यही वो निर्माणाधीन इमारत है, जहां 1857 में अंग्रेजों ने दीवान गंजन सिंह और उनके साथियों को फांसी के फंदे पर चढ़ाया था।
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इतिहास के इस घटनाक्रम के मुताबिक सागर में अंग्रेजों की 42वीं देशी पलटन ने 1 जुलाई सन् 1857 को विद्रोह का बिगुल फूंका, जिसमें जबलपुर की 52वीं देशी पलटन ने उनका साथ दिया। 18 जुलाई को इन दोनों पलटनों ने सागर और दमोह जिलों के करीब तीन सौ छोटे-बड़े जागीरदारों व मालगुजारों के साथ मिलकर शाहगढ़ के राजा बखतबली शाह के नेतृत्व में स्वाधीनता के लिए जंग छेड़ दी।
राजा बखतबली शाह के सेनापति बोधन दऊआ ने रण कौशल का परिचय देते हुए अंग्रेजी हुकूमत से रहली, गढ़ाकोटा व गौरझामर रियासतों को जीतने के बाद 15 अगस्त को देवरी किले पर भी अपना अधिपत्य कर लिया। अंग्रेजों की सेना से बगावत कर इस संग्राम में हिस्सा लेने वाले सूबेदार चौधरी ढुलके सिंह, आशाजीत कुर्मी और दुर्जन सिंह दांगी को किले की जिम्मेदारी सौंपी गई।
करीब एक साल बाद विभिन्न कारणों से क्रांति कमजोर पड़ गई और अंग्रेजों ने हजारों स्वतंत्रता सेनानियों को मौत के घाट उतार दिया। हालांकि बोधन दऊआ और चौधरी ढुलके सिंह अपने कुछ क्रांतिकारी साथियों के साथ बच निकले और उन्होंने आगे भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत जारी रखी।
छापामार युद्ध में पारंगत देवरी के एक और सूरमा दीवान गंजन सिंह गौंड भी अंग्रेजों के लिए ‘आंख की किरकिरी’ बने हुए थे। डॉ. राजेन्द्र कुमार पटेल अपनी किताब ‘नरसिंहपुर जिले में 1857 का विद्रोह तथा स्वाधीनता आंदोलन (1857ई-1945ई तक)’ में लिखते हैं कि अंग्रेजी सेना की एक टुकड़ी ने 23 नवम्बर 1857 को देवरी के पास दीवान गंजन सिंह गौंड के गढ़ सिंगपुर पर हमला कर दिया।
अचानक हुए हमले के बाद दीवान गंजन सिंह अपने करीब दो सौ साथियों के साथ गन्ने के खेत में छिपकर अंग्रेज सेना का मुकाबला करने लगे। स्वतंत्रता सेनानियों का पलड़ा भारी होता देख अंग्रेजी सेना ने खेत में आग लगा दी। इस अग्निकांड में दीवान गंजन सिंह को अपने बहुत से साथियों को खोना पड़ा और अंततः उन्हें 42 साथियों सहित अंग्रेजों ने हिरासत में ले लिया।
अपनी औलादों को स्वतंत्रता का सुख देने के लिए देवरी क्षेत्र के गांव सिंगपुर निवासी दीवान गंजन सिंह गौंड, डोभी निवासी चौधरी ढुलके सिंह, डुंगरिया से आशाजीत कुर्मी, सहजपुर के राजा बहादुर तिवारी, बलभूर सिंह, डोंगरसलैया निवासी दुर्जन सिंह व चैनसिंह बंदरिया वालों सहित हमारे करीब 62 पुरखों को अंग्रेजों ने आम के पेड़ से (फंसया आम, वर्तमान जनपद पंचायत कार्यालय देवरी) फांसी के फंदों पर लटका दिया था। इतिहास की इसी श्रृंखला में तत्कालीन रियासत मढ़पिपरिया के रियासतदार सुल्तान सिंह लोधी को भी अंग्रेजों ने उनके करीबन 70 साथियों के साथ तीतरपानी में पीपल के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी थी.
इन शहीदों की गौरवगाथा इतिहास में दर्ज न हो पाना तो दु:खद है ही, लेकिन अब तक इन शहीदों को पहचान न मिलना हमारे लिए दुर्भाग्य और शर्म की बात है. इतिहासकार डॉ. एसएम पचौरी कहते हैं 1857 की क्रांति में देवरी सहित सम्पूर्ण बुंदेलखंड के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का योगदान अविस्मरणीय है। इन शहीदों का गौरवशाली इतिहास जन-जन तक पहुंचना जरूरी है और इसके लिए हर स्तर पर प्रयास भी किए जाने चाहिए।
क्षेत्रिय सांसद एवं तत्कालीन संस्कृति व पर्यटन मंत्री प्रहलाद पटेल इतिहास के इस स्वर्णिम अध्याय को याद करते हुए फंसया आम और उस पर लटकाए गए शहीदों का उल्लेख संसद में भी कर चुके हैं. हालांकि देश के इन सपूतों की गौरव गाथा से लोग अब तक जरूर अपरिचित हैं, लेकिन शहीदों को समर्पित एक स्मारक अब देवरी में आकार लेने लगा है।