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ऐन फ्रैंक : इतिहास में दर्ज एक लड़की

सार

सर्च इंजन गूगल ने ऐन फ्रैंक को श्रद्धांजलि देते हुए डूडल बनाया है। ऐन फ्रैंक की डायरी विश्व भर में सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली किताब है। इस पुस्तक का विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है साथ ही इस पर नाटक, ओपेरा और फिल्म बनाई जा चुकी है।
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विस्तार
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सर्च इंजन गूगल ने ऐन फ्रैंक को श्रद्धांजलि देते हुए डूडल बनाया है। ऐन फ्रैंक की डायरी विश्व भर में सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली किताब है। इस पुस्तक का विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है साथ ही इस पर नाटक, ओपेरा और फिल्म बनाई जा चुकी है।
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1939 में दूसरा विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर ने यहूदियों को जड़ से मिटाने के प्रयास शुरू कर दिए थे। युद्ध के 6 साल के दौरान नाज़ियों ने तकरीबन 60 लाख यहूदियों की हत्या की थी। इस बीच यहूदी परिवारों को अकल्पनीय तकलीफों से गुज़रना पड़ा था। गुप्त तहखानों में लंबे अरसे तक छुपे रहना, गैस चेम्बर, भूख, बीमारी, शारीरिक और मानसिक यातना सहना उनकी नियति बन गई थी।
 
हिटलर की यातना से बचने के प्रयास में ऐसे ही दो यहूदी परिवारों ने एक गुप्त आवास में जुलाई 1942 से रहना शुरू किया और वे दो बरस से भी ज़्यादा अरसे तक छुपे रहे। ये थे फ्रैंक परिवार और वान दान परिवार। फ्रैंक परिवार की 13 वर्षीय ऐन फ्रैंक डायरी लिखती थी। गुप्त आवास में बिताए गए दिनों को भी उसने डायरी के रूप में लिपिबद्ध किया। यह डायरी यहूदियों पर ढाए गए ज़ुल्मों का जीवंत दस्तावेज़ है। यह डायरी 2 जून 1942 से शुरू होकर 1 अगस्त 1944 तक लिखी गई। 4 अगस्त 1944 में किसी की सूचना पर दोनों परिवारों को पकड़ लिया गया। 1945 में ऐन की मृत्यु हो गई। इसके लगभग 2 साल बाद उसके पिता ओटो फ्रैंक ने डायरी को प्रकाशित कराया। यहां ऐन फ्रैंक की डायती के दो पृष्ठ प्रस्तुत है।
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रविवार, 21 जून, 1942
मेरी अपने सभी अध्यापकों से खूब पटती है। हमारे कुल 9 अध्यापक हैं। मिस्टर कीसिंग, वे बूढ़े खड़ूस जो हमें गणित पढ़ाते हैं, मुझसे अरसे से नाराज़ चले आ रहे थे। कारण, मैं उनके हिसाब से बक-बक बहुत करती हूँ। उन्होंने मुझे चैटरबाक्स यानी गपोड़शंख जैसे विषय पर निबंध लिखने के लिए कह दिया।

उस शाम को मैं निबंध लिखने बैठी। कोई और होता तो ढेर सारा हाशिया और शब्दों के बीच में जगह छोड़ते हुए कुछ भी लिख देता। लेकिन बात तो तभी बनती जब मैं अपने ज़्यादा बोलने के बारे में संतुष्ट कर सकने लायक तर्क दे सकती। मैंने पूरे तीन पेज लिख डाले। अब मैं संतुष्ट थी। मैंने उसमें लिखा कि मैं अपने बोलने को काबू में रखने की कोशिश करूँगी। फिर भी मुझे नहीं लगता कि मैं अपनी इस आदत से पूरी तरह छुटकारा पा सकूँगी। कारण, मेरी माँ भी बहुत ज़्यादा बोलती हैं। आप जानते ही हैं, आनुवांशिक गुणों के बारे में ज़्यादा कुछ किया नहीं जा सकता।

मिस्टर कीसिंग मेरे तर्क पढ़कर खूब हँसे। जब अगले पाठ के दौरान भी मुझे बात करते पाया तो उन्होंने मुझे एक और निबंध लिखने का आदेश दे दिया। इस बार मुझे ‘लगातार बकबक करने वाली’ विषय पर लिखना था। मैंने इस विषय पर भी उन्हें लिखकर दे दिया। दो दिन तक तो मैंने उन्हें शिकायत का मौका नहीं दिया। तीसरे दिन मेरी बकबक करने की आदत से परेशान होकर उन्होंने मुझे फरमान सुना डाला, “मिस ऐन फ्रैंक तुम्हें एक निबंध लिखना होगा – क्वैक, क्वैक, क्वैक, करती है मिस चैटरबाक्स“

पूरी क्लास हँसते-हँसते दोहरी हो गई। मेरे सामने भी हँसने के अलावा और कोई चारा नहीं था। चैटरबाक्स पर मैं पहले ही दो निबंध लिख चुकी थी। अब वक्त आ गया था कि कुछ नया लिखा जाए। मैंने अपनी सहेली की मदद से एक कविता लिखी। इसमें एक कहानी थी– एक बत्तख थी, उसके तीन बच्चे थे। बच्चे क्वैक, क्वैक बहुत करते थे इसलिए उनके पिता ने उन्हें मार डाला। किस्मत से मिस्टर कीसिंग ने कविता में कही गई बात को सही भावना से स्वीकार किया। उन्होंने कक्षा में यह कविता पढ़कर सुनाई। अपनी टिप्पणियाँ भी दीं। उसके बाद से उन्होंने कक्षा में मेरे बोलने पर कभी टोका-टाकी नहीं की। इसके विपरीत आजकल मिस्टर कीसिंग खुद लतीफे सुनाने लगे हैं।

तुम्हारी ऐन
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रविवार, 2 मई, 1943
जब मैं यहाँ (गुप्त आवास में) अपने यानी हम लोगों के जीवन के बारे में सोचती हूँ तो अक्सर एक नतीजे पर पहुँचती हूँ। वह यह कि हम उन यहूदियों की तुलना में जो हमारी तरह छुपे नहीं हैं स्वर्ग में रह रहे हैं। मैं हैरान हूँ कि हम हमेशा सुविधाजनक परिस्थितियों में रहते हुए भी इतने असंतुष्ट क्यों रहे। अब यही देखो, जब से हम यहाँ आए हैं, खाने की मेज़ पर वही मेज़पोश पड़ा हुआ है। प्लेटें पोछने का कपड़ा भी यहाँ हमारे आने से पहले खरीदा गया था और इसमें इतने सुराख हैं कि गिनना मुश्किल है। वान दान परिवार पूरी सर्दियाँ एक ही चादर पर सोता रहा है। इसे धोया भी तो नहीं जा सकता। क्योंकि साबुन राशन में मिलता है और उसकी कमी हमेशा बनी रहती है। इसके अलावा साबुन इतना घटिया है कि पूछो मत। पापा बेचारे घिसी हुई पैंट पहने रहते हैं। माँ और मार्गोट (मेरी बड़ी बहन) वही तीन शमीजें पूरी सर्दियाँ मिल-बाँट कर पहनती रही हैं। मेरी शमीज इतनी छोटी है कि कमर तक भी नहीं पहुँचती। ये ऐसी चीजें हैं, जिनसे पार नहीं पाया जा सकता। हम सब कुछ फटा-पुराना, घिसा-पिटा इस्तेमाल कर रहे हैं। मेरी नेकर से लेकर पापा के शेविंग ब्रश तक। किस तरह हम उम्मीद करें कि हम युद्ध से पहले की सी स्थिति में आ जाएँगे?
तुम्हारी ऐन

(डायरी अंश साभार)  
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