आचार्य सत्येंद्र दास के साथ सहायक पुजारी के रूप में कार्य करने वाले प्रेमचंद्र त्रिपाठी बताते हैं कि जब बाबरी विध्वंस हुआ तो आचार्य सत्येंद्र दास रामलला के विग्रह को सुरक्षित करने में लगे थे। सुबह 11 बज रहे थे। मंच लगा हुआ था। लाउडस्पीकर लगा था। नेताओं ने कहा पुजारी जी रामलला को भोग लगा दें और पर्दा बंद कर दें। मुख्य पुजारी ने भोग लगाकर पर्दा लगा दिया।
एक दिन पहले ही कारसेवकों से कहा गया था कि आप लोग सरयू से जल ले आएं। वहां एक चबूतरा बनाया गया था। एलान किया गया कि सभी लोग चबूतरे पर पानी छोड़ें और धोएं लेकिन जो नवयुवक थे उन्होंने कहा हम यहां पानी से धोने नहीं आए हैं। उसके बाद नारे लगने लगे। सारे नवयुवक उत्साहित थे। वे बैरिकेडिंग तोड़ कर विवादित ढांचे पर पहुंच गए और तोड़ना शुरू कर दिया। इस बीच मुख्य पुजारी रामलला समेत चारों भाइयों के विग्रह को उठाकर अलग चले गए। जहां उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ।