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लकवे का कारण भी बन रहा कोरोना, जानिए क्या है ये गुलियन बैरे सिंड्रोम

Sun, 19 Jul 2020 05:12 AM IST
योगेश साहू हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, लंदन/बर्लिन।
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लकवाग्रस्त मरीज (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock
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जानलेवा होने के साथ ही कोरोना लकवे का कारण भी बन रहा है। ब्रिटेन में 53 वर्षीय व्यक्ति को अचानक खड़े होने की तकलीफ शुरू हुई। अस्पताल पहुंचा तो तीन दिन बाद हाथ-पैरों ने काम करना बंद कर दिया। सांस संबंधी तकलीफ शुरू होने के कुछ पलों में वह लकवाग्रस्त हो गया।

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ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ‘केस रिपोर्ट’ के मुताबिक, बाद में हुई जांच में कोरोना संक्रमण की पुष्टि हुई। सीटी स्कैन में पता चला कि वह ऑटो इम्यून डिसऑर्डर गुलियन बैरे सिंड्रोम (जीबी सिंड्रोम) से पीड़ित है। ब्रिटेन में हर साल जीबीएस के 1500 मामले सामने आते हैं। कोरोना मरीज में ये ब्रिटेन में पहला केस है। दुनियाभर में अब तक दस मामले सामने आए हैं।

ऐसे होता है यह सिंड्रोम
चिकित्सकों का कहना है कि शरीर में वायरस या कीटाणु के प्रवेश पर इम्युनिटी उससे लड़ती है। जीबीएस के मरीजों में शरीर की इम्युनिटी सीधे तंत्रिका तंत्र से जुड़ी नसों को प्रभावित करती है जो मस्तिष्क से लेकर रीढ़ तक फैली रहती हैं। ये स्थिति जानलेवा है। ऐसा वायरल और बैक्टीरियल संक्रमण के बाद इम्यून सिस्टम अत्यधिक सक्रिय होने से हो जाता है।
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हर पांच में से एक को लकवा होने की आशंका 
वैज्ञानिकों के अनुसार सांस संबंधी संक्रमण के बाद जीबीएस की तकलीफ होती है। फ्लू, पाचनतंत्र में संक्रमण या फूड प्वाइजनिंग से भी ऐसा होता है। अधिकतर मरीज गंभीर हालत के बाद भी ठीक हो जाते हैं लेकिन देरी से पहचान से पांच में से एक के लकवाग्रस्त होने की आशंका रहती है।

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यह भी जानें: प्रोटीन बनाने वाले राइबोसोम्स को ब्लॉक कर देता है वायरस

यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूनिख के वैज्ञानिकों का कहना है कि नॉनस्ट्रक्चरल प्रोटीन (एनएसपी1) वायरस का प्रमुख हथियार है जिसकी मदद से वे मानव शरीर में अपनी संख्या बढ़ाता है। साइंस जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार एनएसपी1 संक्रमित कोशिकाओं में प्रोटीन को जाने से रोकता है।

वैज्ञानिकों का दावा है कि इसका पता लगने के बाद वायरस के खिलाफ असरदार दवा बनाने में मदद मिल सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार वायरस प्रोटीन का उत्पादन करने वाले राइबोसोम्स को ब्लॉक कर देता है जिसके बाद वो हावी होता है और तेजी के साथ अपनी संख्या बढ़ाता है।

वैज्ञानिकों का दावा है कि सार्स महामारी में भी इसकी मौजूदगी का पता लगा था और एनएसपी1 को बीमारी के रूप में चिन्हित किया गया था। 
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