बात जब इश्क की चलती है तो लोग हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल, रोमियो-जूलिएट की मोहब्बत को नजीर मानते हैं। इस रवायत को लखनऊ घराने के कथक डांसर गौरव ने तोड़ कर मोहब्बत की ऐसी मिसाल पेश की जो दशकों तक लोगों के दिल दिमाग पर तारी रहेगी।
पाकिस्तान के रहने वाले अपने महबूब नवाज (काल्पनिक नाम) से उनके दिल के तार यूं जुड़े कि उन्होंने एक ऑपरेशन से गुजर कर खुद को गौरव से आशना बना दिया। जी हां... मुंबई में एक जटिल ऑपरेशन से गुजरने के बाद वह एक हसीन लड़की में तब्दील हो गए।
खुद के वजूद को खत्म करने उन्होंने आशना नाम की जिस लड़की में खुद को ढाला है वह भी उनके मेल वर्जन (गौरव) की तरह कथक की दीवानी है।
लखनऊ के कथक घराने को उसका पुराना वकार लौटाने की मुहिम में जुटे गौरव न केवल बेहतरीन डांसर थे वरन इस पर कई किताबें भी लिख चुके थे। वे लखनऊ के कथक घराने पर रिसर्च की तैयारी में थे पर अब जिंदगी में आए इस नए मोड़ ने उनकी इस योजना को विराम दे दिया है।
फेसबुक से शुरू हुई प्रेम कहानी
मोहब्बत की अपनी अनोखी दास्तां को वह कुछ यूं बया करते हैं, तकरीबन पांच साल पुरानी बात है फेसबुक पर पाकिस्तान से एक फ्रेंड रिक्वेस्ट आई। भेजने वाले की प्रोफाइल चेक की तो वह सिंध के एक सूफी परिवार से ताल्लुक रखता था। बंदा भी ठीक लग रहा था मैंने रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली।
धीरे-धीरे हमारी बातचीत होने लगी। बातों का केंद्र सूफिज्म होता। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती गहरी होती गई, देर शाम से शुरू बातचीत का सिलसिला सुबह फजिर की अजान तक चलता।
पता ही नहीं चला कब उससे मुझे और मुझे उससे मोहब्बत हो गई। हमारे रिश्ते की एक खास बात यह रही कि हम एक-दूसरे से कभी मिले नहीं, स्काईप चैट पर जरूर दो साल पहले उन्हें देखा था। खैर, मुझे याद है 2012 की पांच मार्च वह किसी दरगाह पर थे, वहीं से उन्होंने मुझे फोन किया।
बोले गौरव तुम मुझे धोखा तो नहीं दोगे? मैं सहम गया ... क्या मतलब है इसका? फिर वो बोले कि मैं तुमसे इश्किया निकाह करना चाहता हूं। मैं भी उनकी इश्क की गिरफ्त में था... बिना रिश्ते के अंजाम की फिक्र किए बोला कबूल है।
हमारा रिश्ता तो जिस्मानी नहीं बल्कि रुहानी था
यह रिश्ता हो तो गया पर मुझे मालूम था कि इसे अंजाम तक पहुंचाना आसान नहीं होगा। हमारा रिश्ता तो जिस्मानी नहीं बल्कि रुहानी था, जिसे ज्यादातर लोग समझ नहीं पाते।
अब मुझसे मिलने वे हिंदुस्तान आ नहीं पा रहे थे और मैं जा नहीं पा रहा था। तरह-तरह की रुकावटों के बीच हमारी रुहानी मोहब्बत परवान चढ़ती गई। अब हमारी बातचीत में हमारे 'रिश्ते की शक्ल' पर भी बात शुरू हो चुकी थी।
हमारी इस बहस ने उनकी पढ़ाई और मेरे कथक में रुकावट बनना शुरू कर दिया तो कुछ दिनों के लिए उन्होंने हमसे बातचीत बंद कर दी।
चूंकि हमारी नीयत पाक थी लिहाजा अल्लाह ने हमारा साथ दिया, एक दिन खुद से उनका फोन आया। माफी मांगते हुए उन्होंने कहा कि तुम्हारे बिना रहना मेरे लिए मुमकिन नहीं है।
जब रूह दे चुका हूं तो शरीर देना मुमकिन नहीं
इधर, मेरी शादी के लिए मम्मी ने लड़की तलाशनी शुरू कर दी। मुझे लग रहा था जब किसी को रुह दे चुका हूं तो शरीर देना मुमकिन नहीं है। इस अजीब सी कैफियत के बीच एक दिन मैंने उनसे इस मुश्किल का हल पूछा।
वो बोले हममें से एक अपना वजूद छोड़ के लड़की हो सकता है। सुनकर अजीब सा लगा पर अब मेरा ज्यादातर वक्त इंटरनेट पर सेक्स चेंज से संबंधित आर्टिकल पर गुजरने लगा।
जो शुरुआती जानकारी मेरे हाथ लगी वह काफी डरावनी थी। सेक्स चेंज के ऑपरेशन से गुजरने वालों की जिंदगी काफी अजीब सी हो जाती है ऐसे कई किस्से नेट पर मिले। तभी एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि तुम मत घबराओं मैं ऑपरेशन करवा लूंगा।
मुझे लगा कि यह बंदा मेरे लिए इतना बड़ा त्याग कर सकता है तो मैं क्यों नहीं। बस मैंने हिंदुस्तान में कहां ऐसा ऑपरेशन हो सकता है? कौन कर सकता है? ढूंढना शुरू किया।
इस तरह खुला लड़की बनने का रास्ता
किस्मत से मुंबई में ही दो बड़े नाम मेरे सामन आए एक डॉ. मिथलेश मिश्रा जो कि सर्जन थे और दूसरे डॉक्टर अम्या जोशी जो कि हार्मोन ट्रीटमेंट के एक्सपर्ट थे। उनसे मुलाकात कर इसके बारे में बात की।
अब सबसे मुश्किल था अपने घरवालों को राजी करना। इसके लिए मैंने अपनी बहन मंदाकिनी शर्मा जो कि खुद कथक डांसर और कई सीरियल में अदाकारी कर चुकी है कि मदद ली।
मैने अपने महबूब वाली बात उससे छुपा कर सारी बात खुद पर रखते हुए उससे इजाजत मांगी।
मंदाकिनी बोली, तूने पहली बार अपने लिए कुछ मांगा है... आज तक जो कुछ हमने कहा वो तुमने किया, अब हमारी बारी है तुम जो चाहो वो करो।
उम्मीद से कम हुईं मुश्किल
उससे इतने पॉजिटिव रिस्पांस के बाद मां को मनाने की जिम्मेदारी भी उसे ही सौंप दी। मां को मनाना आसान नहीं था यह मैं भी जानता था और मंदाकिनी भी।
जो मां एक बहू का सपना संजोए बैठी हो उससे यह कहना कि तुम्हारा लड़का-लड़की में तब्दील होने वाला है कहना आसान नहीं था। बेटा जनने वाली मां बेटी को कैसे स्वीकारे यह सोचना भी मुश्किल था। खैर उम्मीद से कम मुश्किल हुई।
इस पूरे ऑपरेशन के प्रोसेस में तकरीबन डेढ़ साल का वक्त लगता है, जिसमें डॉक्टर, काउंसिलर, वकील जैसे कई एक्सपर्ट की टीम होती है। खर्च भी तकरीबन आठ लाख आता है। मैं तो एक डांसर था मेरे लिए इतने सारे पैसे जुटाना आसान नहीं था।
इन सबसे मैंने 'उन्हें' अलग रखा
बचपन से सुना था जहां चाहत होती है वहां अल्लाह खुद ब खुद रास्ते बना ही देता है। इसे सच होते अपने ही मामले में मैंने देखा भी।
कुछ ऐसे दोस्तों ने मदद की जिन्हें मैं पर्सनली जानता भी नहीं था। हां एक खास बात यह रही कि इन सबसे मैंने 'उन्हें' अलग रखा था।
ऑपरेशन का प्रोसेस शुरू हुआ, सबसे पहले कांऊसलिंग सेशन होता है वहां से हरी झंडी मिलने के बाद ही सर्जन अपना काम कर सकते हैं। पहली ही काउंसलिंग में डॉक्टर ने इजाजत दे दी। उसके बाद से ट्रीटमेंट शुरू हो गया।
नौ महीने में हुए तीन मेजर ऑपरेशन
पिछले नौ महीने में तीन मेजर ऑपरेशन हुए। एक और अजब इत्तेफाक बताऊं आपको, तीसरा और फाइनल ऑपरेशन नवंबर या दिसंबर में शेड्यूल था। पर डॉक्टर को देश से बाहर जाना था और मेरे रिजल्ट भी अच्छे थे तो वे बोले अक्तूबर में ऑपरेशन कर देता हूं। मेरा जन्मदिन भी १० अक्तूबर था और गौरव का शरीर बदल कर मैं आशना भी उसी दिन बनी।
अब तो मेरी जिंदगी पूरी तरह से बदल चुकी है। कई लड़कियों से दोस्ती भी है जो मेरी जिंदगी की हकीकत से अंजान हैं और मुझे आम लड़की की तरह ही समझती और ट्रीट करती हैं। दिलचस्प तो यह है कि कई लड़के भी मुझे छेडने की कोशिश करते हैं।
मामले पर गौरव के पाकिस्तानी प्रेमी नवाज कहते हैं कि मुझे अपने महबूब पर फख्र है। जब भी मोहब्बत का जिक्र आएगा उसमें उसकी कुर्बानी भी याद रखी जाएगी। इंशाअल्लाह मार्च में हिंदुस्तान आउंगा, पूरी कोशिश करूंगा लखनऊ की उस पाक जमीन को चूम सकूं जहां मेरा महबूब पैदा और बड़ा हुआ है।