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ये हैं कलियुग की सावित्री, आसमान से बरसती आग के बीच कर रहीं सूर्य उपासना, जानें- पूरा माजरा

Tue, 27 Jun 2017 01:43 PM IST
ब्यूरो, अमरउजाला, सीतापुर
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सावित्री - फोटो : amar ujala
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आज के दौर में जहां कुछ लोग सिर्फ अपने लिए सोचते हैं, वहीं कलियुग की सावित्री गांव व देश के कल्याण की कामना को लेकर कठिन तप कर रही हैं। चिलचिलाती धूप में पांच मिनट भी खड़े होना मुश्किल होता है वहीं सावित्री हाथ में ज्योति लेकर दिनभर खड़े होकर सूर्यदेव की उपासना में लीन दिखीं। 
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आस्था व विश्वास की मूरत बनीं सावित्री के इस अनूठे तप की कोई श्रद्धा से सराहना कर रहा है। कठिन हालात में सावित्री का हौसला गांव के लोग बने हैं। पिछले चार सालों से वह साल में एक बार सूर्यदेव की दिनभर इसी तरह आराधना कर समाज व देश के कल्याण का वरदान मांगती हैं।

लहरपुर के ग्राम गेरुहा निवासी सावित्री शुरुआत से ही धार्मिक स्वभाव की रही हैं। चार बेटों व तीन बेटियों की शादी कर अपनी जिम्मेदारी वह पूरी कर चुकी हैं। सावित्री के सबसे छोटे बेटे पंकज बताते हैं कि मां को इस तप का विचार चार साल पहले आया था।
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उन्होंने कहीं से सुना था कि इस तरह से सूर्यदेव की उपासना से हर मनोकामना पूरी होती है। फिर इसके बाद उन्होंने हाथ में ज्योति लेकर खुले आसमान तले सूर्यदेव के सामने खड़ी होकर कठिन साधना शुरू कर दी।


 
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दिनभर खड़े होकर बिना कुछ खाए-पिए करती हैं व्रत

सावित्री - फोटो : amar ujala
बताते हैं कि यह तप सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक चलता है। सावित्री साल में एक बार यह तप करती हैं। हालांकि किस महीने व किस तारीख को वह यह अनुष्ठान करेंगी, यह निश्चित नहीं रहता है। पंकज के मुताबिक मां ने पिछली बार सर्दियों में तप किया था।

दिनभर खड़े होकर बिना कुछ खाए-पीए वह व्रत करती हैं। वह बताते हैं कि मां ने इस बार ठान लिया था कि जब दिन बड़े होंगे तब तप करना है। इस साल रविवार को सावित्री की कठिन सूर्य उपासना शुरू हुई। रविवार को सूर्योदय होते ही सावित्री नंगे पांव हाथ में ज्योति लेकर सूर्यदेव के सामने खड़ी हो गईं।

दिनभर धूप में खड़ी होकर सूर्यदेव की आराधना की। इस तप की खास बात यह कि सूर्यदेव की चाल के साथ ही साधक को अपनी मुद्रा भी बदलना होती है। मसलन, सूर्यदेव जिधर जाते हैं साधक भी उसी ओर मुड़ता रहता है। सावित्री के तप के दौरान दिनभर गांव में भजन कीर्तन भी होते रहे।

दूरदराज के लोग भी सावित्री के इस व्रत के गवाह बनने पहुंचे थे, जिससे माहौल भक्तिमय बन जाता है। पंडित धनंजय मिश्रा बताते हैं कि यह सूर्य उपासना की विशेष विधि है। इसे सूर्यपर्चों या सूर्य ज्योतिष उपासना कहते हैं।

मान्यता है कि जिस भी कामना से यह उपासना की जाती है वह पूरी होती है। उन्होंने बताया कि हर 30 दिनों में एक सूर्य संक्रांति पड़ती है, यह उपासना सूर्य संक्रांति अथवा रविवार को करने का विशेष महत्व है। हमारे देश के सांस्कृतिक नगरों में यह प्राचीन परंपरा आज भी देखने को मिलती है।




 
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