अयोध्या रोड निवासी 45 वर्षीय व्यक्ति ने बताया कि वह 26 जून को पॉजिटिव हो गए थे। 17 दिन अस्पताल में रहने के बाद रिपोर्ट निगेटिव आई। अब उन्हें सांस लेने में दिक्कत महसूस हो रही है। सिविल अस्पताल में डॉक्टर को दिखाया है। उन्होंने फेफड़े में कमजोरी होने की जानकारी दी है। दवाएं खा रहे हैं।
केस-2
जफरखेड़ा निवासी 65 वर्षीय बुजुर्ग एक जुलाई को कोरोना की चपेट में आए थे। अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद घर पहुंचे। मार्निंग वॉक के दौरान तेज चलने पर समस्या होती है। चौक के एक निजी अस्पताल के डॉक्टर को दिखाया है। दवाएं खा रहे हैं।
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कोरोना के मरीजों में रिपोर्ट निगेटिव होने के बावजूद कुछ लोगों का ऑक्सीजन लेवल कम है तो कुछ को तेज चलने में सांस लेने में दिक्कत हो रही है। ऐसे लोगों की संख्या 10 से 20 फीसदी है। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि फेफड़े में संक्रमण बने रहने के चलते यह समस्या आ रही है।
केजीएमयू में इन दिनों दो आईसीयू और चार आइसोलेशन वार्ड में करीब 200 मरीज भर्ती हो रहे हैं। इसी तरह पीजीआई में दो आईसीयू सहित आइसोलेशन वार्ड मिलाकर करीब 185 मरीज, लोहिया संस्थान में 125 मरीज भर्ती हो रहे हैं। यहां तमाम मरीजों की रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद भी फेफड़े में संक्रमण बना हुआ है।
कई मरीजों को रोकना पड़ा
इसमें कुछ गंभीर मरीजों को अस्पताल में ही रोकना पड़ रहा है। जो सामान्य मरीज हैं वे घर जाने के बाद सांस फूलने और ऑक्सीजन लेवल कम रहने की शिकायत कर रहे हैं। ऐसे में पीजीआई, लोहिया संस्थान और केजीएमयू में इस समस्या को लेकर नए सिरे से अध्ययन करने की रणनीति बनाई जा रही है।
पीजीआई के पल्मोनरी विभाग के प्रोफेसर और कोरोना आईसीयू वार्ड प्रभारी डॉ. जिया हाशिम बताते हैं कि ओपीडी शुरू होने के बाद मरीजों के आने पर वास्तविक स्थिति पता चलेगी। रिपोर्ट निगेटिव आने के बावजूद गंभीर मरीजों के फेफड़े में संक्रमण पाया गया है। करीब 15 दिन में भर्ती होने वाले गंभीर मरीजों में वार्ड के पांच ऐसे मरीज हैं, जिनकी रिपोर्ट निगेटिव आ गई है, लेकिन फेफड़े की समस्या के चलते उन्हें रोककर पल्मोनरी विभाग में शिफ्ट किया गया है।
जानिए किस तरह रह जाती है समस्या
डॉ. जिया हाशिम बताते हैं कि फेफड़े में संक्रमण होने पर एक्यूट रेस्पेरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम चार सप्ताह, ऑर्गनाइजिंग निमोनिया छह सप्ताह तक रहता है। गंभीर मरीजों को लंबे समय तक दवाएं खानी पड़ रही हैं। फेफड़ों में हवा की बहुत छोटी थैलियां होती हैं जो सांस में ली गई ऑक्सीजन को ग्रहण करती हैं। वायरस के चलते ये वायु कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इनकी जगह दूसरा पदार्थ भर जाता है। ऐसे में दूसरी कोशिकाओं तक ऑक्सीजन नहीं जा पाती है। फिर सांस फूलने की समस्या आती है।
लोहिया संस्थान के चेस्ट रोग विशेषज्ञ डॉ. हेमंत बताते हैं कि कोरोना की चपेट में आने वाले करीब 10 से 20 फीसदी मरीजों में लंबे समय तक फेफड़े की समस्या रह सकती है। इसकी वजह है लंग का स्ट्रक्चर प्रभावित होना। कोरोना अपर रेस्पिरेटरी से धीरे-धीरे पूरे फेफड़े को कवर कर लेता है। संक्रमण खत्म होने के बाद कुछ मरीजों में टीबी मरीजों की तरह सांस फूलने की समस्या हो सकती है। अभी तो पूरा जोर वायरस को नियंत्रित करने पर है।
फाइब्रोसिस की समस्या से बढ़ा संकट
केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. अजय वर्मा बताते हैं कि कोरोना के मरीजों के फेफड़ों में फाइब्रोसिस की समस्या हो जाती है, जिससे फेफड़ा कम फूलता है। इससे सांस लेने में दिक्कत होती है। जिन लोगों की इम्युनिटी ज्यादा कमजोर होती है, उन्हें ठीक होने में लंबा वक्त लगता है, लेकिन जिनकी इम्युनिटी ठीक है, उनकी रिकवरी जल्दी हो जाती है। इस वायरस का शरीर के विभिन्न अंगों पर असर पड़ रहा है। फेफड़े पर कुछ ज्यादा ही है। इसके अन्य दुष्परिणाम भविष्य में सामने आएंगे।