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उर्दू शायरी को नया लबो-लहजा देता शायर विपुल कुमार

Thu, 21 Sep 2017 08:06 AM IST
अकरम रज़ा हिंदी, नई दिल्ली
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विपुल कुमार
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'वक़्त की ताक़ पे दोनों की सजाई हुई रात 
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किस पे ख़र्ची है बता मेरी कमाई हुई रात 

और फिर यूं हुआ आंखों ने लहु बरसाया 
याद आई कोई बारिश में बिताई हुई रात' 

इन अश्आर को क़लमबंद करने वाले नौजवान शायर विपुल कुमार मुशायरों की दुनिया में रफ़्ता-रफ़्ता अपनी पहचान बना रहे हैं। शोर-शराबे से इतर मुशायरों में वो बहुत संजीदगी से अपना कलाम पेश करते हैं। उर्दू विपुल की मातृ भाषा नहीं है, लेकिन उनके शेर कहने और गुफ़्तगू करने के अंदाज़ में उर्दू की लज़्ज़त ऐसी है कि वो माहिरे उर्दू जान पड़ते हैं। 24 साल के विपुल पूरी तरह खुद को मुशायरों से वाबस्ता नहीं रखते, इसके अलावा वो एक ऑनलाइन कंपनी में प्रॉडक्ट मैनेजर हैं। बावजूद इसके वो शायरी और प्रोफ़ेशनल लाइफ़ में एक बेहतर तालमेल बनाए रखते हैं। अमर उजाला काव्य के साथ बातचीत में विपुल कुमार ने उर्दू शायरी से नज़दीक आने के बारे बताया। वो कहते हैं, "मेरी शायरी का सफ़र क़रीब 7 साल से जारी है। इनमें तीन-चार साल मैंने कविताएं और बिना बहर की ग़ज़लें कहीं, जो शायरी की बारीकियों के मुताबिक़ सही नहीं थीं। हालांकि, उसके बाद कुछ अच्छे लोग मिले जिन्होंने मुझे उर्दू पढ़ना-लिखना और ग़ज़ल की बारीकियां सिखाईं।"
 
सोशल मीडिया किसी की ज़िंदगी में कितना अहम रोल अदा कर सकता है इसकी एक मिसाल विपुल ख़ुद हैं। राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले के रहने वाले विपुल की ग़ज़ल की पहली बार इस्लाह (सुधार) फ़ेसुबक पर एक अंजान शख़्स ने की थी, हालांकि आज वो शख़्स उनके दोस्त है। विपुल मानते हैं कि यहीं से उनके अंदर एक शायर ने सांस लेना शुरू किया। वो बताते हैं, "जहां तक मुझे याद है यह क़रीब चार साल पहले की बात है। फ़ेसबुक पर तरही मुशायरे वग़ैरह हुआ करते थे। जिगर मुरादाबादी साहब का एक मिसरा था उसपर मैंने एक ग़ज़ल कही थी। उसका एक शेर था 'जो चमन में अब के खिला नहीं वो मेरी हसरतों का गुलाब था, मेरा फसले गुल से हिसाब है मेरा क़र्ज़ है यह बहार पर।' दिल्ली में एक पराग अग्रवाल हैं जो अब दोस्त हैं, उन्होंने मुझे मैसेज करके बताया कि इस ग़ज़ल में थोड़ी-थोड़ी चीज़ें ग़लत हैं लेकिन शेर बहुत अच्छे हैं। यहां दिल्ली आ जाओ और हम लोगों से मिलो। 
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मैं समझता हूं कि वहां से इस सफ़र का आगाज़ हुआ। तब मुझे पता चला कि और लोग किस तरह शायरी कर रहे हैं। ख़ासकर दिल्ली में जो अदबी हल्क़े हैं वो किस तरह उम्दा शायरी कर रहे हैं। मैं हनुमानगढ़ से हूं। मैं वहां किसी ऐसे शख़्स को नहीं जानता जिसे उर्दू आती हो। लिखना पढ़ना तो दूर की बात। ग़ज़लें सुनते भी बहुत कम लोग देखें हैं। वहां से तरबीयत इस तरह की नहीं हुई कि ग़ज़ल कही और पढ़ी जाए। शेर-ओ-शायरी से मोहब्बत ख़ास तौर पर मौसीक़ी (संगीत) से शुरू हुई। जगजीत सिंह, गु़लाम अली और मेहंदी हसन को सुनना मुझे काफ़ी पसंद था। इनको सुनते हुए मेरे ज़हन में ख़्याल आता कि यह ग़ज़लें कितनी ख़ूबसूरती से लिखी गई हैं, इन्हें लिखता कौन होगा?" 

जब घर में कोई परंपरा से हटकर कुछ करता है तो अक्सर मां-बाप अपने बच्चों की हिमायत नहीं करते। शुरुआत में विपुल के मां-बाप इस बात से अंजान थे कि उनका बेटा शायरी करता है। लेकिन जब उन्हें विपुल की तख़्लीकी सलाहियतों (रचनात्मक कौशल) का पता चला तो उन्होंने ख़ूब हौसला अफ़्ज़ाई की। विपुल बताते हैं, "हमारे यहां हो सकता है दूसरे शायर हों, लेकिन उर्दू हल्क़े में पहचाना जाने वाला कोई शायर नहीं है। तीन-चार साल तक तो मां-बाप को पता ही नहीं था कि मैं शायरी करता हूं। क्योंकि तब ज़्यादा लोग जानते नहीं थे। घर वाले फ़ेसबुक इस्तेमाल करते नहीं हैं तो उन्हें इस बारे में ज़्यादा मालूमात नहीं थी। जब प्रोग्राम होने लगे और वीडियो आने लगीं तब जाकर उन्हें पता चला मैं शायरी करता हूं। वो मेरी शेर-ओ-शायरी को लेकर बहुत ज़्यादा ख़ुश हैं। जब भी कहीं प्रोग्राम होता है वो उसकी वीडियो या फोटो देखते हैं।"

"शायरी की दुनिया के लोग काफ़ी हमदर्द हैं"

विपुल कुमार - फोटो : Facebook
विपुल का उर्दू शायरी का सफर बाक़यादा तौर पर चार साल पहले शुरू हुआ, लेकिन उर्दू सीखे हुए उन्हें ज़्यादा वक़्त नहीं बीता। विपुल कहते हैं, "मुझे क़रीब डेढ़ साल हुए हैं उर्दू सीखे हुए। मुझे लिखनी तो अभी भी रवानी से नहीं आती। मैं गुरेज़ करता हूं कि ज़्यादा न लिखूं, क्योंकि धीरे-धीरे लिखता हूं। अभी ज़्यादा मश्क़ (अभ्यास) भी नहीं है और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कहीं लिखना भी नहीं होता। हाथ से लिखी हुई चीज़ें थोड़ी कम पढ़ पाता हूं। लेकिन पढ़ बेहतर तरीक़े से लेता हूं और किताबें तो रोज़ पढ़ता ही हूं।" 

कॉर्पोरेट वर्ल्ड से ताल्लुक़ रखने वाले विपुल शायरी की दुनिया के लोगों को काफ़ी हमदर्द बताते हैं। वो कहते हैं कि मैंने इतने मददगार लोग और कहीं नहीं देखे, जितने शायरी की दुनिया में हैं। यहां पर अगर मैं नाम गिनवाने लगूं तो कई लोगों का ज़िक्र करना भूल जाऊंगा।
अक्सर कहा जाता है कि इंसान हालात से मुतासिर (प्रभावित) होकर शायरी करता है। मगर विपुल इस बात से इंकार करते हुए कहते हैं, "यह बात आधी सच है कि आप हालात से मुतासिर होकर ही शायरी करते हैं। जितनी चीज़ें आप लिखते हैं उन्हें जीना ज़रूरी नहीं है। जैसे हज़ारों शेर किसी भी शायर के सहरा (रेगिस्तान) पर होते हैं, दश्त (जंगल) पर होते हैं, आवारागर्दी पर होते हैं। हो सकता है वो शहरों से बाहर ही न निकला हो। उसने देखा ही नहीं हो कि रेगिस्तान कैसा होता है, दश्त कैसा होता है। वीरानी के लिए दश्त ज़रूरी नहीं है, वीरानी इंसान के अंदर भी हो सकती है। आप इन चीज़ों को अपने ज़हन में भी जी सकते हैं। बुनियादी तौर पर इंसान का हस्सास (संवेनशील) होना ज़रूरी है। चीज़े जितनी शिद्दत से महसूस करेंगे उसे उतनी शिद्दत से लिख पाएंगे। बाक़ी, लोगों के तजुर्बे आप जितना पढ़ते हैं वो भी आपके अंदर उतरते चले जाते हैं। दूसरे के तजुर्बों से यह सीख सकते हैं कि उन्होंने कैसे अपने वक़्त को जिया होगा।"

विपुल दूसरों के तजुर्बों से सीखने की ताकीद तो करते ही हैं साथ ही वो इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि एक शायर को दूसरो शायरों के शेर मुंह ज़ुबानी याद होने चाहिए। वो कहते हैं, "मैं इस बात को शिद्दत से मानता हूं की दूसरे शायरों के कम-से-कम 2000 शेर याद होने चाहिए और हज़ारों शेर पढ़े हुए होने चाहिए। हालांकि कई बार लोगों का हाफ़्ज़ा (याददाश्त) साथ नहीं देता वो अलग बात है। मेरा हाफ़्ज़ा ठीक है तो मुझे अच्छे ख़ासे शेर याद रह जाते हैं। लेकिन दूसरों को पढ़ना बेहद ज़रूरी है। आपको अलग-अलग रंग का पता होना चाहिए कि शायरी किस तरह से हो सकती है। अगर आप नस्र (गद्य) या फ़िक्शन पढ़ते हैं तो इससे काफ़ी मदद मिलती है। 

विपुल को वैसे तो कई शायर पसंद है, लेकिन मोहब्बत की हद तक उन्हें सिर्फ़ ग़ालिब पसंद हैं। वो बताते हैं, ग़ालिब से मैंने पढ़ना शुरू किया था। शुरुआत में उनकी शायरी समझ नहीं आती थी। कई मिसरे समझ में आ जाते थे मगर कोई शेर समझ नहीं आता था। मेरे सिरहाने हमेशा ग़ालिब का दीवान (ग़ज़ल संग्रह) रखा रहता था। लेकिन धीरे-धीरे याद करते हुए ग़ालिब मेरे ज़हन में उतर गए और मुझे उनकी शायरी काफ़ी हद तक समझ आने लगी। मुझे ग़ालिब से बेपनाह मोहब्बत है। ग़ालिब के अलावा फैज़ अहमद फै़ज़ और इरफ़ान सिद्दीक़ी मुझे पसंद हैं।" 

अब कवि सम्मेलनों और मुशायरों में पॉलिटिकल शायरी काफ़ी पढ़ी जा रही है। ख़ासकर नौजवान नस्ल के शायर जोशीली शायरी कर रहे हैं। लेकिन विपुल की इस तरह की शायरी में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं है। उन्होंने बताया, "पॉलिटिकल शायरी बहुत मुश्किल काम है। कोई पॉलिटिकल शायरी भी करे और वो उम्दा भी तो यह आसान काम नहीं है। मेरी नज़र में कोई ऐसा नाम नहीं है जिसने अच्छी पॉलिटिकल शायरी की हो। हालांकि, फै़ज अहमद फै़ज़ में मुझे यह चीज़ दिखाई देती है।" 
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"12 साल की उम्र में पहली रिलेशनशिप में था"

विपुल कुमार - फोटो : Facebook
शायरों को आम तौर पर आशिक़ मिज़ाज समझा जाता है। इस बात का तो शायद कोई यक़ीन ही नहीं करना चाहे कि आज के दौर में फे़सुबक पर किसी नौजवान शायर का रिलेशनशिप स्टेटस सिंगल भी हो सकता है। विपुल कहते हैं, "फ़िल्हाल मैं सिंगल हूं। लेकिन मोहब्बत में यक़ीन बहुत बचपन से था। मैं 12 साल की उम्र में पहली रिलेशनशिप में था। उसके बाद कई मोहब्बत रही हैं। उस वक़्त मोहब्बत का एहसास बहुत शिद्दत से था। लेकिन, मैं एक मोहब्बत में यक़ीन रखता हूं। मोहब्बत का मुकम्मल होना भी अपने आप में मोहब्बत की कोई ख़ास परिभाषा नहीं है। हो सकता है मोहब्बत करने वाले तय कर लें कि अब इससे ज़्यादा मोहब्बत नहीं की जा सकती। अब हमें जुदा हो जाना चाहिए। हालांकि, मोहब्बत करना बहुत ज़रूरी है। पहली नहीं तो दूसरी, दूसरी नहीं तो तीसरी।"

पहले शायरी के शौक़ीनों तक पहुंचने के लिए शायरों के पास किसी मैग्ज़ीन या अख़बार में अपनी शायरी प्रकाशित करने के अलावा मुशायरों में अपना कलाम पेश करना ही एक ज़रिया होता था। अब सोशल मीडिया ने शायरी का शौक़ रखने वालों के लिए एक नए जहां का दरवाज़ा खोल दिया है। विपुल कहते हैं, "सोशल मीडिया नए शायरों के लिए बहुत मुफ़ीद हो सकता है। मेरे लिए ये काफ़ी फ़ायदेमंद रहा है। इससे आने वाले शायरों को भी बहुत फ़ायदा होगा। मैं अदबी हल्क़े में जितने भी लोगों से मिला हूं वो फ़ेसबुक के ज़रिए ही मिले हैं। पहली बार मेरी ग़ज़ल की इसलाह फेसुबक के ज़रिए ही हुई थी। वहीं से ये शायरी का सफर शुरू हुआ।"

देश के अलावा विदेश में अपना कलाम पेश कर चुके विपुल का पूरी तरह शायरी की दुनिया में आने का अभी कोई पुख़्ता इरादा नहीं है। वो कहते हैं, फ़िलहाल इस तरह का कोई प्लान नहीं है कि मुकम्मल तौर पर सिर्फ़ शायरी करूं। क्योंकि अभी तक जो मैं शायरी कर रहा हूं उसमें ज़्यादा मश्क़ नहीं है। घंटों बैठ कर नहीं लिखता हूं। जो मिसरा आता है उसको उसी तरह से कह देता हूं और फिर उस पर थोड़ा काम करता हूं। अभी मेरी नौकरी अच्छी चल रही है। यह जायज़ बात है कि शायरी को ज़्यादा वक़्त नहीं दे पा रहा हूं। लेकिन मैं बेहतर कोशिश करता हूं कि प्रोफ़ेशनल ज़िंदगी और शायरी में तालमेल बना रहे। कम से कम कुछ सालों तक तो पूरी तरह शायरी की दुनिया में आने का कोई इरादा नहीं है। 

बातचीत के दौरान विपुल ने सुनाई अपनी यह ग़ज़ल -
जल्द आएं जिन्हें सीने से लगाना है मुझे 
फिर बदन और कहीं काम में लाना है मुझे 

इश्क़ पांव से लिपटता है तो रूक जाता हूं
वर्ना तुम हो तो तुम्हें छोड़ के जाना है मुझे 

मेरे हाथों को ख़ुदा रक्खे तिरे जिस्म की ख़ैर 
मसअला ये है तुझे हाथ लगाना है मुझे 

दिल को धड़का सा लगा रहता है वो जान न ले 
और फिर जब्र तो ये है कि बताना है मुझे 

मांग लेता हूं तिरे ग़म से ज़रा सरदारी 
एक दुनिया है जिसे दिल से उठाना है मुझे 

यूट्यूब पर मौजूद वीडियो में आप विपुल कुमार को यहां सुन सकते है - 

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