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कविताओं से जीवन को 'मुक्ति' देने वाले मुक्तिबोध को अपने से कभी मोह नहीं रहा

Tue, 12 Nov 2019 08:44 PM IST
काव्य डेस्क, नई दिल्ली
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गजानन माधव मुक्तिबोध - फोटो : The indian express
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कविताओं से जीवन की उलझनें स्पष्ट करने वाले गजानन माधव मुक्तिबोध अखंड भाव लिए हुए ब्रह्मांड से टकराने वाले दैदीप्यमान नक्षत्रीय कवि के रूप में हिंदी साहित्य में जाने जाते हैं।  प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीकांत वर्मा ने लिखा है कि गजानन माधव मुक्तिबोध को दूसरों से या अपनों से जो भी मोह रहा हो, अपने से उन्हें मोह कभी नहीं रहा। किसी और कवि की कविताएं उसका इतिहास न हों, मुक्तिबोध की कविताएं अवश्य उनका इतिहास कही जा सकती हैं। जो उनकी कविताओं को समझेंगे उन्हें मुक्तिबोध को किसी और रूप में समझने की जरूरत नहीं पड़ेगी। जिंदगी के एक-एक स्नायु के तनाव को एक बार जीवन में और दूसरी बार अपनी कविताओं में जीकर मुक्तिबोध ने अपनी स्मृति के लिए कई सारी कविताएं छोड़ी हैं। ये कविताएं ही उनका जीवन वृतांत हैं।
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समस्या एक-
मेरे सभ्य नगरों और ग्रामों में
सभी मानव
सुखी सुंदर व शोषणमुक्त
कब होंगे ?
(चकमक की चिनगारियां, चांद का मुंह टेढ़ा है)

बशर्ते तय करो, किस ओर हो तुम, अब
सुनहले उर्ध्व आसन के
दबाते पक्ष में, अथवा
कहीं उससे लुटी टूटी
अंधेरी निम्न कक्षा में तुम्हारा मन,
कहां हो तुम ?
(चकमक की चिनगारियां, चांद का मुंह टेढ़ा है)



 

मुक्तिबोध ने कविता को ही जीवन माना था। उन्होंने समय की करवट को काफी शिद्दत से महसूस किया था। आजादी के बाद भी देश में भ्रष्टाचार और शोषण से सरकारी तंत्र जूझ रहा था। ऐसे में मुक्तिबोध अपनी कविताओं में जन व्यवस्था पर प्रहार करते हैं। मुक्तिबोध व्यक्ति की जिम्मेदारी को भी इंगित करते जाते हैं। राजनीतिज्ञों और पढ़े-लिखे चालाक चतुर वर्ग की दोस्ती के बीच मध्यमवर्ग का कुछ नहीं कर पाना, एक तरह की अराजकता को पैदा करता है। मुक्तिबोध इसी व्यवस्था के कुशल चितेरे के रूप में कविता करने की कोशिश करते हैं। 

जीवन के संघर्ष को शब्दों से ऊर्जा देने वाले मुक्तिबोध का जन्म 13 नवंबर, 1917 को मध्यप्रदेश के श्योपुर में हुआ था। 18-19 साल की अवस्था में उनकी कविताएं जीवन का संघर्ष राग सुनाने लगी। उनकी कविताओं ने जीवन को खंगाला है। व्यवस्था पर चोट करते हुए अपने हक का दायरा भी तय किया है।  माखनलाल चतुर्वेदी की पत्रिका कर्मवीर में उनकी कविताओं को प्रमुखता से स्थान दिया गया। मुक्तिबोध एक शहर में ठहर कर नहीं रहे। वह कलम और पुस्तक के साथ शहरों की खाक छानते रहे। उज्जैन, नागपुर, इलाहाबाद, बनारस, कोलकाता, जबलपुर में वह समाज का मानसिक परिमार्जन करते रहे। 

उनके साहित्य में प्रगतिशीलता से लेकर मार्क्सवाद, समाजवाद, अस्तित्ववाद और रहस्यवाद भी देखा गया। अपने दौर में मुक्तिबोध ने अपने विश्वास और संकल्प के बलबूते आर्थिक विपन्नता और अस्थिरता का बखूबी सामना किया। यह उनकी कविता में झलकता है। इस बीच उन्होंने अपनी रचनाधर्मिता और मौलिकता को बरकरार रखा। 1943 में प्रकाशित तार सप्तक नई काव्य चेतना के ध्वजवाहक के रूप में हिंदी साहित्य में छा गया। अज्ञेय के संपादन में सात कवियों के इस संग्रह में मुक्तिबोध की सोलह रचनाएं प्रकाशित हुई, जो उन्हें कालजयी कवि का दर्जा देती हैं।  
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हिंदी साहित्य को अपनी साहित्यिक मेधा से मथने वाले मुक्तिबोध को अंत में छत्तीसगढ़ में थाह मिली। 1958 में राजनांदगांव में वह प्राध्यापक की नौकरी करने लगे। यहां कार्य के दौरान उन्होंने अपना गहन साहित्य रचा। 'ब्रह्मराक्षस' और 'अंधेरे में' मुक्तिबोध का सांसारिक संघर्ष निखरकर सामने आया है। 1962 में उनकी पुस्तक भारत: इतिहास और संस्कृति पर एमपी की सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। इससे उन्हें मानसिक चोट पहुंचीं। बाद में उन्हें 1964 में पक्षाघात का झटका लगा। उन्हें एम्स में भर्ती भी कराया गया लेकिन मुक्तिबोध 11 सितंबर 1964 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।  
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