नई थीम पर बन रही नई फ़िल्मों में गीतों के बोल भी नए हैं और धुनें भी। शायद यह वक़्त की मंशा है। लोग इन्हें दिल से गुनगुनाते हैं तो लगता है कि गीतों का यह नव प्रयोग बेहद सफ़ल हो चला है। प्रसून जोशी, मनोज मुंतशिर, इरशाद कामिल और पीयूष मिश्रा सहित कई ऐसी प्रतिभाएं हैं जो नए ज़माने की नई सोच को नए कलेवर के साथ गीतों में ढाल रही है। ये गीतकार नए ज़रूर हैं लेकिन भाव-रस-ताल में यह कही भी गीतों की तारतम्यता नहीं खोते।
सच के मापदंड इनके भले ही जुदा हों लेकिन मूल यानी प्रेरणा से ये भटकते नहीं हैं। फ़िल्म 'तारे ज़मीं पर' फ़िल्माया 'मां' गीत प्रसून जोशी की काव्य प्रतिभा का सटीक उदाहरण है। इसी तरह 'एक विलेन' का 'तेरी गलियां' गीत मनोज मुंतशिर की प्रतिभा का नायाब नमूना है। 'आंटी पुलिस बुला लेगी और पार्टी चलेगी' गीत पीयूष मिश्रा को नई पीढ़ी के साथ जोड़े रखता है। 'जब वी मेट' और 'रॉकस्टार' के गीत इरशाद कामिल की प्रतिभा को बेहतर ढंग से पेश करते हैं।
फ़िल्मों में गीत ऐसा घटक है जो हमेशा से आम आदमी के जेहन में रहता है। इसका मन में हमेशा प्रभाव रहता है।फ़िल्म के कथानक से भले ही यह संबंधित न हो लेकिन गीत ढाई-तीन घंटे दर्शकों को थियेटर में अवश्य बांधे रखते हैं। पुराने गीतकारों ने इश्क़ के साथ अन्य जज़्बात रुपहले पर्दे पर पेश किए हैं, तो नए गीतकार मन के भावों को सच के नए मापदंडों के साथ पेश कर रहे हैं। ये गीतकार शब्दों का तीव्र प्रयोग कर रहे हैं। उनके ये गीत मन को भरमाते नहीं बल्कि एक गहरी सोच और समझ देने में सहायक हैं।
गीतकार प्रसून जोशी ने 'हम तुम', 'फ़ना' और 'तारे ज़मीन' पर जो गीत लिखे हैं, वो बिलकुल फ्रेश एहसास देते हैं। 'तारे ज़मीन पर' के 'मां' गीत को तो चहुंओर तारीफ़ मिली है। प्रसून जोशी का 'दिल्ली-6' में 'ससुराल गेंदा फूल' गीत काफ़ी लोकप्रिय रहा।
'तारे ज़मीन पर' के 'मां' गीत के दो बोल का उल्लेख करना यहां आवश्यक होगा। गीत सुनकर लगता है कि प्रसून ने पूरी ममता इसमें उड़ेल दी है। गीत बताता है कि समाज में मनुष्य के सबसे अहम सरोकार ममता से प्रसून जोशी का कितना गहरा नाता है।
'मैं कभी बतलाता नहीं, पर अंधेरे से डरता हूं मैं मां
यूं तो मैं दिखलाता नहीं, तेरी परवाह करता हूं मैं मां
तुझे सब हैं पता, हैं ना मां
तुझे सब हैं पता, मेरी मां'
'भीड़ में यूं ना छोड़ो मुझे, घर लौट के भी आ ना पाऊं मां
भेजना इतना दूर मुझको तू, याद भी तुझको आ ना पाऊं मां
क्या इतना बुरा हूं मैं मां, क्या इतना बुरा, मेरी मां'
इसी तरह 'रंग दे बसंती' में 'मस्ती की पाठशाला' गीत के जरिए प्रसून जोशी ने युवाओं की उमंगों को बख़ूबी बिखेरा है। गीत सुनकर मन को एक नई उड़ान मिल जाती है।
'लूस कंट्रोल
लूस कंट्रोल
वन मोरे टाइम
लूस लूस लूस कंट्रोल
लूस कंट्रोल
ई आम रेबेल 2
ना कोई पढ़ने वाला ना कोई सीखने वाला 2
अपनी तो पाठशाला मस्ती की पाठशाला 2'
'हम तुम' में प्रसून ने प्रेम को नए शब्दों और लय में समेटा है। गीत दो प्रेम करने वालों के गहरे एहसास को भलिभांति व्यक्त करता है।
'बांहों में बांहो को भरने दो जरा
सांसों को सांसों में उतरने दो जरा
लम्हों की गुज़ारिश है
ये पास आ जाए
हम तुम'