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Coronavirus: क्या है कम्युनिटी ट्रांसमिशन और हर्ड इम्यूनिटी? कोरोना से बचने के लिए ये जानना है जरूरी

Mon, 20 Jul 2020 03:11 PM IST
सोनू शर्मा बीबीसी हिंदी
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दुनिया में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर डेढ़ करोड़ के पास पहुंच रही है, भारत में आंकड़ा 10 लाख से ऊपर जा चुका है। दुनियाभर में मरने वालों की संख्या छह लाख से ज्यादा हो चुकी है, भारत में मृतकों की संख्या 26,000 से ज्यादा है। वैक्सीन निकालने की कोशिशें हो रही हैं, मगर इसी सबके बीच कम्युनिटी ट्रांसमिशन और हर्ड इम्यूनिटी के सवाल सामने आने लगे हैं। हालांकि भारत सरकार और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के मुताबिक भारत में अभी तक कम्युनिटी ट्रांसमिशन की स्थिति नहीं आई है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कम्युनिटी ट्रांसमिशन क्या है?
  • कम्युनिटी ट्रांसमिशन तब होता है जब कोई व्यक्ति किसी ज्ञात संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए बिना या वायरस से संक्रमित देश की यात्रा किए बिना ही इसका शिकार हो जाता है। यह संक्रमण का तीसरा स्तर होता है। इस स्तर के बाद बड़े पैमाने पर संक्रमण के फैलने की आशंका रहती है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कैसे होता है कम्युनिटी ट्रांसमिशन?

आईसीएमआर के अनुसार कोरोना वायरस फैलने के चार चरण हैं। 
  • पहले चरण में वे लोग कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए जो दूसरे देश से संक्रमित होकर भारत में आए। यह स्टेज भारत पार कर चुका है, क्योंकि ऐसे लोगों से भारत में स्थानीय स्तर पर संक्रमण फैल चुका है। 
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  • दूसरे चरण में स्थानीय स्तर पर संक्रमण फैलता है, लेकिन ये वे लोग होते हैं जो किसी ना किसी ऐसे संक्रमित शख्स के संपर्क में आए जो विदेश यात्रा करके लौटे थे। 
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  • तीसरा चरण कम्युनिटी ट्रांसमिशन का होता है। इसमें ट्रांसमिशन के स्रोत का पता चलना मुश्किल होता है। 
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  • किसी महामारी का चौथा चरण भी होता है, जब संक्रमण स्थानीय स्तर पर महामारी का रूप ले लेता है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
हर्ड इम्यूनिटी क्या है?

अगर कोई बीमारी आबादी के बड़े हिस्से में फैल जाती है और इंसान की रोग प्रतिरोधक क्षमता उस बीमारी के संक्रमण को बढ़ने से रोकने में मदद करती है तो जो लोग बीमारी से लड़कर पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, वो उस बीमारी से 'इम्यून' हो जाते हैं, यानी उनमें प्रतिरक्षात्मक गुण विकसित हो जाते हैं। उनमें वायरस का मुकाबला करने को लेकर सक्षम एंटी-बॉडीज तैयार हो जाता है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कैसे होता है हर्ड इम्यूनिटी?

जैसे-जैसे ज्यादा लोग इम्यून होते जाते हैं, वैसे-वैसे संक्रमण फैलने का खतरा कम होता जाता है। इससे उन लोगों को भी परोक्ष रूप से सुरक्षा मिल जाती है जो ना तो संक्रमित हुए और ना ही उस बीमारी के लिए 'इम्यून' हैं। अमेरिकी हार्ट एसोसिएशन के चीफ मेडिकल अफसर डॉक्टर एडुआर्डो सांचेज ने अपने ब्लॉग में इसे समझाने की कोशिश की है। 

वे लिखते हैं, 'इंसानों के किसी झुंड (अंग्रेजी में हर्ड) के ज्यादातर लोग अगर वायरस से इम्यून हो जाएं तो झुंड के बीच मौजूद अन्य लोगों तक वायरस का पहुंचना बहुत मुश्किल होता है और एक सीमा के बाद इसका फैलाव रुक जाता है, मगर इस प्रक्रिया में समय लगता है। साथ ही 'हर्ड इम्यूनिटी' के आइडिया पर बात अमूमन तब होती है जब किसी टीकाकरण प्रोग्राम की मदद से अतिसंवेदनशील लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित कर ली जाती है।' 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
एक अनुमान के अनुसार किसी समुदाय में कोविड-19 के खिलाफ 'हर्ड इम्यूनिटी' तभी विकसित हो सकती है, जब तकरीबन 60 फीसदी आबादी को कोरोना वायरस संक्रमित कर चुका हो और वे उससे लड़कर इम्युन हो गए हों। लेकिन जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के मुताबिक, हर्ड इम्यूनिटी के स्तर तक पहुंचने के लिए करीब 80 फीसदी आबादी के इम्युन होने की जरूरत होती है। हर पांच में से चार लोग अगर संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने के बाद भी संक्रमित नहीं होते हैं तब संक्रमण पर नियंत्रण रखा जा सकता है। हालांकि ये इस पर भी निर्भर करता है कि बीमारी कितनी संक्रामक है। आम तौर पर 70 से 90 फीसदी आबादी का इम्यून होना जरूरी होता है हर्ड इम्यूनिटी के स्तर तक पहुंचने के लिए।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI
खसरा, गलगंड, पोलियो और चिकन पॉक्स कुछ ऐसी संक्रामक बीमारियां हैं जो कभी बहुत आम हुआ करती थीं, लेकिन अब अमेरिका जैसी जगह पर दुर्लभ हैं, क्योंकि वैक्सीन की मदद से हर्ड इम्यूनिटी के स्तर तक पहुंचने में वहां मदद मिली और पहुंच पाए। अगर कोई ऐसी संक्रामक बीमारी है जिसका वैक्सीन तैयार नहीं हुआ है, लेकिन व्यस्कों में उस संक्रमण को लेकर पहले से इम्यूनिटी मौजूद है तब भी ये बच्चों या फिर कमजोर इम्युन सिस्टम वाले लोगों को संक्रमित कर सकता है। 

ऊपर जिन बीमारियों का जिक्र किया गया है, उनमें से कई बीमारियों के मामले में वैक्सीन बनने से पहले यह देखा जा चुका है। कुछ दूसरे वायरस जैसे फ्लू के वायरस में समय के साथ बदलाव होता रहता है, इसलिए पुराने एंटी-बॉडी जो इंसान के शरीर में तैयार हुए होते हैं वो काम नहीं आते हैं और फिर से इंसान संक्रमित हो जाता है। फ्लू के मामले में यह बदलाव एक साल से भी कम समय में हो जाता है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अगर कोविड-19 के लिए जिम्मेदार सार्स-कोवी-2 दूसरे कोरोना वायरस की तरह ही है तो फिर हम इससे इम्युन होने वाले लोगों के कुछ महीने या साल तक संक्रमित नहीं होने की तो उम्मीद कर सकते हैं, लेकिन पूरी जिंदगी के लिए नहीं। 
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