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान सपा और कुछ हद तक कांग्रेस को होगा।
- भाजपा को बस थोड़ा-बहुत राजभर वोटों का नुकसान हो सकता है, लेकिन ओवैसी की मौजूदगी से विपक्ष के वोटों में बिखराव से उसकी भरपाई हो जाएगी। जाहिर है कि ओवैसी की इस समय सक्रियता सिर्फ अपनी जमीन तलाशने की कोशिश भर है।