आंखों का दिमाग से सीधा संबंध भले ही न हो, लेकिन कमजोर नजर के बच्चों में साइकोलॉजिकल असर जरूर देखने को मिलता है।
आंखों की सेहत से जुड़े कई लक्षण दिमाग की सेहत भी बयां करते हैं। साइकोलॉजिकल साइंस के एक ताजा अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है। इसके अनुसार आंखों के पीछे की छोटी-छोटी नसों की जांच करने पर पता चल जाता है कि इंसान का दिमाग कितना स्वस्थ है।
मुख्य शोधकर्ता इडान शालेव के अनुसार, ′आंखों की नसों का आकार, बनावट और कार्यप्रणाली दिमाग की नसों जैसी ही होती है। आंखों की नसें भी उसी कोशिका से विकसित होती हैं, जिससे दिमाग की नसें विकसित होती हैं।′
वैज्ञानिकों का दावा है कि आंखों की नसों के जरिये सिर्फ युवाओं की ही नहीं, बल्कि छोटे बच्चों की दिमागी सेहत के बारे में भी जानकारी हासिल कर सकते हैं।
आंखों की ऐसी कई बीमारियां हैं, जो दिमागी सेहत की तरफ इशारा करती हैं। भैंगापन और टोसिस (इसमें आंख के ऊपर की लिड नीचे की ओर आ जाती है।) जबकि मिस्टेगमस बीमारी में आंखें हिलती रहती हैं। इन बीमारियों का संबंध कहीं न कहीं न्यूरोलॉजिकल गड़बड़ी से ही जुड़ा हुआ है।
हालांकि यह अध्ययन अपने प्रारंभिक चरण में है, इसलिए इसके बारे में निश्चित तौर पर अभी कुछ भी दावा नहीं किया जा सकता। इतना जरूर है कि दिमाग से जुड़ी गंभीर बीमारियों के अर्ली डिटेक्शन और कारगर इलाज की संभावना बढ़ेगी।
डिमेंशिया, एल्जाइमर, सिजोफ्रेनिया, डिप्रेशन, मेनिक डिप्रेसिव साइकोसिस, एंग्जाइटी न्यूरोसिस जैसी मानसिक बीमारियों का पता बहुत देर से चलता है। देर होने पर ये बीमारियां बहुत खराब रूप ले लेती है। अगर शोध कामयाब होता है, तो वक्त रहते ऐसी बीमारी का पता लगाकर उसकी रोकथाम में मदद मिलेगी।