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... और यूं संबंध बनाया नवाब और वजीर ने

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ये अंश 'कई चांद थे सरे-आसमां' के 'हबीबुन्निसा' अंक से लिया गया है जिसके रचयिता है शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी। इस उपन्यास का अनुवाद किया है नरेश 'नदीम' ने।
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ये उपन्यास बताता है कि 18वीं और 19वीं सदी के हिंद-इस्लामी समाज में शायर, आशिक़, फ़नकार और आम इंसान, जिंदगी और जज्बाती और रूहानी तौर पर मुकम्मल होने की तलाश किस तरह और किन उसूलों की बिना पर किया करते थे। पढ़िए, इस उपन्यास के 'हबीबुन्निसा' अंक की एक झलक।

वजीर के भी दिल में अब फूल खिलने लगे थे

उसकी मुस्कुराती हुई आंखें नवाब को देख रही थीं और नवाब उसके बिल्कुल पास सरककर यूं बैठ गए कि उनका एक हाथ वजीर के घुटने पर और दूसरा उसके कंधे पर था। इस हिलने-डूलने में दुपट्टा वजीर के सर से फिसलकर कहीं रह गया और गर्दन की बुलंदी की नजाकत कुछ और नुमायां हो गई।

नवाब ने वजीर के गेसुओं में उंगलिया फेरीं और चाहा कि उसके पांयचे ऊपर खिसकाकर पिंडलियों और हो सके तो उसके भी आगे की सैर करें।

वजीर के भी दिल में अब फूल खिलने लगे थे लेकिन वो खुद को आसानी से पकड़ी जाने वाली भी जाहिर नहीं करना चाहती थी।

हाथ ‌खींचकर अपने सीने पर रखा

जैसे ही नवाब ने पांयचे सरकाए और घुटने को प्यार किया और चाहा कि हाथ और आगे ले जाएं, कि वजीर ने जल्दी से पांव फैला दिए और पांयचे बराबर करती हुई बोली, ''उंगली पकड़ते-पकड़ते पौंहचा पकड़ना तो सुना था, लेकिन पिंडली और जानू की बुलंदी से पस्ती का सफर करने की हिम्मत करने वाले आज ही देखे। सरकार ने ये नटों का तमाशा कहां से सीखा?''

वो खिलखिलाकर हंसी और इस बात पर यकीन दिलाने के लिए कि उसे नवाब को नाराज करना मंजूर न था, उसने नवाब का हाथ ‌खींचकर अपने सीने पर रखा और कहने लगी, ''अब देखिए न, आपकी लूटमार ने मेरे दिल का क्या हाल कर दिया! धड़कन तेज हो गई। कहीं ग़शी न छा जाए।''

जब उसने कुर्ते के तुकमे खोलने के लिए हाथ बढ़ाया

नवाब ने वजीर का पूरा बदन अपने बाजुओं में समेटने की कोशिश करते हुए कहा, ''हम तो आप पर पहले ही से गश हैं। आप गश करेंगी तो हम संभाल लेंगे। आखिर अल्लाह ने आगोशें किसलिए बनाई हैं?''

इस बार वजीर ने खुद को नवाब के बाजुओं में आने दिया और उनके कंधे पर सर रखकर बोली,''अल्लाह आपकी खुशबू ऐसी है कि अगला यूं ही नशे में लड़खड़ाकर चारों हाथ-पांव से गिरे, सागर को मेरे हाथ से लेना कि चला मैं।''

''आपकी कोई लड़खड़ाहट ऐसी नहीं जिस पर सहारा देने, संभालने, उठाने को हम न मौजूद हों। आप वल्लाह लड़खडाएं तो, हम कब से बेचैन हो रहे हैं।''

यह कहकर नवाब ने वजीर का दुपट्टा अलग कर दिया और उसके कुर्ते के तुकमे खोलने के लिए उसके गिरेबान पर हाथ डाला।

उसके बदन पर बस दो कपड़े थे

उन्होंने देख लिया था कि वजीर के बदन पर बस दो कपड़े थे, कोई जेरजामा न था। वजीर ने तड़पकर खुद को अलग किया और बोली, ''हटिए, आप यह क्या कर रहे हैं? तमाम रौशनियां जल रही हैं।''

''शमएं जल रही हैं तो कोई बात नहीं, इन्हें जलने ही दीजिए।''

''तौबा! कहां मैं, कहां चमकदार शमएं! मैं तो कह रही थी कि रौशनी में...''

''जी हां रौशनी में। आपके बदन की शमा के आगे ये तमाम शमएं खुद ही झिलमिला उठेंगी... अब औश्र न तरसाइए। रात भी मेरे आंसुओं से भीगकर अब ठंडी होने को है।''

उसने खुद ही अपने कपड़े उतार दिए

''अच्छा...'' वजीर ने फिर दुपट्टा ओढ़कर उसका घूंघट सा लगाते हुए कहा, ''जरा परे हटकर तो बैठिए...'' और फिर उसने नवाब के मुंह पर हाथ रखकर उनका मुंह दूसरी तरफ फेर दिया। ''इधर देखिएगा नहीं। आंखें बंद रहें तो और भी अच्छा है।''

इससे पहले कि शम्सुद्दीन अहमद को कुछ और सूझता, वजीर ने दोनों कपड़े उतार फेंके, ढीले-ढाले तो थे ही... फिर उसने दुपट्टे को चादर की तरह ओढ़ा। ''लीजिए साहब, अब इधर मुंह कर लीजिए। अब कुछ देखने को नहीं हैं।''

वजीर का बदन दुपट्टे से झलक रहा था लेकिन उसने दुपट्टे की चादर इस महारत से बनाई थी कि वो अब भी नग्न नहीं लग रही थी। उसकी कुछ शर्माती, कुछ हंसती हई रौशन आंखें अलबत्ता शौक के दरवाजे पर दस्तक दे रही थीं।

अंग्रेज ने इसे बेहया बना दिया

नवाब ने बात तो समझ ली थी लेकिन फिर भी उन्हें यह उम्मीद न थी कि वजीर अपना लिबास खुद ही अलग करेगी। उनके दिल में एक लम्हे के लिए चिढ़ का बबूला सा उठा। अंग्रेज के साथ ने इसे बेहया बना दिया है।

ये खुद से कपड़े उतारने की बात वहीं सीखी होगी... लेकिन उसी लम्हे वो शर्मिंदा भी हुए। उन्हें मीर का मिसरा याद आयाः

''कपड़े उतारे उनने, सर खेंचे हम कफन में''

तो जो बात मीर साहब के जमाने में सौ साल पहले सही थी, वो आज भी सही रहेगी। नवाब ने वजीर का दुपट‍्टा आहिस्तगी से खींचा। वो फिर बदन चुराए हुए बैठी थी, लेकिन इस बार बेपर्दगी ने पर्दापोशियों को हर मोर्चे पर शिकस्त दे दी थी।

उनके बदन में सनसनी सी दौड़ गई। इधर उनकी आंखों में शौक की कंदीलें रौशन हो रही थीं कि उधर मीर के उसी शेर का पहला मिसरा उनकी यादों की गहराइयों से निकलकर उनके जहन को जगमगा गयाः

''मर-मर गए नजर कर उसके बरहना तन में''

अब बदन बेकाबू हो रहा है

इस वक्त मेरी यही हालत है, या शायद इससे भी बदत्तर। उन्हें अपना बदन बेकाबू होता मालूम हुआ। जहन के दांत पर दांत जमाकर रोकथाम के सारे सबक उन्होंने अपनी रूह और अपने दिल को पढ़ा डाले।

अपनी छोटी मगर मसरूफ जिंदगी में शम्सुद्दीन अहमद ने बहुत से बदन देखे थे। बाजारी, खानगी, हवस, शौक या फर्ज के अहसास की मारी बेगमें, लेकिन यहां तो आलम ही कुछ और था।

वजीर का कद औसत से जरा निकलता हुआ था, लेकिन वो ऐसी बदनचोर थी कि कपड़े पहनकर बिल्कुल धान-पान लगती थी। कपड़ों के बगैर भी वो दुबली-पतली लेकिन कामिनी और विलासिनी मालूम होती थी।

पेशानी से आंख, नाक और होंठों तक, ठोड़ी से गर्दन तक, गले से कलाई व बाजू तक, हथेली से पौंहचों तक, कंधे से सीने तक, पेट से पेडू तक, पेडू से नीचे ‌कूल्हों तक, कूल्हों की पुश्त से रानों और पिंडली तक, टखनों से पैर, तलवों और अंगुलियों तक, जुल्फ और गेसू से पेडू के संदली उभार की, हरियाली तक कोई ऐसी जगह नहीं थी, जो संतुलित, सुडौल और अपने मौके के एतबार से भारी, बारीक या तंग न हो, और नजाकत में कहीं भी कमी न थी।
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नवाब उसे हर जगह छूने के लिए बेकरार था

शम्सुद्दीन इहमद को लगा कि उनकी सांस रूक जाएगी, या शायद उनकी दुनिया इतनी जोर से चक्कर खा रही थी कि उसका बंद-बंद खिंचता हुआ सा मालूम हो रहा था। वजीर का बदन सुरमई बिल्लौरी गुड़िया का सा था, जिसे किसी माहिर बुततराश ने बनाकर रख दिया था कि शायद कुदरत फूंककर उसमें जान डाल दें और फिर शायद ऐसा ही हुआ था।

शम्सुद्दीन अहमद उसे हाथ लगाते डरता था और उसे हर जगह छूने के लिए बेकरार भी था। वजीर ने चाहा कि हाथ बढ़ाकर शम्सुद्दीन अहमद के कुर्ते के बंद भी ढीले कर। लेकिन नवाब ने उसका हाथ पकड़ लिया, फिर उसके दोनों हल्के और मेंहदी से सजे हुए हाथ अपने एक हाथ में ले लिए और एक-एक करके दसों उंगलियों को बोसा दिया। फिर उसने वजीर के जानुओं पर मुंह रखकर आंखें बंद कर लीं।
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