प्रतीकात्मक तस्वीर
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महिलाओं में बनती हैं खास एंटीबॉडी
इस संबंध में मैक्स अस्पताल में ब्लड बैंक की प्रमुख डॉक्टर संगीता पाठक कहती हैं कि भले ही प्लाज्मा के लिए भी खून निकाला जाता है, लेकिन दोनों प्रक्रियाओं में अंतर है। प्लाज्मा थेरपी के लिए जब खून लिया जाता है तो उसमें से प्लाज्मा निकालकर खून को वापस शरीर में डाल दिया जाता है।
वो कहती हैं, 'इसलिए इन दोनों ही डोनेशन के नियमों में भी अंतर है। गर्भवती महिलाएं इसलिए प्लाज्मा नहीं दे सकतीं, क्योंकि इससे कोविड-19 के मरीज के फेफड़ों को नुकसान पहुंच सकता है। उसे ट्रांस्फ्यूजन रिलेटेड एक्यूट लंग इंजरी (टीआरएएलआई) हो सकती है। महिलाओं में गर्भधारण के बाद भ्रूण में मौजूद पिता के अंश के खिलाफ एंटीबॉडी बनती हैं, क्योंकि वो उसे एक बाहरी तत्व मानती हैं। इन एंटीबॉडी को ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन (एचएलए) कहा जाता है। महिला के जितने ज्यादा बच्चे होंगे उसके शरीर में उतनी ज्यादा एंटीबॉडी होंगी।'
'ये ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन महिला की रोग प्रतिरोधक क्षमता का हिस्सा है जो शरीर को ये पहचानने में मदद करता है कि शरीर में आया तत्व बाहर का है या शरीर का अपना। गर्भधारण में ऐसा होना सामान्य बात है। उसका भ्रूण और मां पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता, लेकिन जब ये दूसरे शरीर में जाती हैं तो नुकसान पहुंचा देती हैं। जब एचएलए एंटीबॉडी प्लाज्मा के जरिए किसी के शरीर में पहुंचती है तो वो फेफड़ों की लाइनिंग में मौजूद श्वेत रक्त कोशिकाओं (व्हाइट ब्लड सेल्स) के साथ प्रतिक्रिया करती है। इससे फेफड़ों में इंजरी हो जाती है, सामान्य भाषा में फेफड़ों में तरल पदार्थ भर जाता है। इससे मरीज को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है।'