डायलिसिस की व्यवस्था बेपटरी
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ऐसे में अक्तूबर 2017 से कंपनी के हिस्से का भुगतान रोक दिया गया। इसी बीच 2018 में नेफ्रोलॉजी विभाग केे अध्यक्ष डॉ. संत कुमार पांडेय ने इस्तीफा दे दिया। कंपनी ने करीब दो करोड़ 35 लाख का बकाया मांगा तो केजीएमयू प्रशासन ने अनुबंध की पड़ताल की।
सूत्रों की मानें तो इसमें कई खामियां पाई गईं। इसे लेकर तत्कालीन नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष, कुलपति, कुलसचिव, सीएमएस और कंपनी के अधिकारियों की कई बैठकें हुईं, पर नतीजा सिफर रहा। इतना ही नहीं वित्त नियंत्रक ने भुगतान के लिए कंपनी की ओर से दिए जाने वाले प्रपत्र को अवैध ठहराया और नए सिरे से बिल तैयार करने की बात कही।
वहीं, कंपनी इस पर अड़ी रही कि अब तक गलत प्रपत्र पर किस नियम के तहत भुगतान होता रहा। इस बीच कंपनी ने एक के बाद एक 11 मशीनें बंद कर दीं। छह मशीनों पर डायलिसिस चलती रही, लेकिन मंगलवार से तीन मशीनें और बंद कर दी गईं।
सूत्रों की मानें तो केजीएमयू और कंपनी के अनुबंध में बड़ी खामी है। इस कारण वित्त नियंत्रक ने भुगतान करने से मना कर दिया है। बीच का रास्ता निकालते हुए नए सिरे से एग्रीमेंट तैयार कराया जा रहा है। सीएमएस प्रो. एसएन शंखवार का कहना है कि पहले 10 साल का अनुबंध था, जिसे अब साल-साल भर कर बनाया जा रहा है। प्रभारी विभागाध्यक्ष के तौर पर वह अनुबंध पर हस्ताक्षर करने को तैयार हैं, लेकिन कंपनी की ओर से पहल नहीं की जा रही है।
एचआईवी पॉजीटिव कहां जाएं?
नेफ्रोलॉजी विभाग में लगी 17 मशीनों में से छह एचआईवी पॉजीटिव के लिए अलग की गई थीं। अब ये मशीनें बंद हैं। ऐसी स्थिति में रोजाना 25 एचआईवी मरीज प्रभावित हो रहे हैं। ये मरीज केजीएमयू आते हैं और मायूस लौट जाते हैं।
...तो बेवजह की डॉक्टरों की तैनाती
नेफ्रोलाजी विभागाध्यक्ष के इस्तीफे के बाद व्यवस्था सुचारू करने को सीएमएस एसएन शंखवार को नेफ्रोलॉजी का प्रभारी बनाया गया। साथ ही मेडिसिन विभाग से डायलिसिस मशीन चलाने की विशेषज्ञता हासिल करने वाले दो प्रोफेसर व एक असिस्टेंट प्रोफेसर को नेफ्रोलॉजी में अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई। हालांकि, जबसे यह व्यवस्था बनी है, तबसे डायलिसिस मशीनें बंद होती जा रही हैं।
केजीएमयू और कंपनी के बीच चल रही रार से डायलिसिस लगाने वाले निजी अस्पतालों की चांदी है। केजीएमयू में जहां 1200 रुपये लगते हैं, निजी अस्पताल में तीन से साढ़े तीन हजार रुपये देने पड़ रहे हैं। सूत्रों का तो यह भी कहना है कि कंपनी एक-एक कर डायलिसिस मशीनें बंद कर रही है। वह जल्द यूनिट में तालाबंदी करने की फिराक में है। कंपनी के अफसरों ने साफ कह दिया है कि जब खर्च ही नहीं निकल पाएगा तो यूनिट चलाने का कोई फायदा नहीं है।
केजीएमयू के सीएमएस-नेफ्रोलॉजी विभाग से सीधी बात
सवाल- डायलिसिस न होने से मरीजों की मौत हो गई है। इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
जवाब- किसी मरीज के मरने की सूचना नहीं मिली है। हमारा प्रयास है कि जल्द सभी डायलिसिस मशीनें चल जाएं।
सवाल- कंपनी डायलिसिस मशीनें बंद करने की वजह भुगतान न होना बता रही है?
जवाब- भुगतान की प्रक्रिया चल रही है। आज भी वित्त नियंत्रक से बात हुई है। विश्वविद्यालय एक-एक पैसे का भुगतान करेगा। कंपनी को मरीजों का हित देखते हुए मशीनें चलाना चाहिए।
सवाल- बकाया डेढ़ साल का है। फिर मशीनें बंद होने के बाद भुगतान की प्रक्रिया क्यों शुरू की गई?
जवाब- कंपनी से लगातार निर्धारित प्रपत्र पर आवेदन मांगे जा रहे हैं। सरकारी पैसे का भुगतान बिना इसके नहीं किया जा सकता है। जितना बिल दिया था, उसका एक बार भुगतान हो गया है। बाकी भी जल्द कर दिया जाएगा।
सवाल- नए सिरे से अनुबंध बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? पहले एग्रीमेंट नहीं हुआ था क्या?
जवाब- हुआ था, लेकिन उसमें कुछ खामियां थीं, जिसे सुधार कर नए सिरे से बनाया जा रहा है।
सवाल- नए एग्रीमेंट में क्या खास है?
जवाब- पहले अनुबंध 10 साल का था। नियमावली के तहत उसे एक-एक साल का किया जा रहा है। उसमें 17 के बजाय 20 मशीनें लगाने को कहा गया है। हमारी ओर से एग्रीमेंट तैयार है। कंपनी के अधिकारियों का हस्ताक्षर होना है।
फैक्ट फाइल
कुल मशीनें - 30, नेफ्रोलॉजी में 17, मेडिसिन में पांच, ट्रॉमा सेंटर में आठ
नेफ्रोलॉजी में पहले 17 मशीनों पर करीब 60 मरीजों की डायलिसिस होती थी।
नेफ्रोलॉजी में अब तीन मशीनों पर नौ से 10 मशीनों की डायलिसिस हो रही है।
डायलिसिस का खर्च- केजीएमयू में 1200 रुपये, निजी अस्पताल में पहली बार 4 से पांच हजार, दोबारा करीब तीन हजार।
बजट बढ़ा, पर भुगतान नहीं
केजीएमयू का पिछले साल का बजट 837 करोड़ का था, जो इस वर्ष 908 करोड़ कर दिया गया है। इसके बाद भी डायलिसिस के बकाये दो करोड़ रुपये का भुगतान नहीं कर पा रहा है। सूत्रों की मानें तो अक्टूबर तक दो करोड़ की बकायेदारी थी। केजीएमयू ने 30 लाख का भुगतान किया। इस बीच डायलिसिस होती रही। ऐसे में बकाये का ग्राफ जस का तस बना है।
कब तक घाटे में चलाएं मशीनें
डायलिसिस मशीन चलाने में मैन पावर के साथ कुछ सामग्री का भी इस्तेमाल होता है। भुगतान न होने से सामग्री खत्म हो गई है। कर्मचारियों को भुगतान करने में भी दिक्कतें आ रही हैं। कंपनी लगातार मशीनें चला रही हैं। बकाया बढ़ता जा रहा है। आखिर कब तक घाटे में मशीनें चलाते रहेंगे।
- आकांक्षा, प्रभारी, डायलिसिस कंपनी
केजीएमयू व अन्य जिला स्तर के अस्पताल हमारे नियंत्रण में हैं। मरीजों के हितों को देखते हुए डायलिसिस लगाने वाले सभी सरकारी संस्थानों से अपील की जाएगी कि व्यवस्थाएं दुरुस्त करें। इससे डायलिसिस वाले मरीजों को राहत मिल सकें। इसके लिए सभी को पत्र लिखेंगे।
- डॉ. नरेंद्र अग्रवाल, सीएमओ