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Lucknow News: तबले पर थिरक रहीं उम्रदराज उंगलियां

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अवनि कुमार। 
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लखनऊ। उम्र भले ही झुर्रियों में ढल जाए, लेकिन जज्बा कभी बूढ़ा नहीं होता। संगीत नाटक अकादमी में इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है, जहां 73 और 70 की उम्र में बुजुर्ग तबले की थाप पर जिंदगी के सुर साध रहे हैं। छोटे-छोटे बच्चों के साथ सुरों की साधना कर रहे हैं वो लोग, जिनकी उम्र ने रिटायरमेंट ले ली, लेकिन दिल ने नहीं। मिलिए अवनि दुबे और कुसुम वर्मा से, जिनकी उंगलियों की थाप और आवाजों के राग बता रहे हैं... सीखने की कोई उम्र नहीं होती...
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मानसिक शांति देता है संगीत

13 साल पहले बैंक की सेवा से सेवानिवृत्त हुए 73 साल के अवनि दुबे ने कोरोना काल में संगीत सुनने की आदत को सीरियस शौक में बदल दिया। पहले ढोलक, फिर हारमोनियम और अब तबला। अवनि दुबे बताते हैं, मेरे साथ कार्यशाला में छह साल के बच्चे भी तबला सीखते हैं। मेरी उम्र सबसे ज्यादा है, लेकिन सीखने की कोई उम्र नहीं होती। संगीत मुझे मानसिक शांति देता है।

नाती-पोती वाली कुसुम सुबह तबला तो शाम को सीखती हैं लोकगीत
बटलर पैलेस कॉलोनी के पास अपार्टमेंट में रहने वाली रहने वाली 70 वर्षीय कुसुम वर्मा चार नातियों और एक पोती की दादी हैं। वे सुबह तबला और शाम को लोकगीत सीखती हैं। वे कहती हैं, संगीत का शौक बचपन से था लेकिन सीखने का मौका अब मिला। अब हर दिन नई ऊर्जा महसूस होती है। उनके पति पीसीएस रहे हैं। उनकी एक बेटी गुड़गांव में तो दूसरी अमेरिका में नौकरी करती है। सबसे छोटा बेटा नोएडा में है।
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बुजुर्गों में बच्चों जैसा ही उत्साह
तबला प्रशिक्षक पवन तिवारी के अनुसार, कक्षा में कुल 25 प्रशिक्षणार्थी हैं जिनमें से ज्यादातर बुजुर्ग हैं। छह साल के अनहद और ईवान के साथ ही सभी बुजुर्गों में भी सीखने का उत्साह बराबर दिखाई देता है। सभी का सुबह सात बजे कक्षा में समय से पहुंचना काबिले तारीफ है।
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