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कालीदास की रचना 'मेघदूत' में सौंदर्य वर्णन

Tue, 23 Dec 2014 11:26 AM IST
अमर उजाला, दिल्ली
कालिदास संस्कृत भाषा के सबसे महान कवि और नाटककार थे। कालिदास ने भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार बनाकर रचनाएं की। कालिदास अपनी अलंकार युक्त सुंदर सरल और मधुर भाषा के लिये विशेष रूप से जाने जाते हैं। उनके ऋतु वर्णन अद्वितीय हैं और उनकी उपमाएं बेमिसाल। संगीत उनके साहित्य का प्रमुख अंग है और रस का सृजन करने में उनकी कोई उपमा नहीं। सौंदर्य वर्णन की दृष्टि से मेघदूत उनकी श्रेष्ठ रचना है।


कहानी कुछ इस तरह से शुरु होती है-
एक यक्ष था। वह अपने कर्तव्य पालन में असावधान हुआ तो यक्षपति ने उसे शाप दिया कि वर्ष-भर पत्नी का भारी विरह सहो। उसने रामगिरि के आश्रमों में बस्ती बनाई जहाँ घने छायादार पेड़ थे और जहाँ सीता जी के स्नानों द्वारा पवित्र हुए जल-कुंड भरे थे। आगे हम कुछ चुने हुए श्लोक प्रस्तुत कर रहे हैं।

तस्या: किंचित्करधृतमिव प्राप्तवानीरशाखं
नीत्वा नीलं सलिलवसनं मुक्तरोघोनितम्बम्।
प्रस्थानं ते कथमपि सखे! लम्बमानस्य भावि
शातास्वादो विवृतजघनां को विहातुं समूर्थ:।।

हे मेघ, गम्भीरा के तट से हटा हुआ नीला जल, जिसे बेंत अपनी झुकी हुई डालों से छूते हैं, ऐसा जान पड़ेगा मानो नितम्ब से सरका हुआ वस्त्र उसने अपने हाथों से पकड़ा रक्खा है।


हे मित्र, उसे सरकाकर उसके ऊपर लम्बे-लम्बे झुके हुए तुम्हारा वहाँ से हटना कठिन ही होगा, क्योंकि स्वाद जाननेवाला कौन ऐसा है जो उघड़े हुए जघन भाग का त्याग कर सके।

तस्योत्सङ्गे प्रणयिन इव स्रोतङ्गादुकूलां
न त्वं दृष्ट्वा न पुनरलकां ज्ञास्यसे कामचारीन्!
या व: काले वहति सलिलोद्गारमुच्चैर्विमाना
मुक्ताजालग्रथितमलकं कामिनीवाभ्रवृन्दम्।।

हे कामचारी मेघ, जिसकी गंगारूपी साड़ी सरक गई है ऐसी उस अलका को प्रेमी कैलास की गोद में बैठी देखकर तुम न पहचान सको, ऐसा नहीं हो सकता।

बरसात के दिनों में उसके ऊँचे महलों पर जब तुम छा जाओगे तब तुम्हारे जल की झड़ी से वह ऐसी सुहावनी लगेगी जैसी मोतियों के जालों से गुँथे हुए घुँघराले केशोंवाली कोई कामिनी हो।

नीवीबन्धोच्छ्वसितशिथिलं यत्र बिम्बाधाराणां
क्षौमं रागादनिभृतकरेष्वाक्षिपत्सु प्रियेषु।
अर्चिस्तुङ्गानाभिमुखमपि प्राप्तरत्नप्रदीपान्
ह्नीमूढानां भवति विफलप्रेरणा चूर्णमुष्टि:।।

वहाँ अलका में कामी प्रियतम अपने चंचल हाथों से लाल अधरोंवाली स्त्रियों के नीवी बन्धनों के तड़क जाने से ढीले पड़े हुए दुकूलों को जब खींचने लगते हैं, तो लज्जा में बूड़ी हुई वे बेचारी किरणें छिटकाते हुए रत्नीदीपों को सामने रखे होने पर भी कुंकुम की मूठी से बुझाने में सफल नहीं होतीं।
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