बाबू कहबाबू कहलाना पसंद नहीं था तो सरकार को लिखा पत्र
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खुद को बाबू कहलाना या अपने काम को बाबूगिरी मानना वरिष्ठ अधिकारियों को पहले भी रास नहीं आता था। एक वरिष्ठ अधिकारी ने 1933 में प्रदेश सरकार से गुहार लगाई थी कि उसके नाम के आगे से बाबू शब्द हटा दिया जाए।
तब सरकारी कामकाज में उनके नाम के आगे बाबू लिखा जाता था। प्रदेश सरकार ने उसकी दलील स्वीकार कर बाबू शब्द हटा दिया था।
आईएएस वीक के अवसर पर राज्य अभिलेखागार ने अपनेसंग्रह से कुछ ऐसे अभिलेख निकाले हैं जो भारतीय प्रशासनिक सेवा के इतिहास और नौकरशाही के कई रोचक पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं।
प्रदर्शनी में दो पत्र ऐसे हैं जो यह बताते हैं कि किस प्रकार सिविल लिस्ट में अधिकारियों के नाम के साथ लिखे जाने वाले बाबू शब्द से मुक्ति पाई गई।
हालांकि, समाज और बोलचाल में जिस तरह बाबू शब्द चलन में आया, उससे आज भी मुक्ति नहीं मिली है। सरकारी कामकाज को अब भी बाबूगिरी ही माना जाता है।
मेरे नाम के आगे ना लिखें बाबू, अनुरोध किया
सरकारी अफसरों को पसंद नहीं था बाबू कहलाना
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ट्रेवेलिंग इन टू द पास्ट एन आर्काइवल जर्नी नामक इस प्रदर्शनी में 15 अगस्त 1933 का एक पत्र शामिल है जो इलाहाबाद मंडल के निबन्धन कार्यालय के निरीक्षक यूसी गुप्त ने नैनीताल स्थित जनरल ब्रांच के उपसचिव को लिखा है। गुप्त इंजीनियर थे।
पत्र में अनुरोध किया गया है कि गवर्नमेंट प्रेस को यूपी सिविल लिस्ट से मेरे नाम के आगे लिखे जाने वाले बाबू शब्द को हटाने का आदेश दें।
उनके अनुरोध के जवाब में छह सितंबर 1933 को उप सचिव ने उन्हें सूचित किया कि सिविल लिस्ट से उनके नाम के आगे लिखा जाने वाला बाबू शब्द हटा दिया गया है। अब आपका नाम केवल उमाशंकर गुप्त लिखा जाएगा।
महिलाओं को कमजोर मानते थे अंग्रेज
यूपी न्यायिक सेवाओं में महिलाओं की नौकरी पर लगी थी रोक
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प्रदर्शनी में रखे एक पत्र से महिलाओं के प्रति अंग्रेजों की भेदभावपूर्ण नीति का पता चलता है। एक आदेश में यूपीसीएस, यूपीपीएस और यूपी न्यायिक सेवाओं में महिलाओं की नौकरी पर रोक लगाई गई है।
यह जेएम क्ले का पत्र है। इसमें हाई कमिश्नर के आदेश के हवाले से कहा गया है कि शारीरिक सहनशीलता के मद्देनजर यूपीपीएस, यूपीपीएस, यूपीजेएस, तहसीलदार और नायब तहसीलदार के पदों पर महिलाओं की नियुक्तियां नहीं होंगी।
हालांकि आदेश में कहा गया है कि महिलाओं की नियुक्ति शिक्षा, स्वास्थ्य विभागों तथा लिपिक पदों के लिए पहले से हो रही है। प्रदर्शनी में ऐसा कोई अभिलेख नहीं है जिससे पता चले कि इन सेवाओं में महिलाओं की भरती कब से शुरू हुई।