देश में कुछ ही कंपनियां जो देशभर के अपने 500 फैक्ट्रियों में हवा से ऑक्सीजन निकालने का काम करती है। पूरे उत्पादन का सिर्फ 15 फीसदी ऑक्सीजन ही अस्पतालों में इस्तेमाल किया जाता है। बाकी ऑक्सीजन का इस्तेमाल स्टील और ऑटोमोबाइल उद्योगों में ब्लास्ट फर्नेस और वेल्डिंग के काम में किया जाता है।
ऑक्सीजन बनाने वाली ये कंपनियां टैंकर में तरल रूप में अस्पतालों को मुहैया कराया जाता है और फिर इन टैंकर को सीधे पाइप के सहारे बेड से जोड़ दिया जाता है। ऑक्सीजन की स्टील और एल्मुनियम के सिलेंडर के सहारे आपूर्ति की जाती है। पोर्टेबल मशीनों को कंसंट्रेटर्स कहा जाता है, ये हवा से ऑक्सीजन को फिल्टर भी कर सकती है। कोरोना के मरीजों के इलाज में अब इनका इस्तेमाल किया जा रहा है।
आंकड़े नहीं थे उपलब्ध
लेकिन जब भारत में जब कोरोना का संक्रमण शुरू हुआ तो पहला मामला जनवरी में सामने आया था और अप्रैल में संक्रमण बढ़ना शुरू हुआ। उस वक्त ऑक्सीजन की सप्लाई को लेकर बहुत कम आंकड़े उपलब्ध थे। ऑल इंडिया इंडस्ट्रियल गैसेज मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष साकेत टिक्कू का कहना है, 'हमें नहीं पता था कि सिलिंडर और टैंकों के सहारे कितना ऑक्सीजन सप्लाई किया जा रहा था। हमें यह भी नहीं पता था कि कितने सिलिंडर हमारे पास मौजूद थे।'
अप्रैल में ही अधिकारियों ने गैस कंपनियों के साथ बैठक की। उन्होंने पाया कि जम्मू-कश्मीर में तो एक भी ऑक्सीजन की फैक्ट्री नहीं है और अंडमान में कोई मेडिकल ऑक्सीजन बनाने वाला नहीं है। वहां सिलिंडर भारत के दूसरे हिस्से से पहुंचाए जाते थे। पूर्वोत्तर के राज्यों में आपूर्ति कम थी।
सरकार ने उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले ऑक्सीजन को मेडिकल इस्तेमाल में लाने का फैसला लिया। दोनों ही ऑक्सीजन में थोड़ा फर्क है। मेडिकल उद्देश्य से निकाले गए ऑक्सीजन अधिक शुद्ध होता है।
इसे पर्याप्त तरीके से परिष्कृत किया जाता है और सख्त नियमों के तहत इसकी आपूर्ति की जाती है। गैस कंपनियों ने कंट्रोल रूम भी अपने यहां बनाए ताकि वहां वे देशभर से अस्पताल और केयर सेंटर्स से आने वाले कॉल ले सकें और यह निश्चित कर सकें कि उन्हें आपूर्ति समय से मिल पाए। लेकिन फिर भी समस्याएं आ रही हैं।
कई छोटी कंपनियों को सरकारी अस्पताल की ओर से भुगतान नहीं किया जा रहा है जबकि ये अस्पताल बड़े पैमाने पर ऑक्सीजन खरीद रहे हैं। साकेत टिक्कू बताते हैं कि असम में एक साल से ज्यादा होने को है और अब तक सरकार ने ऑक्सीजन सप्लायर्स को भुगतान नहीं किया है। एक मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पादन करने वाली कंपनी की बिजली काट दी गई थी, क्योंकि उसने पैसे की कमी की वजह से उसने बिल का भुगतान नहीं किया था।
अगस्त 2017 में उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी के कारण 30 बच्चों ने दम तोड़ दिया था। बिल नहीं चुकाने की वजह से वहां ऑक्सीजन की आपूर्ति काट दी गई थी। साकेत टिक्कू कहते हैं कि, 'एक तरफ तो सरकार आपूर्ति निश्चित करने की बात करती है तो दूसरी ओर वो समय पर इसका भुगतान नहीं करती है। महामारी के दौरान भी यही स्थिति बनी हुई है।'
भारत सरकार का दावा है कि अब 3000 से ज्यादा कोविड-19 अस्पतालों और केयर सेंटर्स में 1,30,000 ऑक्सीजन लगे बेड मौजूद है। सरकार की कोरोना के मरीजों के लिए सरकारी अस्पतालों में 50,000 से ज्यादा वेंटिलेटर देने की योजना है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि कितनी जगहों पर इनमें लिक्विड ऑक्सीजन टैंक और सिलिंडर बैंक मौजूद हैं जो मरीजों को पाइप के सहारे ऑक्सीजन दे पाए। कई सरकारी अस्पतालों में पाइप से ऑक्सीजन देने की सुविधा नहीं है, इसलिए वो बड़े-बड़े सिलिंडरों पर इसके लिए निर्भर रहते हैं।
महामारी फैलने के साथ कई छोटे कस्बों और गांवों में लोग इन सुविधाओं की कमी की वजह से मारे गए हैं। इन लोगों को मरने से बचाया जा सकता था। डॉक्टर अतुल वर्मा बिहार में 20 बिस्तरों वाला एक अस्पताल चलाते हैं। वो बताते हैं, 'हमें ज्यादा वेंटिलेटर की जरूरत नहीं है बल्कि हमें सुदूर इलाकों में ऑक्सीजन की आपूर्ति की जरूरत है।'
भारत में मेडिकल ऑक्सीजन आपूर्ति की क्षमता मौजूदा समय में जो जरूरत है, उससे करीब पांच गुना ज्यादा है। इसलिए आपूर्ति में कमी को लेकर कोई चिंता करने की बात नहीं है। आश्चर्यजनक रूप से निजी अस्पतालों में मांग में कमी आई है। इसकी एक वजह यह है कि मरीज कोरोना होने के डर से अस्पताल जाने से बच रहे हैं और बाद के लिए टाल रहे हैं। एक अग्रणी गैस कंपनी लिंडे इंडिया में मार्केटिंग के हेड अनिर्बान सेन का कहना है, 'हमारे मेडिकल ऑक्सीजन की सप्लाई में 20 फीसदी की गिरावट आई है, क्योंकि निजी अस्पतालों में दूसरे मरीजों का आना कम हुआ है।'
यह साफ है कि जब संक्रमण बढ़ेगा तो भारत में आने वाले हफ्तों में ऑक्सीजन की आपूर्ति वाले पर्याप्त बेडों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती होगी। अनिर्बान सेन कहते हैं, 'छोटे शहरों और गांवों में ऑक्सीजन की आपूर्ति करना एक बड़ी चुनौती होगी। सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं इन जगहों पर। सिलिंडर और पाइप वाले ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं। यह मुश्किल होने वाला है। हमें अब इसकी तैयारी करने की जरूरत है।'