ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा कि शरीयत में जिस तरह से मर्द को तलाक देने का अधिकार है, उसी तरह से महिलाओं को तलाक लेने का भी हक है। तलाक लेने को ही खुला कहा जाता है।
किन्हीं वजहों से औरत अगर पति के साथ नहीं रहना चाहती तो वह निकाह खत्म कर सकती है। इसके लिए महिला को उलमा या दारुलकजा से संपर्क करना होता है। जिस तरह से निकाह का शरई तरीका है, उसी तरह से खुला व तलाक का भी शरई तरीका है।
रेशमा ने शादी के वक्त शौहर की ओर से बीवी को दी जाने वाली मेहर की रकम के 50 हजार रुपये भी छोड़ने की घोषणा की है। शरीयत के कानून में खुला लेने वाली महिला को मेहर की रकम छोड़नी होती है।
सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा- नबी के जमाने से महिलाओं को खुला का मिला है हक
सामाजिक कार्यकर्ता नाईश हसन ने कहा कि खुला महिलाओं को कुरान से मिला अधिकार है। कुरान की सूरत सूरह अल बकरह में इसका जिक्र है। वहीं कई हदीसों से भी ये साबित है। इसके अलावा ऐतिहासिक दस्तावेज से साबित है कि भारत में खुला का चलन काफी समय से है।
1946 में सीतापुर जिले की शफीकुन अंसारी ने यूनाइटेड प्रॉविंस द्वारा विक्टोरिया की तस्वीर वाले आठ आने के स्टैम्प पेपर पर पति मो. इसहाक को मेहर की रकम 526 रुपये साढ़े चार आना छोड़ते हुए 17 मार्च 1946 को खुलानामा भेज कर शादी खत्म कर दी थी। तलाक और खुला की बुनियाद एक ही है- शादी को बर्खास्त करना। इसके लिए न तो किसी मौलवी की जरूरत है और न ही पति की सहमति की जरूरत।