साढ़े दस साल से इंसाफ की लड़ाई लड़ रही लखनऊ के आशियाना दुराचार कांड की पीड़िता ने जुवेनाइल जस्टिस बिल-2015 पास होने को समाज के लिए राहत भरा कदम बताया है। इस बिल में 16 से अधिक उम्र के किशोरों को जघन्य अपराध पर नाबालिग मानकर सजा दिए जाने का प्रावधान है।
मंगलवार को ‘अमर उजाला’ से बातचीत में आशियाना पीड़िता ने सवाल किया कि जब ऐसे लोग कम उम्र में बड़ों जैसा अपराध करते हैं तो फिर वे बच्चे कैसे हुए? उन्हें तो वही सजा होनी चाहिए जो किसी वयस्क को होती है।
पीड़िता ने कहा कि किसी अपराधी को केवल इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता कि उसकी उम्र कम है। इससे यह सोच विकसित होगी कि वे जो चाहे सो कर सकते हैं क्योंकि सिर्फ तीन साल बच्चों के सुधार गृह में रहकर वे छूट जाएंगे। इसी सोच को खत्म करने की जरूरत है।
निर्भया के गुनहगार को छोड़ना इंसाफ नहीं
आशियाना पीड़िता ने कहा कि निर्भया के गुनहगार को सिर्फ तीन वर्ष में छोड़ा जाना निराशाजनक है। यह इंसाफ नहीं है। यह कानून पहले ही पास हो गया होता वह उसे भी गंभीर सजा मिलती। कई अपराधी पुराने कानून में फायदा लेने की कोशिश कर रहे थे। खुद मेरे और मेरे जैसे हर साल होने वाली ऐसी घटनाओं पर भी सबक नहीं लिया गया। कानून तब बदला जब नागरिकों ने सड़क पर उतरकर विरोध किया।