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Coronavirus: क्या जापान ने 100 साल पुराने तरीके से किया कोरोना को कंट्रोल?

Mon, 06 Jul 2020 11:19 AM IST
सोनू शर्मा बीबीसी हिंदी
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मास्क लगाकर साइकिल चलाती दो लड़कियां (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
जापान में कोविड-19 की तबाही कम क्यों रही? यह एक बड़ा सवाल है जिसके कई जवाब हो सकते हैं। अब वजह चाहे जापानियों के रहन-सहन के तरीके हों या फिर उनकी 'बेहतर इम्युनिटी' यानी शरीर की बेहतर रोग प्रतिरोधक क्षमता। केवल जापान में कोविड-19 से मृत्यु दर उस क्षेत्र के देशों में सबसे कम नहीं है। दक्षिण कोरिया, ताइवान, हॉन्गकॉन्ग और वियतनाम में भी मृत्यु दर काफी कम है। लेकिन 2020 की शुरुआत में, जापान में कोविड-19 से औसत से भी कम मौत हुई।

हालांकि अप्रैल में जापान में लगभग हजार मौत अधिक हुई थी- शायद कोविड-19 की वजह से। पर फिर भी अगर पूरे साल का आंकड़ा देखा जाए तो हो सकता है कि जापान में होने वाली सालाना मौत 2019 की तुलना में कम रहे। ये बात इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि जापान में कई परिस्थितियां ऐसी हैं जो इसे कोविड-19 के लिए एक आसान शिकार बना सकती हैं। जापान ने कोविड-19 महामारी से बचने के लिए उतने प्रयास भी नहीं किए जितने जापान के पड़ोसी देशों ने किए हैं। 
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मास्क लगाए एक बुजुर्ग (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
जापान में क्या हुआ? 

फरवरी में जिस वक्त चीनी शहर वुहान संक्रमण के मामले में अपने चरम पर था, वुहान के अस्पताल पूरी तरह भर चुके थे और अधिकांश देशों ने चीनी यात्रियों के लिए अपने दरवाजे बंद कर लिए थे, तब भी जापान ने अपनी सीमाएं नहीं बंद कीं। कोरोना वायरस संक्रमण फैलने के काफी शुरू में ही ये बात स्पष्ट हो गई थी कि कोविड-19 बुजुर्गों के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। खासकर तब, जब वे सीधे तौर पर किसी संक्रमित इंसान के संपर्क में आ जाएं।  

जापान में अन्य देशों की तुलना में बुजुर्गों की संख्या भी सबसे अधिक है और अधिकांश लोग बड़े-भीड़भाड़ वाले शहरों में बसे हैं। ग्रेटर टोक्यो में करीब तीन करोड़ सत्तर लाख लोग रहते हैं जो शहर में आने-जाने के लिए भीड़भाड़ वाली ट्रेनों का सहारा लेते हैं। फिर जापान ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की 'टेस्ट, टेस्ट और टेस्ट' करने की सलाह को भी नहीं माना। अभी भी, जापान में कुल साढ़े तीन लाख पीसीआर टेस्ट हुए हैं जो वहां की आबादी का सिर्फ 0.27 प्रतिशत है। और ना ही जापान ने यूरोप की तरह कठोर लॉकडाउन लागू किया। 
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कोरोना की जांच करता एक स्वास्थ्यकर्मी - फोटो : Social media/Japan News
अप्रैल में, जापान सरकार ने देश में इमर्जेंसी लागू करने का आदेश दिया था, लेकिन लोगों से 'घरों में रहने की गुजारिश' स्वैच्छिक आधार पर की गई थी। इसके लिए सरकार की ओर से जबरदस्ती नहीं की गई। हालांकि, गैर-जरूरी व्यापार बंद करने को कहा गया था, लेकिन उन्हें खोलने पर भी कोई जुर्माना नहीं था। 

न्यूजीलैंड और वियतनाम, जिन्होंने इस महामारी के खिलाफ सफलता हासिल की है और इसे नियंत्रण में करके दिखाया है, उनकी तरह सीमाएं बंद करने, लॉकडाउन या क्वारंटीन के सख्त नियम बनाने और व्यापक स्तर पर कोविड-19 की टेस्टिंग करने जैसे कदम भी जापान ने नहीं उठाए। 

इसके बावजूद, जापान में कोरोना संक्रमण का पहला केस सामने आने के पांच महीने बाद वहां 20 हजार मामलों की पुष्टि हुई है और कोविड-19 की वजह से 1000 से कुछ अधिक मौत हुई है। जापान में इमर्जेंसी हटा ली गई है और सामान्य जीवन बहुत तेजी से पटरी पर लौट रहा है। कई वैज्ञानिक प्रमाण भी मिले हैं कि जापान ने वाकई संक्रमण के फैलाव को रोक दिया है। कम से कम फिलहाल तो यही माना जा रहा है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
जापान में टेलिकॉम कंपनी सॉफ्टबैंक ने अपने 40 हजार कर्मचारियों के कोविड-19 एंटी-बॉडी टेस्ट करवाए, जिससे पता चला कि सिर्फ 0.24 प्रतिशत कर्मचारी ही कोरोना वायरस के संपर्क में आए। टोक्यो में आकस्मिक टेस्टिंग के अंतर्गत करीब आठ हजार लोगों के टेस्ट किए गए थे, जिसमें सिर्फ 0.1 प्रतिशत लोगों को ही कोरोना पॉजिटिव पाया गया। पिछले महीने, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने इमर्जेंसी हटाए जाने की घोषणा करते हुए बड़े गर्व से 'जापान मॉडल' की बात की थी और कहा था कि 'अन्य देशों को भी जापान से सीखना चाहिए।'
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
जापान के मामले में क्या खास है?

अगर आप जापान के उप-प्रधानमंत्री टारो असो की बात सुनें, तो यह जापानियों की 'उच्च गुणवत्ता वाली जीवन शैली' के कारण संभव हुआ है। इस मामले में उनका कहना है कि 'जापान के लोग अन्य किसी भी देश की तुलना में ज्यादा बेहतर जीवन जीते हैं और ऐसा सांस्कृतिक रूप से बेहतर होने की वजह से है।'

बहुत से लोगों ने उप-प्रधानमंत्री टारो असो के इस बयान की यह कहते हुए आलोचना की है कि 'उनका यह बयान अपनी नस्ल को बाकियों से बेहतर समझने वाली सोच की वजह से आया और ये अंधराष्ट्रीयता की निशानी है।' लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि कई जापानी और कुछ वैज्ञानिक, सोचते हैं कि 'कुछ तो है जो जापान में अलग है'- जिसे कई बार 'एक्स-फैक्टर' कह दिया जाता है, जो कोविड-19 महामारी के दौर में भी वहां के लोगों को बचा गया। 

एक संभावना तो ये है कि जापानी समाज में गले मिलने या मिलने पर एक-दूसरे को चूमने जैसे रिवाज नहीं हैं, इसलिए लोगों में एक-दूसरे से काफी हद तक दूरी बनी रहती है। इसे फिजिकल डिस्टेन्सिंग कह सकते हैं या जिसे महामारी के दौर में सोशल डिस्टेन्सिंग का नाम दिया गया है और जापान में सामान्य तौर पर इसका पालन हो पाता है। हालांकि विशेषज्ञ इसे जापान में संक्रमण सीमित रहने का सही जवाब नहीं मानते। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
क्या जापानियों के पास स्पेशल इम्युनिटी है?

टोक्यो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर तात्सुहिको कोडामा जिन्होंने जापानी मरीजों पर अध्ययन किया है, उनका मानना है कि जापान में कोविड कुछ समय पहले से था। वे कहते हैं, 'कोविड-19 नहीं, पर उससे मिलता-जुलता कुछ और जिससे बहुत से जापानियों में इस महामारी से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता मौजूद थी।' 

पर क्या उन्होंने अपने मरीजों में ऐसा कुछ देखा? इसके जवाब में वे कहते हैं, 'कुछ नमूनों को देखकर हम हैरान थे। वैज्ञानिक नजरिए से कहा जाए तो इनसे पता चला कि ये लोग पहले कभी ना कभी कोविड से संक्रमित रहे हैं जो हालिया कोरोना वायरस से काफी मिलता-जुलता रहा होगा।' 

वे कहते हैं, 'इसकी काफी संभावना है कि जापान या इस क्षेत्र जैसे चीन, दक्षिण कोरिया, ताइवान, हॉन्गकॉन्ग और दक्षिण-पूर्व एशिया में पहले कभी सार्स जैसा कोई वायरल इन्फेक्शन फैला हो, जिसकी मृत्यु दर भी कम रही हो और उसे महामारी के तौर पर मान्यता ना मिल पाई हो।' हालांकि इस थ्योरी पर कुछ सवाल उठते हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
जैसे लंदन के किंग्स कॉलेज के डायरेक्टर प्रोफेसर केंजी शिबुया कहते हैं, 'ये कैसे हो सकता है कि कोई वायरल संक्रमण एशिया में फैले और वहीं तक सीमित रह जाए।' हालांकि प्रोफेसर केंजी इस बात से इनकार नहीं करते कि जापान में कोई खास बात तो है जो वहां संक्रमण इतना सीमित रहा, पर वे जापानियों में 'एक्स-फैक्टर' जैसी किसी भी बात से सहमत नहीं हैं। 

वे मानते हैं कि जिन देशों ने संक्रमण पर नियंत्रण किया है, वो ऐसा सिर्फ इसलिए कर पाए, क्योंकि वहां के लोगों ने कुछ चीजें गंभीरता से कीं। जापानी लोगों में चेहरे पर मास्क लगाने की आदत अब से करीब सौ वर्ष पहले से है यानी 1919 की फ्लू महामारी के समय से और उसके बाद से लोगों ने मास्क पहनना नहीं छोड़ा। जापानी समाज में यह मान्यता है कि किसी को अगर सर्दी-जुकाम हो जाए तो वो अपने आस-पास वालों को बचाने के लिए तुरंत मास्क पहनना शुरू कर दें। 

हॉन्गकॉन्ग यूनिवर्सिटी में पब्लिक हेल्थ स्कूल के डायरेक्टर केइजी फुकुडा कहते हैं, 'मास्क संक्रमण फैलने में काफी रुकावट पैदा करता है। साथ ही यह लोगों को संकेत भी देता है कि मास्क देखकर सतर्क रहें और आपके आसपास संक्रमण है, इसे मानें।' 1950 के दशक में जापान में टीबी फैलने की वजह से वहां एक बढ़िया सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था विकसित की गई थी, जिसके जरिए कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की जाती थी। यह भी किसी महामारी से लड़ने के लिए एक महत्वपूर्ण चीज है। 

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सामाजिक दूरी का पालन करती दो महिलाएं (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
जापान ने जल्द पहचाने तीन-सी

विशेषज्ञों का मानना है कि जापान ने बहुत जल्द ही इस महामारी के दो बेहद महत्वपूर्ण पैटर्न समझ लिए थे। क्योटो यूनिवर्सिटी में शोधकर्ता डॉक्टर कुजुआकी जिन्दाई के अनुसार, 'जापान में एक तिहाई से ज्यादा इन्फेक्शन एक जैसी जगहों से फैला। बहुत सारे लोग म्यूजिक पार्टी में संक्रमित हुए, जहां भीड़ थी और शोर भी। इनके बारे में जल्द से जल्द लोगों को बताया गया ताकि वे वहां ना जाएं।'

शोधकर्ताओं की एक टीम ने पता लगाया कि 'कम जगह वाले स्थानों पर, जहां भीड़भाड़ हो, सांस लेने में दिक्कत हो, लोग एक दूसरे से सटकर खड़े हों', वहां खतरा ज्यादा है। इसीलिए पार्टियों, जिम, बार, क्लब आदि को सबसे ज्यादा खतरे वाली जगहों की श्रेणी में रखा गया। साथ ही टीम ने यह भी पाया कि जिन्हें हल्का संक्रमण है, वो दूसरों को संक्रमित नहीं कर पा रहे।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
जापान में एक शुरुआती अध्ययन में पाया गया कि करीब 80 प्रतिशत ऐसे लोग, जो सार्स-कोविड-2 से संक्रमित हैं, वे दूसरों को संक्रमित नहीं कर पाएंगे जबकि 20 प्रतिशत ही लोग ऐसे पाए गए थे जिनमें भारी संक्रमण था। इसी के आधार पर जापान सरकार कोविड-19 की रोकथाम के लिए चलाए गए अपने राष्ट्रीय अभियान में नागरिकों को 'तीन-सी' से बचने का सुझाव दे पाई और वो थे:
 
  • बंद और खराब वेंटिलेशन वाली जगहों पर ना जाएं
  • भीड़भाड़ वाली जगहों से जितना हो सके बचें
  • बहुत करीब बैठकर बातचीत ना करें 
डॉक्टर जिन्दाई कहते हैं, 'लोग को बस घरों में बैठे रहने की सलाह देने की बजाय, लोगों को सूचित करने की रणनीति हमारे ज्यादा काम आई।' हालांकि मार्च के मध्य में एक बार को जापान के टोक्यो शहर में भी मामलों में तेज उछाल दर्ज किया गया था और ये काफी हद तक इटली के मिलान, यूके के लंदन और अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में आए उछाल जैसा ही था।' लेकिन फिर चीजें कैसे संभलीं, क्या जापान लकी रहा, क्या जापानी लोगों ने स्मार्ट तरीके अपनाए, इसके एक नहीं, कई जवाब हैं। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
सही समय का सवाल

प्रोफेसर केन्जी शिबुया का मानना है कि जापान से मिलने वाली सीख कहीं और से बहुत अलग नहीं है। वो कहते हैं कि यह उनके लिए समय को लेकर सबक सीखने की बात थी। प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने सात अप्रैल को गैर-बाध्यकारी आपात स्थिति लगाते हुए लोगों से अपील की कि अगर संभव हो तो घर पर ही रहें। 'अगर इस कदम को उठाने में देर की गई होती तो हमें भी न्यूयॉर्क या लंदन जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता था। अभी जापान में मृत्यु दर बहुत कम है।' 

प्रोफेसर केन्जी शिबुया कहते हैं, 'कोलंबिया यूनिवर्सिटी के हाल के अध्ययन में यह बात कही गई है कि अगर न्यूयॉर्क में दो हफ्ते पहले और लॉकडाउन लगा दिया जाता तो हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती थी।' संयुक्त राज्य के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन की हाल की रिपोर्ट में यह बात कही गई है कि हृदय संबंधी बीमारी, मोटापा और डायबिटीज वाले मरीजों की कोरोना के दूसरे मरीजों की तुलना में अस्पताल में भर्ती होने की संभावना छह गुना ज्यादा होती है। इनमें मृत्यु दर भी 12 गुना ज्यादा है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
जापान हृदय संबंधी बीमारी और मोटापा के मामले में दूसरे विकसित देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में है और यहां इसकी दर सबसे कम है। इसके बावजूद वैज्ञानिकों का मानना है कि इन बातों से सभी बातों का जवाब नहीं मिलता। प्रोफेसर फुकुडा का कहना है, 'इस तरह की शारीरिक दूरी से कुछ फर्क पड़ सकता है, लेकिन मैं समझता हूं दूसरे कारण ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। हमने कोविड से सीखा है कि कोई भी बात जो हमें दिखाई पड़ रही है, उसका कोई सामान्य विश्लेषण नहीं किया जा सकता है। किसी चीज के पीछे बहुत सारे कारक काम करते हैं।'  

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
सरकार ने कहा, लोगों ने सुना

अब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे की 'जापान मॉडल' वाली बात पर जाएं तो क्या उसमें सीखने के लिए भी कुछ सबक हैं? ये तथ्य है कि जापान ने संक्रमण को नियंत्रित किया है। वहां संक्रमण की दर बहुत कम है और इसी वजह से मृत्यु दर भी कम रही है। तो क्या इससे आगे का कोई रास्ता दिखाई देता है? इसका जवाब है - हां और नहीं। जापान में 'एक्स-फैक्टर' जैसी कोई चीज नहीं - वहां भी फॉर्मूला वही है कि संक्रमण की चेन को तोड़ना है, उसे बढ़ने नहीं देना। लेकिन एक बात विशेष जरूर है कि जापान के लोग वहां की सरकार पर विश्वास करते हैं और सरकार के निर्देशों का अनुपालन करते हैं। 

जापान की सरकार ने लोगों से घरों में खुद को कैद करने को नहीं भी कहा, सिर्फ कुछ परामर्श दिए और भीड़ में दूरी रखने को कहा, तो भी लोगों ने अपने स्तर पर अधिकांश सावधानी बरती। उन्होंने उन सभी बातों पर गौर किया, जो सरकार ने कहीं। प्रोफेसर शिबुया कहते हैं, 'ये जापान के लकी था और दुनिया को हैरान करने वाला। जापान में आंशिक या हल्का लॉकडाउन रहा, पर इसका असर एक कठोर लॉकडाउन से भी ज्यादा हुआ। सरकार को लोगों पर नियम-कायदे थोपने नहीं पड़े, लोगों ने स्वेच्छा से उनका पालन किया।' 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
जापान सरकार ने भी अन्य देशों की तरह लोगों से कहा कि वे मास्क पहनें, भीड़ में ना जाएं, दिन में कई बार हाथ धोएं - अंतर सिर्फ ये है कि जापान के अधिकांश लोगों ने इन निर्देशों का पालन किया। प्रोफेसर फुकुडा कहते हैं, 'अगर लोग साथ ना दें, तो कोई सरकार कुछ नहीं कर सकती। क्या किसी संक्रमित आदमी और स्वस्थ आदमी में संपर्क को रोका जा सकता है? लोगों के सतर्क हुए बिना तो बिल्कुल नहीं और जो जापान में हुआ, यह किसी अन्य देश में हूबहू होते देखना आसान नहीं।' 
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