संजय लीला भंसाली की फिल्म 'पद्मावती' के विरोध के बाद अभी इसकी रिलीज टाल दी गई है। रिलीज 1 दिसंबर को होनी थी। कुछ इसे राजनीतिक मसला मान रहे हैं तो कुछ इसे 'स्वाभिमान' की जीत मान रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र में वैचारिक स्वतंत्रता सबसे अहम है। हमारा देश इसके लिए पूरी दुनिया में सबसे अहम जाना जाता है।
ऐसे देश में फिल्म रिलीज होने से पहले ही उसका विरोध देश की संवैधानिक व्यवस्था पर करारा प्रहार है। यहां की वैचारिक स्वतंत्रता का हनन है। आधुनिक होते इस देश में विरोध के यह स्वर समझ से परे हैं। विरोध की ज्वाला के बीच पद्मावती की ऐतिहासिक उपस्थिति पर बहस शुरू हो गई है। आईए पद्मावती के जीवन या उनके अस्तित्व पर प्रकाश डालते हैं।
प्रसिद्ध कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावती पर आधारित अपने महाकाव्य 'पद्मावत' की रचना 1540 के आसपास की। जिसमें उन्होंने प्रेम और अध्यात्म का बखूबी वर्णन किया है। जायसी इसमें तकरीबन 200 साल पहले की पृष्ठभूमि पर आधारित घटनाक्रम को आधार बनाते हैं। घटनाक्रम के अनुसार दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी आईने में राजस्थान के चित्तोड़ की रानी पद्मावती की झलक देखता है और उनकी सुन्दरता से प्रभावित हो जाता है।
इसके बाद वह पद्मावती को हासिल करने के लिए चित्तोड़ की घेराबंदी करता है। पद्मावत के अनुसार खिलजी के हाथों में पड़ने की बजाय पद्मावती अपने महल की सैंकड़ों स्त्रियों के साथ जौहर कर लेती है। आग में कूद कर अपनी जान दे देती है। पद्मावती का ऐसा जौहर लोगों के विरोध की मुख्य वजह है। लोग इस जौहर को बड़े सम्मान से देख रहे हैं। वह कहते हैं कि पति के नाम पर जान देना या सती होना आज हर किसी की कूबत नहीं है, लिहाजा ऐसे महान चरित्र पर तोड़ मरोड़ कर फिल्म बनाना कतई उचित नहीं है।
पद्मावत महाकाव्य पर नजर डाले तो पद्मावती सिंघाल राज्य श्रीलंका की राजकुमारी है। बाद में उन्हें राजपूत रानी के रूप में बताया गया है। इतिहास के अनुसार खिलजी ने चित्तोड़ की घेराबंदी 1303 में की थी, जिसका वर्णन अमीर खुसरो ने अपनी रचना 'खज़ाइनउल फुतूह' में किया है, लेकिन खुसरो ने पद्मावती का कहीं प़र वर्णन नहीं किया है।
खुसरो की 1315 की रचना 'दीवाल रानी खिज़र खान' में खिलजी और गुजरात की रानी की प्रेम कथा है, लेकिन इसमें भी पद्मावती का कोई उल्लेख नहीं है। अमीर खुसरो को तूती-ए-हिंद कहा जाता था। उनकी रचनाएं उस समय के देश, काल, वातवारण को समझने का एक सच्चा जरिया हैं। अगर खुसरो पद्मावती पर कुछ नहीं लिखते तो यह इशारा है कि पद्मावती शायद जायसी की ही एक बेहतर कल्पना हो।
जायसी ने अपने महाकाव्य में भाव व्यंजनों के साथ पद्मावती के चरित्र को ऐसी लोकप्रियता दिलाई कि वह जन-जन में एक साहसिक नायिका बन गई। वह इतनी लोकप्रिय हो गई कि आज करीब पौने 5 सौ साल बाद भी उस चरित्र पर बहस जारी है।
इतिहासकारों में पद्मावती के अस्तित्व को लेकर काफी विरोध है। कुछ इसे सच्चा मानते हैं तो दूसरा वर्ग इसे आध्यात्मिक कल्पना के अलावा और कुछ नहीं समझता। ऐसे विरोधाभास के बीच सबसे अहम तथ्य यह है कि भारत के 1909 के इंपीरियल गजट के अनुसार जायसी भी स्वयं पद्मावत की अंतिम पंक्तियों में व्याख्या करते हैं कि वह आध्यात्मिक साध्यवसान रूपक लिख रहे हैं।
चित्तौड़ से उनका अर्थ मानव शरीर है; रत्न सिंह से आत्मा; बोलते तोते (हीरामन) से गुरु या आध्यात्मिक रक्षक; पद्मावती से ज्ञान व जागृति, अल्लाउद्दीन से भ्रम, आदि।"इस तरह यह कहा जा सकता है कि जायसी का कार्य परमात्मा में आत्मा का विलय या अद्वैत दर्शन है। जिसमें आत्मा और परमात्मा के परिपाक मिलन का बेहतर आलंकारिक शब्दों के साथ वर्णन किया गया है। संजय लीला भंसाली के प्रयास पर इतिहासकारों ने कहा है कि समाज को दिल खोलकर इस तरह की कोशिश का स्वागत करना चाहिए।