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NTPC हादसे में मृतकों की संख्या 30 पहुंची, जारी किए गए हेल्पलाइन नंबर

Thu, 02 Nov 2017 09:43 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखऊ
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हादसे के बाद उठाता धुंए का गुबार - फोटो : amar ujala
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रायबरेली के ऊंचाहार स्थित नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन (एनटीपीसी) के प्लांट में हुए हादसे में मरने वालों की संख्या अब तक 30 हो गई है। घायलों का इलाज जारी है। वहीं, हादसे से संबंधित कोई जानकारी प्राप्त करने के लिए जिला प्रशासन की ओर से हेल्पलाइन नंबर जारी कर दिया गया है। डीएम ने बताया कि 0535-2703301, 2703401 और 9454416654, 9451794127 हेल्पलाइन नंबर जारी किए गए हैं। इन नंबरों पर कोई व्यक्ति हादसे से संबंधित जानकारी ले सकता है। खासकर यह हेल्पलाइन उन लोगों के लिए जारी की गई है, जिनके परिवारीजन प्लांट में मजदूरी कर रहे थे।
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आपको बता दें कि ऊंचाहार स्थित एनटीपीसी प्लांट में हादसा बुधवार दोपहर करीब  3.40 बजे हुआ। हादसे के बाद हड़कंप मच गया। हादसे की जानकारी होने पर प्रशासन ने सभी जरूरी कदम उठाए और मुआवजे की घोषणा की।

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धमाका...25-30 फीट ऊंचे धुएं का गुबार छा गया
एक पखवारा पहले ही यूनिट नंबर 6 से बिजली उत्पादन का कार्य शुरू कराया गया था। हादसे के वक्त 450 श्रमिक इस यूनिट में काम कर रहे थे। स्टीम पाइप के फटने से जोरदार धमाका हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक धमाके के साथ ही पूरी यूनिट 25-30 फीट ऊंचे धुएं के गुबार और लपटों में घिर गई।
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एनटीपीसी और अस्पताल की घेराबंदी

- फोटो : amar ujala
हादसा होते ही सीआईएसएफ ने एनटीपीसी परिसर की घेराबंदी कर दी। लोगों का प्रवेश रोक दिया गया। प्रशासन और पुलिस के अफसर और कई थानों की फोर्स मौके पर पहुंचे और बचाव कार्य शुरू कराया। प्रतापगढ़ और रायबरेली की 40 एंबुलेंस बुला ली गईं। निजी बसें भी लाई गईं। इसके बाद एक-एक करके श्रमिकों को बाहर निकाला गया।

घायलों एनपीटीसी अस्पताल और सीएचसी ऊंचाहार भेजा गया। यहां से हालत गंभीर होने वाले श्रमिकों को जिला अस्पताल और वहां से रायबरेली और लखनऊ ट्रॉमा सेंटर रेफर किया गया। रायबरेली में अस्पताल की भी पुलिस ने घेराबंदी कर दी। सिर्फ घायलों को जाने दिया जा रहा था।

सीएम ने मौके पर अफसरों को भेजा, मदद का एलान
सीएम योगी आदित्यनाथ मॉरिशस में हैं। घटना की जानकारी होते ही उन्होंने एडीजी लॉ एंड आर्डर और प्रमुख सचिव गृह को मौके पर भेजा। सीएम ने मृतक आश्रितों को 2 लाख, गंभीर रूप से घायलों को 50 हजार और घायलों को 25 हजार रुपये की मदद का एलान किया।

अपनी गर्दन बचाने में जुटा रहा एनटीपीस प्रशासन, कहा-हादसे में आठ मौतें घटना पर एनटीपीसी उत्तरी क्षेत्र की सहायक जनसंपर्क महाप्रबंधक रुचि रत्ना का कहना है कि बॉयलर में दोपहर करीब 3.30 बजे 20 मीटर की ऊंचाई पर अचानक आवाज के साथ एक कोने में ओपनिंग हो गई। अंदर से गर्म गैस और भाप बाहर आने से आसपास काम कर रहे लोग चपेट में आ गए। 8 की मौत हो गई और करीब 80 लोग घायल हुए। दुर्घटना के कारणों की जांच के लिए प्रबंधन की ओर से एक कमेटी गठित की गई है जिसकी रिपोर्ट मिलने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

आधी-अधूरी तैयारियां और शुरू करा दी यूनिट

एनटीपीसी ने इस तरह के भयावह दृश्य नजर आए। - फोटो : amar ujala
तैयारियां आधी-अधूरी थीं...। आग से निपटने का मुकम्मल इंतजाम भी नहीं हुआ...। पर, इस सबके बावजूद 500 मेगावाट की 6 नंबर यूनिट को शुरू करा दिया गया। आखिर इतनी हड़बड़ी क्यों थी? ये सवाल हैं उन श्रमिकों के जो यहां काम करते हैं। बहरहाल एनटीपीसी के अफसर अपनी गर्दन बचाने में जुट गए हैं। अफसर सवालों का जवाब देने से कतरा रहे हैं।

 एनटीपीसी की 500 मेगावाट की यूनिट नंबर 6 का संचालन करीब एक पखवारा पहले शुरू कर दिया गया। एक इंजीनियर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह यूनिट अभी सही से कमीशन भी नहीं हुई थी। फिर भी इसे जबरदस्ती मैन्युअल चला दिया गया। गुस्से में ये इंजीनियर कहते हैं ये यूनिट इसलिए चलाई गई कि अफसरों की प्रमोशन की लालसा पूरी हो। तीन साल का प्रोजेक्ट ढाई साल में पूरा करवाने के चक्कर में ये हादसा हुआ...।

तो इतनी जानें न जातीं...
ऊंचाहार कस्बे के पूरे भद्दी मजरे पचखरा गांव निवासी मोहनपाठक इसी यूनिट में ठेकेदार हैं। वे भी कहते हैं कि आधी-अधूरी तैयारियां की गई थीं। फायर किट तक की व्यवस्था नहीं थी। यदि ऐसा होता तो शायद श्रमिकों को बचाया जा सकता था। पर ऐसा नहीं हुआ।

शुक्र है आज हमारी ड्यूटी नहीं थी
फरीदपुर गांव के रहने वाले राम मनोहर, सुखदेव भी इसी नई यूनिट में काम करते थे, लेकिन उनकी ड्यूटी दूसरे शिफ्ट में थी। कहते हैं कि ऊपर वाले का शुक्र रहा कि उनकी ड्यूटी नहीं थी। पर यह हादसा लापरवाही दर्शाता है। तैयारियां पूरी न करके बिजली उत्पादन किया जा रहा था।

यूनिट चलाने की इतनी हड़बड़ी क्यों थी...
फरीदपुर के रहने वाले सूरजपाल गुस्से में हैं। कहते हैं कि हादसा दर्दनाक है। तैयारियां पूरी नहीं की गई थी। पता नहीं इतनी जल्दबाजी में क्यों बिजली का उत्पादन कराना शुरू करा दिया गया। जांच करके दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। उमरन के राम आसरे और रोहनियां के रहने वाले कृष्णपाल कहते हैं कि हादसा चूक है। इसकी जांच होनी चाहिए। कहते हैं कि हर दिन ड्यूटी जाता था। सबकुछ ठीकठाक रहता था।  कुछ न कुछ लापरवाही तो हुई है, जिसके चलते यह हादसा हुआ।

...तो क्या बॉयलर का प्रेशर बिगड़ने से हुआ विस्फोट

- फोटो : amar ujala
ऊंचाहार के थर्मल पावर स्टेशन के बॉयलर में हुआ विस्फोट क्या कोयले की सप्लाई में आए असंतुलन से बिगड़े प्रेशर की वजह से हुआ?  थर्मल पावर के क्षेत्र में कई वर्षों तक काम कर चुके वरिष्ठ बिजली इंजीनियर शैलेंद्र दुबे फिलहाल ऐसा ही मानते हैं। ‘अमर उजाला’ से विशेष बातचीत में उन्हाेंने घटना के बाद एनटीपीसी से जुड़े विशेषज्ञों से मिली जानकारियों और अपने अनुभवों के आधार पर वे बताते हैं कि कोयले के 10 मीटर आकार के क्लिंकर को तोड़ रहे मजदूर इस विस्फोट की चपेट में आए। उनके जरिए घटना के पीछे की स्थितियां और थर्मल पावर जनरेशन से जुड़ी जानकारियों को समझा जाए तो इस विस्फोट की पूरी कहानी सामने आ जाती है।

स्टेज 1 :
कोयले से बिजली उत्पादन करने वाले थर्मल पावर स्टेशनों पर खदानों से खोद कर लाया गया कोयला ढेलों के रूप में होता है। ये ढेले कुछ सेंटीमीटर से आधा-एक मीटर तक के आकार केहो सकते हैं। छोटे-बड़े आकार के ये ढेले एक समान तापमान पर नहीं जल सकते। वे अपने आकार के अनुसार गर्मी पैदा करते हैं। जबकि बॉयलर को यह कोयला एक नियंत्रित मात्रा में ‘फीडिंग रेट’ पर चाहिए होता है। ऐसे में इन्हें जलाने से पहले पीसा जाता है। इसके पीछे यह भी वैज्ञानिक तर्क दिया जाता है कि बारीक पीसा कोयला ज्वलनशील गैस जैसी कुशलता से भी जलेगा। इसीलिए इसका पाउडर बनता है, जिसे पल्वराइज्ड कोयला कहते हैं। इसे आमतौर पर सिलेंडर रोलरों में पीसा जाता है।
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ये हैं आगे की दो स्टेज

- फोटो : amar ujala
स्टेज 2 :
पीसा हुआ कोयला करीब 340 डिग्री सेल्सियस के तापमान वाली गर्म हवा फेंकते डायर से गुजारा जाता है ताकि इससे पानी की मात्रा खत्म हो जाए। इस कोयले के पाउडर को यही गर्म हवा सीधे बॉयलर में मौजूद बर्नरों पर ले जाती है। बर्नर का काम होता है पाउडर कोयले को हवा के साथ और गर्मी देना। हवा इसलिए ताकि वे जल सकें। इस जलते हुए कोयले से पानी को उबाला जाता है। इस पानी की भाप को स्टीम ड्रम के जरिए आगे बढ़ाया जाता है।

स्टेज 3 : यही भाप पाइप के जरिए टर्बाइन तक पहुंचाई जाती है। भाप की ऊर्जा से टर्बाइन घूमने लगती हैं और इन टर्बाइन से जुड़े जनरेट बिजली पैदा करने लगते हैं। यही बिजली विभिन्न चरणों से गुजरते हुए हमारे घरों तक पहुंचती है।

गड़बड़ी कहां हुई... शैलेंद्र दुबे का दावा है कि कोयले के ढेलों को तोड़ने की जरूरत होती है ताकि वे रोलरों से पीसे जाने योग्य हो सकें। ऊंचाहार के इस मामले की जड़ यहीं पर है। बताया जा रहा है कि करीब 10 मीटर का कोयले का क्लिंकर मजदूरों के सामने रखा गया, जिसे उन्हें तोड़कर पीसने के लिए भेजना था। यह बेहद मजबूत होता है, इसे हथोड़ों और सरियों-सब्बलों की चोट से तोड़ा जाने लगा। इतने बड़े कोयले के ढेले को तोड़ने के लिए मजदूरों की बड़ी संख्या लगानी पड़ी। समय भी बीतता गया। इसी दौरान बॉयलर में भेजने के लिए पाउडर कोयले की मात्रा (फीडिंग रेट) कम होती गई। इसने बॉयलर में प्रेशर का संतुलन बिगाड़ दिया। यही बिगड़ा संतुलन धमाके के रूप में सामने आया।
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