विश्व पर्यावरण दिवस 2021: व्रत में भारतीय जड़ से उगने वाली शाक या फलों का सेवन नहीं करते हैं
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फल और शाक से जीवन था स्वस्थ
मनुष्य को जब खेती और पशुपालन का ज्ञान हुआ तब गाय, भैंस का ताजा दूध पीकर, खेतों से ताजा फल और शाक तोड़कर, घी, दही आदि का सेवन करके उसका जीवन चल रहा था। उसे किसी प्रकार का कोई रोग नहीं था। दिनभर खेतों में काम करने के बाद खेत से प्याज और मिर्च तोड़कर रोटी खा लेने से भी उसके शरीर को कोई नुकसान नहीं होता था, वो लंबी आयु जीता था। मौसमी फलों का सेवन उसके शरीर को सभी आवश्यक पोषक तत्व दिया करते थे।
जीव हत्या का पलटवार भोग रहा है विश्व
शिकार करके मांस का सेवन राजाओं के बीच भारत में प्रचलित हुआ करता था लेकिन यह हर घर में हो, ये हमारे देश में संभव नहीं था और इसकी भी अपनी कुछ मर्यादाएं थीं। सांप, केकड़े, बिच्छु आदि का सेवन विदेशों में प्रचलित है। भारत में तो ऐसे महान धर्म हुए हैं जिन्होंने अपना पेट भरने के लिए जीवाणुओं की हत्या तक को नकार दिया है, यही कारण है कि आज भी व्रत में भारतीय जड़ से उगने वाली शाक या फलों का सेवन नहीं करते हैं। चीन जैसे देश ने जानवर की किसी प्रजाति को नहीं छोड़ा, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं रखी जिसका खामियाजा कोरोना के रूप में पिछले डेढ़ वर्ष से संपूर्ण विश्व भुगत रहा है।
विश्व पर्यावरण दिवस 2021: मोटापे जैसी समस्याएं दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है
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पैकेज्ड और जंक फूड बीमारियों का है घर
पैकेज्ड और जंक फूड पाश्चात्य सभ्यता की देन है। मैदे से बनी खाद्य सामग्रियों का सेवन बीमारियों को न्योता देता है। छोटे बच्चों में तक डायबिटीज और मोटापे जैसी समस्याएं दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। इसके पीछे मुख्य कारण है पर्यावरण से दूरी अर्थात फल और ताजा शाक से दूरी और भूख लगने पर मैगी, चिप्स एवं अन्य पैकेज्ड फूड का सेवन। बच्चे ही क्या बड़े भी इन सभी चीजों का सेवन खूब करते हैं जिसका परिणाम हम रक्तचाप, शुगर, पेट संबंधी समस्याओं और मोटापे के रूप में देख ही रहे हैं। आने वाले समय में तो हालात और भी बिगड़ना ही हैं, यदि अब भी समझ नहीं पकड़ी तो।
विश्व पर्यावरण दिवस 2021: जीन्स जैसा पहनावा मजदूरों के लिए बनाया गया था
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फैशन के नाम पर अन्याय
तरह-तरह के फैब्रिक बनाने के लिए पर्यावरण को न जाने कितना नुकसान पहुंचाया जाता है चमड़े के रूप में उदाहरण हमारे सामने ही है। महात्मा गांधी ने संपूर्ण विश्व को खादी पहनने के लिए सिर्फ इसलिए ही प्रेरित नहीं किया था कि यह शरीर के लिए आरामदायक है बल्कि पर्यावरण को भी खादी से कोई नुकसान नहीं है लेकिन यह सिर्फ खादी केंद्रों तक ही सीमित रह गई है। जीन्स जैसा पहनावा जो कि मजदूरों के लिए बनाया गया था आज फैशन बन चुका है। हमारा शरीर जो कि प्रकृति का हिस्सा है, भीषण गर्मी में भी जीन्स जैसा कपड़ा पहनना क्या उसके साथ अन्याय नहीं है।
टैटू और पियर्सिंग का ट्रेंड
तरह-तरह की इंक का प्रयोग करके शरीर पर टैटू गुदवाना और पेट की नाभि पर पियर्सिंग करवाना, शरीर के विभिन्न अंगों पर छेद करवाकर अलग-अलग मेटल की जूलरी को उनमें फंसाना शरीर की प्रकृति को नुकसान पहुंचाता है। यह पर्यावरण के नियमों के खिलाफ है। फैशन के नाम पर शरीर को नुकसान पहुंचाना कहां तक सही दिखाई पड़ता है? फैशन के नाम पर किसी भी ट्रेंड का पालन करना प्रकृति के साथ छेड़छाड़ है।