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Coronavirus: क्या है 'होम आईसीयू', कोरोना में जिसकी बढ़ती जा रही है मांग

Mon, 13 Jul 2020 10:07 PM IST
सोनू शर्मा बीबीसी हिंदी
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
घनी आबादी वाले पश्चिमी दिल्ली के नजदीक एक परिवार अस्पताल के एक बेड की व्यवस्था करने के लिए जूझ रहा था। शुरुआती जून का वक्त था और भारत में आठ हफ्ते लंबे चले सख्त लॉकडाउन को हटाने का फैसला लिया गया था। साठ वर्षीय राज कुमार मेहता याद करते हैं, 'अनलॉक-1 हुए दो दिन हुए थे और हल्के लक्षणों के चलते मैंने अपना टेस्ट कराया। टेस्ट पॉजिटिव आया और हमने कोई अस्पताल ढूंढना शुरू किया जहां मुझे भर्ती कराया जा सके।' 

मेहता परिवार ने कई अस्पतालों में पता किया, लेकिन हर जगह से उन्हें निराशा हाथ लगी, 'क्योंकि सभी अस्पताल मरीजों से भरे पड़े थे और हर जगह भीड़ ही भीड़ थी।' लेकिन एक दोस्त के सुझाव ने उनके लिए उम्मीद जगाई। राज कुमार मेहता के बेटे मनीष ने फोन उठाया और उस कंपनी से संपर्क किया जो 'घर पर ही हॉस्पिटल बेड उपलब्ध कराने का वादा करती है, जिसके साथ ऑक्सीजन सपोर्ट और पूरी निगरानी की सुविधा भी दी जाती है।'  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कुछ घंटों में घर पहुंच जाता है 'होम आईसीयू' 

सहमति बनने और एडवांस पैसा देने के कुछ घंटों के अंदर ही मेहता परिवार के घर मेडिकल उपकरण पहुंचा दिए गए, जिनमें कार्डिएक मॉनिटर शामिल था, जिसके साथ ऑक्सीमीटर जुड़ा हुआ था, साथ में एक ऑक्सीजन सिलेंडर और एक पोर्टेबल वेंटिलेटर भी भेजा गया। इन सब उपकरणों के साथ एक प्रशिक्षित पैरामेडिक भी आईं। 

होम आइसोलेशन की सुविधा मुहैया कराने वाली एचडीयू हेल्थकेयर नाम की कंपनी चलाने वाले अंबरीश मिश्रा कहते हैं, 'हमने उन्हें पूरी प्रक्रिया समझाई और होम केयर फैसिलिटी में आने वाले खर्च और जरूरी लॉजिस्टिक के बारे में बताया और अगले दिन से राज कुमार मेहता हमारी देखरेख में थे। उन्हें अपने ही घर में आइसोलेशन में रखा गया था। उन्होंने बहुत अच्छे से रिकवर किया।' 

भारत में अबतक संक्रमण के साढ़े आठ लाख से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं और 23 हजार से ज्यादा मौतें हुई हैं। यहां कोविड-19 संक्रमितों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिसके साथ ही भारत कोरोना वायरस की वैश्विक सूची में अब तीसरे नंबर पर आ गया है। जून के आखिर में चेन्नई स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ मैथेमेटिकल साइंसेज के शोधकर्ताओं ने एक सांख्यिकीय विश्लेषण के आधार पर कहा था कि 'भारत में जुलाई के अंत तक या इससे पहले 10 लाख से ज्यादा सक्रिय मामले हो सकते हैं।' 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
अस्पतालों पर बढ़ता बोझ 

सरकार दावा करती है कि वो सभी प्रभावित लोगों को स्वास्थ्य सुविधा मुहैया करा रही है, लेकिन बिस्तरों की कमी की वजह से सैकड़ों लोगों को अस्पतालों से लौटाए जाने की खबरें आती रही हैं। अब अपने सामर्थ्य के हिसाब से लोग अन्य विकल्पों की तलाश कर रहे हैं, जैसे कुछ लोग अपने ही घर में प्राइवेट इलाज करा रहे हैं। लगातार बढ़ते मामलों और अस्पतालों पर पड़ते दबाव की वजह से ही शायद केंद्र सरकार ने ये निर्देश दिया है कि 'कोविड-19 के एसिम्पटोमैटिक और सिंप्टोमेटिक मरीजों को जल्द से जल्द क्वारंटीन किए जाने की जरूरत है।' 

सरकार ने अपने आइसोलेशन वार्ड बढ़ाने के लिए कई होटलों, स्पोर्ट्स स्टेडियम और यहां तक कि रेल सेवा को अपने नियंत्रण में ले लिया है, लेकिन जिन परिवारों में एक या एक से ज्यादा सदस्य पॉजिटिव हैं, वो होम फैसिलिटी के विकल्प पर विचार कर रहे हैं। कोरोना से ठीक हो चुके एक 56 वर्षीय मरीज की बेटी भारती सिंह कहती हैं, 'घर में ही आईसीयू सेट-अप लगाना एक अच्छा फैसला था, क्योंकि मैं अपने पिता के स्वास्थ्य पर नजर रख सकती थी। इसमें अस्पताल में जाने का रिस्क जुड़ा हुआ नहीं था।' 

उन्हें लगता है कि 'अस्पतालों के कोविड-19 वार्ड में सैकड़ों मरीज होते हैं, और सभी पर ध्यान देना होता है, सभी को वक्त देना होता है, ऐसे में संक्रमण बढ़ने का खतरा भी होता है।' 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pexels.com
मरीज के साथ रहती है एक नर्स 

अपने घर में इलाज के लिए मरीज के साथ एक नर्स रहती है, जो एक डॉक्टर की देखरेख में काम करती है। कोविड-19 के मरीजों के साथ रहने वाले पैरामेडिक या नर्सों का किसी नए मरीज के पास जाने से पहले और बाद में टेस्ट किया जाता है और उन्हें ये भी ध्यान रखना होता है कि मरीजों के परिवार वाले भी निर्धारित आइसोलेशन का पालन करें। 

कोविड केयर देने वाली एक प्राइवेट हेल्थकेयर कंपनी के साथ काम कर रही एक नर्स केऐ वोरसेमला कई मरीजों की देखभाल कर चुकी हैं। उन्हें लगता है कि ये काम वाकई में जिम्मेदारी वाला है, क्योंकि उस वक्त कमरे में मेडिकल प्रोफेशनल के तौर पर सिर्फ वो ही वहां होती हैं। 

वो कहती हैं, 'अस्पतालों में इमरजेंसी के दौरान हर तरह के मेडिकल उपकरण और डॉक्टर मौजूद रहते हैं, लेकिन घरों में डॉक्टर तो होते नहीं, इसलिए नर्स को इतना सक्षम होना होता है कि किसी भी आपात स्थिति को हैंडल कर लें। इस बात पर भी सही समय पर फैसला लें कि डॉक्टर को कब और कैसे अपडेट देनी है।' 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pexels.com
नर्स और पैरामेडिक एक विशेषज्ञ डॉक्टर को जानकारी देते रहते हैं कि मरीज को कितनी ऑक्सीजन दी गई है, मरीज के शरीर का तापमान और अन्य लक्षण कैसे हैं। एक हेल्थ केयर प्रोवाइडर के लिए काम कर रहे विशेषज्ञ डॉक्टर दीक्षित ठाकुर मानते हैं कि, 'सबसे अहम है कि डॉक्टर का सही वक्त पर कॉल लेना।' 

वो कहते हैं, 'अब तक हमारे पास कोविड-19 का कोई प्रमाणिक इलाज नहीं है, लेकिन जो सपोर्टिव थेरेपी हम अस्पतालों में दे रहे हैं, वही घरों पर भी मुहैया करा रहे हैं। सबसे अहम ये है कि डॉक्टर जरूरत पड़ने पर सही वक्त पर मरीज को अस्पताल के प्रोपर आईसीयू में शिफ्ट करने का कॉल ले।' 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pexels.com
होम आईसीयू की कीमत 

जाहिर है घर में मिलने वाली सुविधा की एक कीमत भी है। इस मिनी आईसीयू जैसे सेट-अप के लिए 10 हजार से लेकर 15 हजार प्रतिदिन का किराया देना पड़ता है। ज्यादातर लोगों के लिए ये महंगा सौदा है, लेकिन फिर भी मांग बढ़ रही है। घर में क्रिटिकल केयर की सुविधा मुहैया कराने के कारोबार में 'एचडीयू हेल्थकेयर' या 'हेल्थकेयर एट होम' बड़े नाम रहे हैं, लेकिन कोविड-19 से पहले इस सुविधा की मांग इतनी ज्यादा कभी नहीं रही। कीमत और एडवांस पैसे की पूछताछ को लेकर आ रहे फोन कॉल के बीच अंबरीश ने मुझे बताया, 'हर दिन पांच परिवार हमारे साथ जुड़े रहे हैं, यानी 20 से 25 मरीज।'
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pexels.com
भारत के बड़े शहरों में मल्टी-स्पेशियलिटी हॉस्पिटल की चेन रेसिडेंट वेल्फेयर एसोसिएशन और ग्रूप हाउसिंग सोसाइटी के साथ मिलकर वहां 'होम आइसोलेशन सेंटर' सेट-अप कर रही हैं। दिल्ली जैसी कई राज्य सरकारें बिना लक्षणों वाले या हल्के लक्षणों वाले कोविड मरीजों को घर में ही आइसोलेशन में रहने की सलाह दे रही हैं। उनके घरों में मुफ्त में ऑक्सीमीटर पहुंचाए जा रहे हैं, ताकि वो अपने ऑक्सीजन लेवल को खुद माप सकें।

सलाह दी गई है कि वो तभी अस्पताल जाएं अगर उन्हें सांस लेने में दिक्कत या अन्य कॉम्प्लिकेशन हों। कुछ वक्त पहले तक भारत की 'कोरोना राजधानी' कही जा रही मुंबई भी अस्पताल की भीड़ से जूझ रही थी। फिर सरकार ने होटलों और स्टेडियम में मेक शिफ्ट कोविड सेंटर बना दिए। रिहायशी अपार्टमेंट में बने वार्ड इस बीच इस शहर के घनी आबादी वाले इलाकों में कई रिहायशी अपार्टमेंट्स ने अपने क्लब हाउस या ढंके हुए प्ले एरिया को आइसोलेशन जोन में बदलने का फैसला किया। इसके लिए उन्हें ना सिर्फ बड़ी हेल्थ केयर कंपनियों बल्कि कई वरिष्ठ डॉक्टरों से भी सहयोग मिला। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
एक अपार्टमेंट में रहने वाले डॉक्टर और रेडियोलॉजिस्ट विवेक देसाई को 'हेल्थ केयर एट होम' से भी सहयोग मिला। वो कहते हैं, 'हमारे पास और कोई विकल्प नहीं था, क्योंकि मरीजों को अस्पतालों में बेड नहीं मिल रहे थे और इस तरह की घटनाएं मुंबई में बढ़ती जा रही थीं। हमने अपार्टमेंट में एक सैनेटाइज्ड एरिया को चुना, जहां आठ-दस मरीज रह सकते थे और वहां उन्हें आइसोलेट करना शुरू किया।' लेकिन कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि कोई मरीज भले ही अपने घर में हों या किसी प्राइवेट अपार्टमेंट बिल्डिंग के वार्ड में, ये रिस्की हो सकता है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
लेकिन खतरा भी है 

ज्यादातर को लगता है कि कोविड-19 मरीजों के ऑक्सीजन लेवल में अचानक और बहुत ज्यादा कमी आ सकती है। ऐसे में वहां एक विशेषज्ञ डॉक्टर और पूरी तरह से फंक्शनल इंटेंसिव केयर यूनिट होना जरूरी है, जिसके साथ एडवांस वेंटिलेटर भी हों। 

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के डॉ संदीप शर्मा कहते हैं, 'अगर कोई कहता है कि मैंने एक सामुदायिक केंद्र या एक जिमखाना को एक मेडिकल सेंटर या कोविड केयर सेंटर या आईसीयू में बदल दिया है, तो उसमें एक ही समस्या है कि वहां उसे मॉनिटर करने के लिए मेडिकल विशेषज्ञ नहीं हैं। अगर वहां 10 मरीज हैं और कुछ हो जाता है तो कौन जिम्मेदार होगा।' 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Facebook/Max Healthcare
दिल्ली के मैक्स अस्पताल में कोविड-19 मरीजों का इलाज कर रहे विशेषज्ञ डॉक्टर मनोज सिन्हा कहते हैं, 'किसी को अस्पताल में भर्ती कराना एक मुश्किल फैसला होता है, क्योंकि इसके साथ एक सोशल स्टिग्मा जुड़ा होता है। लेकिन अगर किसी को मेडिकल हस्तक्षेप और देखरेख की जरूरत है तो अस्पताल के आईसीयू का कोई विकल्प नहीं हो सकता।'

आर्थिक रूप से सक्षम ऐसे लोगों की तादाद बढ़ रही है, जो घरों में मिनी आईसीयू चाहते हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों के पास ये विकल्प है ही नहीं और उन सभी को सरकारी या फिर निजी अस्पतालों में अपना नंबर आने का ज्यादा इंतजार रहता है। लेकिन देशभर के इन तमाम अस्पतालों में से कुछ बेड, कर्मचारियों और उपकरणों की कमी से जूझ रहे हैं। लेकिन उन 'कुछ' लोगों के सामने ये स्थिति नहीं है, जो अपने खुद के घर में किसी को ठीक होते देख रहे हैं। जैसा कि भारती सिंह कहती हैं, 'मैं इसे किसी और तरीके से नहीं कर सकती थी।' 
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