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Coronavirus test: कोरोना का टेस्ट कराने से क्या दिमाग पर असर पड़ता है? जानिए पूरी सच्चाई

Sun, 19 Jul 2020 10:19 AM IST
सोनू शर्मा बीबीसी हिंदी
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कोरोना वायरस का टेस्ट कराती एक महिला (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : PTI
बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस टेस्टिंग से जुड़ी एक तस्वीर वायरल हो रही है। इस तस्वीर में दावा किया जा रहा है कि कोरोना वायरस की टेस्टिंग के लिए जो स्वॉब स्टिक नाक के अंदर डाली जा रही है, वह 'ब्लड ब्रेन बैरियर' पर जाकर सैंपल ले रही है। इस जैसे कई अन्य दावों की पड़ताल की गई है। स्वॉब स्टिक के ब्लड ब्रेन बैरियर तक पहुंचने का दावा पूरी तरह गलत साबित हुआ। ये सोचना पूरी तरह गलत है कि आप अपनी नाक में एक स्वॉब स्टिक (रुई का फाहा) डालकर 'ब्लड ब्रेन बैरियर' तक पहुंच सकते हैं। ये दावा करना भी ब्लड ब्रेन बैरियर के प्रति कम समझ को दर्शाता है। 
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एक शख्स के स्वैब का नमूना एकत्र करती महिला स्वास्थ्य कर्मी (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : PTI
दिमाग सुरक्षित रहता है

दरअसल, दिमाग के आसपास इसकी सुरक्षा के लिए कई स्तर की व्यवस्था होती है। सबसे पहले दिमाग खोपड़ी में सुरक्षित रहता है। इसके बाद दिमाग तरल पदार्थ और झिल्लियों में कैद रहता है। दिमाग के आसपास बह रही खून की धमनियों में ब्लड ब्रेन बैरियर मौजूद होता है। यह कई परतों वाली कोशिकाओं से बना होता है। इसका काम खून में मौजूद अणुओं को दिमाग में पहुंचने से रोकना और ऑक्सीजन समेत अन्य पोषक तत्वों को जाने देना है। ऐसे में अगर स्वॉब स्टिक को नाक के अंदर डालकर ब्लड ब्रेन बैरियर तक पहुंचना है तो उसे कई परतों के उत्तकों में छेद करते हुए एक हड्डी में छेद करके, खून की नसों में पहुंचना होगा। तब जाकर आप ब्रेन ब्लड बैरियर तक पहुंच पाएंगे।
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कोरोना का टेस्ट कराती एक महिला (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : PTI
ब्रिटिश न्यूरोसाइंस एसोसिएशन से जुड़ी डॉक्टर लिज कॉल्टहार्ड कहती हैं, 'जब तक नाक में स्वॉब डालते हुए उतना दबाव न लगाया जाए कि उत्तकों और हड्डी की कई परतें टूट जाएं, तब तक स्वॉब ब्लड ब्रेन बैरियर तक नहीं पहुंच सकता है। हमने अपनी न्यूरोलॉजी प्रेक्टिस के दौरान कोविड स्वॉब से किसी तरह की समस्या नहीं देखी हैं।' 

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बच्चे का कोरोना टेस्ट करती महिला स्वास्थ्यकर्मी (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : PTI
दरअसल, 'नेजोफेरेंजियल स्वॉब' कोरोना वायरस की टेस्टिंग के लिए नाक की पिछली दीवार के नमूने लेता है। ये कई स्वॉब सैंपल तकनीकों में से एक है। ब्रिटेन समेत कई देशों में कोविड-19 की जांच करने के लिए नाक और गले का स्वॉब सैंपल नियमित रूप से लिया जा रहा है। लिवरपूल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन से जुड़े टॉम विंगफील्ड कहते हैं, 'मैंने अस्पताल में काम करते हुए कई मरीजों का स्वॉब सैंपल लिया है और हर हफ्ते एक ट्रायल के लिए अपना स्वॉब सैंपल भी लेता हूं। नाक में किसी भी चीज का इतना अंदर जाना थोड़ा अजीब है। स्वॉब सैंपल लिए जाते समय थोड़ी खुजली या गुदगुदाहट हो सकती है लेकिन दर्द नहीं होना चाहिए।' 

ये झूठे दावे बीती छह जुलाई को कुछ अमेरिकी फेसबुक अकाउंट्स से शुरू हुए थे। कुछ दावों में इस बात का भी जिक्र है टेस्टिंग से इनकार करने से जुड़े कई कॉल भी आ रहे हैं। इनमें से कुछ दावों को फैक्ट चेक करने वाली संस्थाओं ने झूठा बताया है। ये भी देखा गया कि कि यही ग्राफिक रोमेनियन, फ्रेंच, डच और पुर्तगाली फेसबुक यूजर्स के अकाउंट पर भी शेयर हो रहे हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
टेस्टिंग किट से नहीं फैलता कोरोना वायरस

खराब टेस्टिंग किट की कुछ रिपोर्ट्स को भी गलत तरीक से पेश कर बताने की कोशिश की गई कि इनसे टेस्ट कराने से कोरोना वायरस से संक्रमित होने का खतरा है। एक खबर की हेडलाइन में ये बताया गया था महामारी के शुरुआती दौर में यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के लैब में टेस्ट के दौरान अपनाए गए गलत तरीकों के कारण टेस्ट सही तरीके से नहीं हो पाए थे। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि ये टेस्ट करवाने वाले लोग इससे संक्रमित हो सकते हैं।
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जांच के लिए नमूना लेता स्वास्थ्यकर्मी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
फेसबुक पर फॉक्स न्यूज के होस्ट टकर कार्लसन के फैनपेज पर एक खबर शेयर की गई जिसके साथ लिखा गया - 'आपको कोविड-19 चाहिए, आपको ऐसे मिलेगा!' इस पोस्ट को 3,000 से ज्यादा बार शेयर किया गया। अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट की ये पूरी खबर जून में छपी थी। इसमें लिखा गया था कि एक जांच में पता चला है कि किट की गड़बड़ियों और लैब के नियमों के कारण सीडीसी टेस्टिंग प्रोग्राम में देरी हुई। रिपोर्ट में ऐसा नहीं लिखा था कि वायरस खराब किट के कारण फैला है। 

खबर 'पे वॉल' आधारित थी यानी इसे पढ़ने के लिए पैसे देने पड़ते हैं। जाहिर है कि ज्यातादर लोग जिन्होंने ये पोस्ट देखा था, उन्होंने पूरी खबर नहीं पढ़ी होगी और हेडलाइन पढ़कर गलत मतलब निकाल लिया होगा। अमेरिका और भारत के फैक्ट चेकर्स ने उस दावे को भी खारिज किया है, जिसमें कहा गया था कि कोरोनावायरस टेस्ट गेट्स फाउंडेशन की एक साजिश के तहत किए जा रहा हैं और टेस्ट के बहाने मरीजों के शरीर में माइक्रोचिप लगाए जा रहे हैं। ऐसा कोई भी सबूत नहीं है जो इस दावे को प्रमाणित कर सके। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
स्वॉब पर सिर्फ सांस क्यों नहीं ले सकते?

सोशल मीडिया पर एक मीम शेयर किया जा रहा है जिसमें लिखा है-अगर कोविड सच में सिर्फ सांस से फैल रहा है तो स्वॉब पर सिर्फ सांस छोड़ना ही काफी क्यों नहीं हैं? स्वॉब को आपके नाक के बिल्कुल अंदर तक डालने की क्या जरूरत है। इस पोस्ट ने फेसबुक और इंस्टाग्राम पर 7,000 से ज्यादा लोगों को इंगेज किया। 

कोरोना वायरस किसी संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने से फैलता है। मुंह से निकलने वाले सूक्ष्म कणों के साथ वायरस हवा में फैलता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सिर्फ स्वॉब पर सांस छोड़ देने से लैब में टेस्ट के लिए पर्याप्त मटेरियल मिल जाएंगे। इंग्लैंड के पब्लिक स्वास्थ्य विभाग ने बताया कि नाक या गले के अंदर से लिए गए सैंपल से नतीजे बेहतर आते हैं। अगर आप स्वॉब में हल्की सांस लेते हैं तो मुमकिन है कि वायरल कण या वायरस पकड़ में न आए। अगर स्वॉब को नाक या गले के अंदर डाला जाए तो नतीजे बेहतर होंगे। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
बांग्लादेश का वायरस फ्री सर्टिफिकेट

हमने बांग्लादेश के उस सर्टिफिकेट की भी जांच कि जो किसी व्यक्ति के संक्रमित न होने का प्रमाण दे रहा था। कई लोगों को जाली दस्तावेज जारी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। ये दस्तावेज उन लोगों को निगेटिव बता रहे थे जिनका कभी टेस्ट ही नहीं हुआ। इन दस्तावेजों के महत्व भी है, क्योंकि प्रवासी मजदूरों से वायरस-फ्री होने का सर्टिफिकेट दिखाने को कहा जाता है। बांग्लादेश में कई परिवारों के घर देश के बाहर काम कर रहे लोगों की आमदनी से चलते हैं। 

हाल ही में भारतीय सीमा के पास चली नौ दिनों की खोजबीन के बाद एक अस्पताल के मालिक को पकड़ा गया। आरोप है कि उसने कई लोगों की फर्जी रिपोर्ट बनाई थी। वो शख्स एक महिला के वेश में घूम रहा था। क्रिमिनल गैंग भावी ग्राहकों की तलाश में इंटरनेट पर विज्ञापन भी डाल रहे हैं। हैरानी की बात ये है कि बांग्लादेश में कई फेक पॉजिटिव सर्टिफिकेट भी बेचे जा रहे है, खासकर सरकारी अधिकारियों के लिए ताकि वो अपने दफ्तरों से छुट्टी ले सकें। 
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